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Friday, May 1, 2009

बिलिंग यात्रा

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दिनांक 11 अप्रैल, 2009, शनिवार। बीड तो पहुँच गए। बीड बैजनाथ से 13 किलोमीटर दूर है। बैजनाथ व पालमपुर से काफी बसें मिल जाती हैं। बीड से 14 किलोमीटर 'ऊपर' बिलिंग है। बिलिंग जाने के दो तरीके हैं- टैक्सी व पैदल।
हमने दूसरा तरीका चुना। ