Buy My Book

Thursday, September 24, 2009

देवप्रयाग - गंगा शुरू होती है जहाँ से

देवप्रयाग से वापस आकर जब मैंने अपने एक बिहारी दोस्त से बताया कि मैं देवप्रयाग से आया हूँ तो वो बोला कि -"अच्छा, तो तू इलाहाबाद भी घूम आया।" मैंने कहा कि नहीं भाई, मैं इलाहाबाद नहीं, देवप्रयाग गया था। बोला कि हाँ हाँ, एक ही बात तो है। इलाहाबाद को प्रयाग भी कहते हैं। अब तू उसे देवप्रयाग कह, शिवप्रयाग कह या रामप्रयाग कह। तेरी मर्जी।
घरवालों, घरवाली, बॉस व ऑफिस में डूबे रहने वाले कुँए के मेंढकों को क्या मालूम कि इलाहाबाद के प्रयाग की ही तरह और भी प्रयाग हैं जिनमे से गढ़वाल के पांच प्रयाग प्रमुख हैं। प्रयाग कहते हैं जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं। इसे संगम भी कहते हैं। इलाहाबाद में गंगा और यमुना मिलती हैं तो देवप्रयाग में भागीरथी व अलकनंदा का संगम होता है और यहाँ से आगे दोनों नदियों की जो सम्मिलित धारा बहती है उसे गंगा कहते हैं। भागीरथी तो आती है गोमुख-गंगोत्री से और अलकनंदा आती है बद्रीनाथ से।

मैं 19 सितम्बर 2009 को अचानक ही हरिद्वार गया तो रात को अपने पुराने साथी डोनू व सचिन के पास रुका। थोडी देर में तय हो गया कि मैं और सचिन सुबह-सुबह ही देवप्रयाग चलेंगे। सुबह हुई, चल पड़े। ब्यासी तक तो पहाडों व गहरी गंगा घाटी को देख-देखकर वाह-वाह करते रहे। फिर सीट के पीछे सिर टिकाकर ऐसे सोये, ऐसे सोये कि देवप्रयाग से 30 किलोमीटर आगे कीर्तिनगर पहुँच गए। हम देवप्रयाग से आगे आ गए हैं, इसका पता हमें चला एक बोर्ड देखकर जिस पर लिखा था- श्रीनगर 10 किलोमीटर। फटाफट उतरे, फिर देवप्रयाग की बस पकड़कर वापस गये।
यहाँ का मुख्य आकर्षण तो संगम ही है। जैसे जैसे शाम बढती जाती है, पीछे टिहरी बांध की वजह से भागीरथी का पानी भी बढ़ने लगता है। तब संगम का जल-स्तर एक से डेढ़ मीटर बढ़ना आम बात है। यहाँ अलकनंदा का पानी अति वेगवान है जिससे रेलिंग व जंजीर पकड़कर नहाते हुए भी डर लगता है। नहाने के बाद जब बाहर निकलने के लिए वापस पलटते हैं तभी साधू महाराज तिलक लगा देते हैं।
हमने भी बड़ी शान से तिलक लगवाया, लेकिन उसके बार-बार मांगने पर भी पैसे नहीं दिए। यहाँ धनेश तिवारी नाम के एक महाराज हैं। हमने उनसे दोस्ती कर ली। इसका हमें ये फायदा हुआ कि किसी भरजी नामक बन्दे के घर में मात्र सौ रूपये में कमरा मिल गया। शाम का खाना व सुबह का नाश्ता भी यहीं पर किया। वैसे यहाँ पर रुकने के लिए होटल व धर्मशाला भी हैं।
कहा जाता है कि भगवान् राम ने रावण की ब्रह्महत्या का प्रायश्चित यहीं पर किया था। यहाँ एक शिला पर राम के पदचिन्ह भी बने हैं। घोर आस्तिकों के लिए तो यह शिला मत्था टेकने की चीज है लेकिन मेरे जैसों के लिए प्रकृति की करामात से ज्यादा कुछ नहीं है। हो सकता है कि छैनी व हथौडे की करामात भी हो। पास ही में कुछ ऊपर राम को समर्पित एक मंदिर भी है।
देवप्रयाग में बहुत ही कम पर्यटक आते हैं। इसका कारण ये है कि ज्यादातर तो हरिद्वार-ऋषिकेश से ही वापस चले जाते हैं और जो कुछ बचते हैं वे बद्रीनाथ से पहले नहीं रुकते। यहाँ जाने का बेहतरीन समय बरसात के बाद व फ़रवरी-मार्च तक है। इन दिनों यहाँ की प्राकृतिक खूबसूरती चरम पर होती है। यह पौडी से भी सीधा सड़क मार्ग से जुडा है। हां, खाने की थोडी दिक्कत पड़ सकती है। क्योंकि आपको 'घर जैसा' खाना नहीं मिलेगा। हमने तो समोसे, कोल्ड ड्रिंक, बिस्कुट व कुछ मिठाइयों से ही काम चला लिया था।
भीडभाड ना होने की वजह से यहाँ गंदगी भी नहीं है। जब अलकनंदा चढ़ने के बाद उतरती है तो उसकी रेत या पेडों से गिरी हुई टहनियां- पत्ते ऐसे ही पड़े रहते हैं क्योंकि उन्हें हटता भी कोई नहीं है। कुल मिलाकर कुदरत के बीच में कुदरत के साथ रहने का भरपूर आनंद मिलता है देवप्रयाग में।
और हाँ, हरिद्वार से ज्यादा दूर भी नहीं है। बस से चार घंटे लगते हैं। अपना वाहन हो तो और भी कम समय लगेगा। आजकल लक्ष्मण झूला व ब्यासी के बीच में सड़क मरम्मत का कार्य चल रहा है, इसलिए रास्ता टूटा-फूटा, मलबे युक्त व धूल भरा है। ब्यासी के बाद तो बढ़िया रास्ता है।

