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Thursday, July 30, 2009

कांवड़ यात्रा - भाग दो

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बरला इंटर कॉलेज खेतों के बीच लम्बा चौडा बना हुआ कॉलेज है। इसलिए एक तो ठंडी हवा चल रही थी, दूसरे पंखे भी चल रहे थे। नीचे दरी बिछी हुई थी। एक थके हुए भोले को रात को सोने के लिए इससे बेहतर और क्या चाहिए? इतनी धाकड़ नींद आई कि कब सुबह के सात बज गए पता ही नहीं चला। उठे तो देखा कि बरामदा अब बिलकुल खाली है, सभी भोले जा चुके हैं।
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हालाँकि कॉलेज में चहल-पहल थी। सुबह का नाश्ता चल रहा था। हमने नहा-नूह कर चाय पी। हम चूंकि काफी देर से उठे थे तो अब जल्दी से जल्दी निकल लेने में ही भलाई थी। लेकिन मेरे लिए अब चलना भी मुश्किल हो रहा था। कल जो हम अपनी औकात से ज्यादा तेज चले थे तो इसका नुकसान अब होना था। अब तो नोर्मल स्पीड भी नहीं बन पा रही थी। इंजन, पिस्टन सब ढीले पड़े थे। पहियों में पंचर हो चुका था। ऑयल टैंक भी खाली हो गया था। अब तो बस चम्मक-चम्मक ही चल रहे थे।