कीर्तिनगर में अलकनन्दा पर बना पुल

देवप्रयाग, सामने से आती अलकनन्दा और बायें से भागीरथी

देवप्रयाग में एक झूला पुल

संगम में स्नान

इसे ध्यान से देखिये और फिर नीचे वाला चित्र देखिये

जिस जगह पर ऊपर वाले चित्र में दाहिने से दूसरे साधू बैठे हैं, वह जगह अब पानी में डूब गई है। इतना काम केवल बीस मिनट में हुआ। इसीलिए यहाँ जगह-जगह चेतावनी वाले बोर्ड लगे हैं कि किसी भी समय पानी एक से पांच मीटर तक बढ़ सकता है।

ध्यानमग्न होकर नहीं बैठा हूं, केवल मस्ती सूझ रही है।

राम पद शिला, इस पर पैरों की आकृति दिख रही है।

राम मन्दिर परिसर

राम मन्दिर परिसर

पुजारी धनेश तिवारी के साथ सचिन। तिवारी जी हमारे बहुत काम आये।

गहरी घाटी से होकर बहती अलकनन्दा

देवप्रयाग चन्द्रबदनी यात्रा श्रंखला
1. देवप्रयाग- गंगा शुरू होती है जहां से
2. चन्द्रबदनी- एक दुर्गम शक्तिपीठ

16 comments:

  1. I have passed through Devprayag many times , but never got down there as for Badrinath bound passengers the ideal night halt is Srinagar. It is beautiful indeed . very nice pictures indeed !

    ReplyDelete
  2. सुंदर अति सुंदर चित्र वत्स.

    रामराम.

    ReplyDelete
  3. धन्यवाद, घर बैठे देवप्रयाग के दर्शन हो गए।

    ReplyDelete
  4. @''घरवालों, घरवाली, बॉस व ऑफिस में डूबे रहने वाले कुँए के मेंढकों को क्या मालूम.....''. Cursed are those who in spite of being able-bodied and having money in pockets never visit Himalayas to have darshan of maa Ganga .

    ReplyDelete
  5. वाह...बदरीनाथ यात्रा स्मरण करवा दी आपने...हम लोग भी यहाँ थोडी देर को रुके थे...पानी का वेग देख कर नहाने से तौबा कर ली...काश आप श्रीनगर भी हो आते वो भी बहुत खूबसूरत जगह है ...लगता है जैसे प्लेन याने समतल जगह पर आ गए...नदी वहां भी बहती है मंथर गति से...कोई बात नहीं अगली बार सही...
    नीरज

    ReplyDelete
  6. हम तो पोस्ट पढ़कर और चित्र देखकर ही धन्य हो गये।

    ReplyDelete
  7. बढिया चित्र,मज़ा आ गया गंगा स्नान ही हो गया। हर हर गंगे।

    ReplyDelete
  8. इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

    ReplyDelete
  9. सच में इतनी देर में पानी चढ़ गया था..?? और वो पद चिन्ह ??!1
    Amazing !!

    ReplyDelete
  10. ek bar srinagar our pauri garhwal bhi jana pauri se upar lensidon ka safar bhut acha h

    ReplyDelete
    Replies
    1. रावत जी आप लैंसडाउन के है क्या ?

      Delete
    2. रावत जी आप लैंसडाउन के है क्या ?

      Delete
  11. देवभूमि उतराखंड मे घूमने का मजा ही कुछ और है मजा आ गया साब जी!

    ReplyDelete
  12. देवभूमि उतराखंड मे घूमने का मजा ही कुछ और है मजा आ गया साब जी!

    ReplyDelete