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18 जुलाई, आज हरिद्वार से चलते हुए तीसरा दिन था। और मेरे आज तक के पांच सालों के कांवड़ इतिहास का सबसे बुरा दिन भी। आज तक कभी भी दोनों पैरों में इतने छाले नहीं पड़े थे। उधर छोटा भाई आशू बिलकुल ठीक था। उसे मेरी वजह से धीमा चलना पड़ रहा था। मन में आ रहा था कि किसी वाहन में बैठकर मेरठ चला जाऊं और जल चढा दूं। कभी सोचता था कि छोड़ कांवड़-पांवड, जब और चलना ही बस की बात नहीं है तो क्यों चलें? जल ना चढ़ने से क्या फर्क पड़ेगा? कभी बातों-बातों में ही आशू पर गुस्सा हो जाता था। अभी तक तो आधी मंजिल ही तय हुई थी यानि अभी दो दिन और चलना था। और हाँ, एक कंधे पर तो जरुरी सामान से भरा झोला था, दूसरे पर थी कांवड़। तो दोनों कंधे ऐसे हो गए थे जैसे फोड़ा निकल आया हो और वो पकने वाला हो। दांत भींचकर बड़ी मुश्किल से कंधे पर कांवड़ रख पाता था।
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लेकिन यही जिन्दगी है। यहीं पर इंसान संकट में धैर्य, हिम्मत, मेहनत व जुझारूपन सीखता है। इतनी मुश्किलों में रखे गए एक-एक छोटे-छोटे कदम भी हमें लक्ष्य की और ले जाते हैं। एक कदम आगे बढ़ते ही दूरी कुछ तो कम होती है। "जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह-शाम" इन्ही पंक्तियों को गाता हुआ मैं भी चलता जा रहा था।
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छपार के पास एक वकील साहब मिले। हालत मुझसे भी खराब। मिले क्या जहाँ पर हम सुस्ता रहे थे, वहीं पर वे भी सुस्ता रहे थे। बोले कि भोले, हमारी आमदनी तो झूठ से चलती है। हम केस को लम्बा खींचते रहते हैं और लोगों का पैसा हड़पते रहते हैं। बेचारे लोग पता नहीं कैसे-कैसे हमारा 'पेट' भरते हैं। तो इसीलिए वकीलों को धर्म-कर्म, दान-पुण्य करते रहना चाहिए। कल हम ऊपर जायेंगे तो अगर हमारे खाते में सौ लट्ठ लिखे होंगे, तो दस-बीस का डिसकाउंट मिल ही जायेगा।
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आगे चले तो एक 'भूत' मिल गया। ऊपर से नीचे तक काले व लम्बे-लम्बे बालों वाले कपडे पहन रखे थे। वह सड़क के किनारे आराम कर रहे लोगों को खासतौर से महिलाओं को डरा रहा था। अचानक उनके सामने जा खडा होता। डर के मारे वे या तो उछल पड़ते या भाग जाते थे। एक जगह तो उसने 8-10 बंदरों को दूर तक खदेड़ दिया था।
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दोपहर ग्यारह बजे भरी दोपहरी में मुज़फ्फरनगर में प्रवेश किया। यहाँ वैसे तो शाम के समय अलग ही रौनक होती है। लेकिन भंडारे पूरे दिन चलते रहते हैं। और ठंडे शरबत व शिकंजी वालों की तो कोई गिनती ही नहीं- फ्री में। शिवचौक के पास हर साल भंडारा लगता है। हर बार हम यहाँ पर खाते थे लेकिन इस बार चुपचाप आगे निकल गए। कारण था पैर। भंडारे में नंगे पैर पंगत में बैठना पड़ता। बस नंगे पैर चलने की तो हिम्मत ही नहीं हो पा रही थी।
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साथ वालों को फोन किया तो पता चला कि उन्होंने चार घंटे पहले मुज़फ्फरनगर को पार कर लिया था। कल तक तो वे हमसे घंटों पीछे थे। असल में वे पूरी रात चले थे। और हमें पुरा महादेव तक उन्हें पकड़ना जरुरी था। चूंकि रात को वे सोये नहीं थे, इसलिए आज दोपहर को चार-पांच घंटे के लिए वे सोयेंगे। हमारे पास यही एक मौका था। इसलिए पूरी दोपहरी हमने चलने में ही गुजार दी। शाम सात बजे नावला कोठी पर पहुँच गए।
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यह मुज़फ्फरनगर से 17-18 किलोमीटर दूर है। मेरठ व दिल्ली जाने वाले तो सीधे हाईवे से निकल जाते हैं। जबकि हम पुरा महादेव वाले दाहिने मुड़कर रजवाहे (छोटी नहर) की पटरी- पटरी चल पड़ते हैं। आम दिनों में यहाँ स्थित होटल पर राजस्थान रोडवेज की बसें खड़ी मिलती हैं। खतौली यहाँ से पांच किलोमीटर आगे है।
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जब यहाँ से चले तो अँधेरा हो चला था। पुरा महादेव 50 किलोमीटर दूर है। एक तो रजवाहे की कच्ची पटरी, ऊपर से अँधेरा, नीचे से पैर; फिर सुबह सात बजे से चल भी रहे थे। तीन किलोमीटर चलने पर नंगली गाँव पड़ता है। यहाँ से दो किलोमीटर आगे फुलत। फुलत तक दस बज गए थे। यहाँ से आगे चलने की तो बिलकुल भी हिम्मत नहीं थी। लेकिन पुरा महादेव अभी भी चालीस किलोमीटर दूर था यानी कल पूरा दिन। हम आज ही इस दूरी को कम से कम करना चाहते थे। इसलिए यहाँ से भी निकल चले। तीन-चार किलोमीटर आगे है- बडसू। मन तो कर रहा था कि और चलें लेकिन पैरों ने बिलकुल घुटने टेक दिए। पन्नी बिछाई और फ़ैल गए। लेकिन लेटते ही मोटे-मोटे 'नर रक्त पिपासु' मच्छरों ने हमला बोल दिया। यह हमला इतना जबरदस्त था कि हमें यहाँ से भी भागना पड़ा।
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यहाँ से आगे रजवाहे की पटरी पर पक्की सड़क थी। तेज-तेज चलते हुए रात को साढे बारह बजे मुजाहिदपुर पहुंचे। अब प्रतिज्ञा कर ली कि चाहे कुछ भी काटे, आगे नहीं चलेंगे। कांवड़ बाँध दी। सड़क के दूसरी तरफ कुछ अस्थाई दुकानें थीं। वे सब हाउसफुल थीं। उनके पीछे एक मैदान था। मैदान में बिटोडे लगे हुए थे। इस मैदान में भी काफी सारे भोले सो रहे थे। सही सी जगह देखकर खुले आसमान के नीचे पन्नी बिछाई और लेट गए।
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लेकिन उस ऊपर वाले को अभी भी चैन नहीं था। लेटे ही थे कि अचानक जोर से बारिश पड़ने लगी। उठकर भागने की औकात थी नहीं इसलिए नीचे बिछी पन्नी को ओढ़कर ही मैदान में बैठे रहे। अगर भागते तो जाते भी कहाँ? पंद्रह-बीस मिनट तक जी भरकर बारिश होती रही और हम वहीं बैठे रहे। हमारे जैसे और भी कितने ही थे। बारिश रुकते ही पन्नी को उल्टा करके बिछा लिया और सो गए।
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आज हमने 45 किलोमीटर की दूरी तय की थी। हम हरिद्वार से 115 किलोमीटर दूर आ चुके थे। और 35 किलोमीटर अभी भी चलना था।
बरला इंटर कॉलेज में सुबह को चाय पीते हुए

'भूत' एक सोते हुए भोले को डराते हुए। यह भोला इतना डरा था कि भागकर खेतों में जा घुसा)

मुज़फ्फरनगर में भंडारा

मंसूरपुर के पास नीरज भोला एक बाग़ में आराम फरमा रहा है

आशू भोला भी कम नहीं है

नावला से दाहिने को रजवाहे के साथ साथ रास्ता पुरा महादेव तक जाता है

और सीधे मेरठ-दिल्ली को

नावला से पुरा महादेव तक पड़ने वाले गाँव और उनकी दूरी

ये है आज का सफर मार्ग- बरला से मुजाहिदपुर
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19 जुलाई, 2009। सुबह-सुबह आँख खुली तो देखा कि हम मुजाहिदपुर गाँव के बाहर एक मैदान में पड़े सो रहे हैं। आज हमें पहले तो 35 किलोमीटर चलकर पुरा महादेव जाना था फिर वहां से कम से कम 30 किलोमीटर दूर अपने गाँव। वैसे तो जल चढाने के बाद हम स्वतंत्र हो जाते हैं और किसी भी वाहन से अपने गाँव तक जा सकते हैं। लेकिन यह इलाका शहर से बहुत दूर है। यह वो इलाका है जहाँ दिन ढलते ही सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता है। ऐसे में हमें रात को पुरा महादेव से अपने गाँव तक पैदल भी घिसटना पड़ सकता था। लेकिन वो तो बाद की बात है, पहला लक्ष्य है पुरा महादेव।
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मुजाहिदपुर से रजवाहे के किनारे-किनारे आगे बढ़ना था। यहाँ से निकलते ही मुजफ्फरनगर जिले की सीमा समाप्त हो जाती है और मेरठ जिला शुरू हो जाता है। राडधना से निकलते हुए पाल्ली जा पहुंचे। अच्छा, एक बात और। यह इलाका जाट बहुल है। रास्ते में पड़ने वाले हर-एक गाँव में भंडारे चल रहे थे। सुबह का टाइम था तो पाल्ली में हलुवा-पकौडी व चाय बन रही थी। यही हाल इससे अगले गाँव कालंद का भी था।
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यहाँ तो गाँव के छोरे-छारे सभी भोलों को 'फ्री होम डिलीवरी' कर रहे थे यानी लाइन में लगने का झंझट ख़त्म। तभी हमने भी घर पर फोन करके बता दिया कि हम कालंद पहुँच गए हैं। दो-ढाई घंटे में यानी ग्यारह-साढे ग्यारह बजे तक सरूरपुर पहुँच जायेंगे। तो हमारा खाना लेकर आ जाना। सरूरपुर से हमारा गाँव दबथुवा 10-12 किलोमीटर दूर मेरठ रोड पर है।
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कालंद से चले और घंटे भर में डहार पहुँच गए। डहार मेरठ-शामली-करनाल रोड पर स्थित है। रजवाहे के साथ-साथ चलते जाएँ तो अगला ही गाँव है- सरूरपुर। चूंकि पुरा महादेव जाने वाले ज्यादातर भोले इसी इलाके के होते हैं, तो उनसे मिलने के लिए घर-परिवार के लोग भी आ जाते हैं। पूरा मेला सा लग जाता है। सरूरपुर मेरठ-बरनावा रोड पर पड़ता है। इसके दोनों तरफ सघन छायादार पेड़ भी हैं, तो दोपहर को आराम करने में भी दिक्कत नहीं होती।
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जब हम साढे ग्यारह बजे सरूरपुर पहुंचे तब तक पिताजी खाना लेकर आ चुके थे। उनके साथ तवेरा भाई बबलू व तीन-चार साल का भतीजा लक्की भी था। सड़क के किनारे ही एक पेड़ के नीचे 'बोरिया बिस्तर' खोल लिया। यहाँ एक और अजीब बात होती है। घर वाले तो आते हैं सज-धज कर नए कपडे पहन कर और भोले होते हैं मैले कपडे पहने व धूल से सने हुए। लेकिन असली हीरो ये भोले ही होते हैं। यहाँ तो खाने-पीने का इतना शानदार इंतजाम था कि क्या शादी-ब्याह में होता होगा। मीठे चटपटे आइटमों से लेकर ठंडा शीतल शरबत भी। कुछ देर बाद घरवाले घर चले जाते हैं और भोले अपनी राह चलते जाते हैं। रजवाहा पास से बहता है तो सभी उसी में नहाते हैं।
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हम यहाँ से भरी तपती दोपहरी में दो बजे फिर चल पड़े। करनावल पहुंचे। फटाफट कपडों समेत ही डुबकी लगाईं और फिर चलमचल। मीरपुर पहुंचे। यह मेरठ-बडौत रोड पर है। यहाँ भी देशी घी का हलुवा, पकौडी व चने की बाकली चाय के साथ परोसी जा रही थी। अब तो मंजिल दस एक किलोमीटर ही रह गयी थी। शाम सात बजे चिन्दौडी पुल पर पहुंचे। यहाँ कोल्ड-ड्रिंक चल रही थी। यहाँ से कल्याणपुर तक पगडण्डी है। कभी गन्ने के खेतों के बीच से, कभी पानी की नाली के साथ-साथ, कभी धान के खेतों में धंसते-फिसलते कल्याणपुर पहुंचे। यह आखिरी पड़ाव है। यहाँ से निकलते ही चार किलोमीटर दूर चमचमाता- जगमगाता मंदिर दिख रहा था। मंदिर दिखते ही भोले के भक्तों का जोश चरम पर हो जाता है। सुरक्षा के लिहाज से बहुत ही संवेदनशील जगह है यह। मेरठ जिले के बड़े-बड़े अफसर यहाँ गश्त पर रहते हैं।
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कल्याणपुर से निकलकर हिंडन नदी का पुल आता है। हिंडन नदी ही मेरठ व बागपत जिलों की सीमा बनाती है। नदी के उस पार बागपत है। मंदिर भी बागपत में ही है। मान्यता है कि भगवान् परशुराम ने यहाँ नदी के किनारे शिवलिंग स्थापित किया था, उन्होंने ही यहाँ सबसे पहले गंगाजल चढाया था। इसीलिए इस मंदिर को परशुरामेश्वर महादेव मंदिर भी कहते हैं।
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पुल पार करते ही मंदिर का प्रांगण शुरू हो जाता है। हमें अंदाजा था कि जल चढाने के लिए बहुत भीड़ होगी। कभी-कभी तो यहाँ इतनी भीड़ हो जाती है कि लाइन में लगने के घंटों बाद जल चढाने का नंबर आता है। लेकिन अभी ऐसा कुछ भी नहीं था। हमने रात को दस-पौने दस बजे तक बड़े आराम से जलाभिषेक कर दिया।
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जल चढाते ही सब काम ख़त्म, लक्ष्य पूरा हो गया। चार दिन से चलती आ रही टांग तुडाई भी बंद हो गयी। यहाँ से हमारा गाँव करीब 30 किलोमीटर है। अब हमारे पास दो विकल्प थे। या तो यहीं पर सोकर रात गुजार लें और सुबह घर जाएँ। या फिर घर से कोई वाहन मंगवाकर अभी चले जाएँ। हमने दूसरा विकल्प चुना। घर पर फोन कर दिया। जब तक हम वापस कल्याणपुर पहुंचे, तब तक पिताजी मोटर साइकिल लेकर आ चुके थे। फिर तो कल्याणपुर से रोहटा रोड, रोहटा, गंगनहर की पटरी पर चलते-चलते भलसोना पुल के पास से दाहिने मुड़कर सीधे दबथुवा। रात को एक बजे हम गाँव में पहुंचे। रात को मंदिर प्रांगण में ही सोते हैं। त्रयोदशी का जल तो हमने पुरा महादेव पर ही चढा दिया था। और अब चतुर्दशी का जल गाँव के ही मंदिर में चढा देते हैं।
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अगले दिन कोई तो कन्याओं को भोजन करवाता है, कोई गायों को। तभी अपने घर में घुस सकते हैं। हमने तो गायें ही जिमा दी थीं। तो इस तरह मेरी लगातार पांचवीं कांवड़ यात्रा पूरी हुई।
बोल शंकर भगवान् की जय।
जयकारा वीर बजरंगे.... हर हर महादेव।
सरूरपुर में भंडारा

सरूरपुर में भोलों से मिलने आते घरवाले



सरूरपुर में रजवाहे में नहाते भोले





कहीं जगह नहीं मिलती तो खेतों में गन्ने पर या ज्वार पर ही कांवड़ रख देते हैं

तपती दोपहरी में आगे बढ़ते हुए



हम भी रजवाहे में खूब नहाये


रात को चमकता पुरा महादेव मन्दिर



ये रहा आज का सफर। मुजाहिदपुर से पुरा महादेव

कांवड यात्रा श्रंखला

8 comments:

  1. सचित्र यात्रा वर्णन अच्छा है. आशु के बारे में भी तो लिखो. वो शायद पहली बार कांवण ला रहा है. जब नहर के किनारे या फिर रुडकी में सोए थे तब कांवण कहाँ रखते थे?

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  2. Kaanvad Yatra brings people from various states togeter. I appreciate this endeavour, but law and order must be strictly maintained !Jai Bhole.

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  3. आपकी यात्रा सफल रहे.

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  4. क्या हुआ जो पैरों में छाले पड जाऐगे
    फिर ये और मजबूत हो जाऐगे
    जीवन की पथरीली राहों पर
    और मजबूती से चल पाऐगे।

    ना जाने क्यूँ छालों से ये लाईन याद आ गई।
    अच्छी पोस्ट।

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  5. प्रयास जी,
    आशू पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार कांवड़ ला रहा था.
    हम जहाँ भी आराम करते थे या सोते थे, कांवड़ को बल्लियों पर या वहां लगी सीढियों पर ही रखते थे फिर उसे रस्सी से बाँध देते थे ताकि गिरे ना.

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  6. bahut achcha !!! chitr dekhkar lag raha hai..bahut kastkar bhee hai :(

    God bless !!

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  7. Accha lag raha hai aapka yatra vrittant.

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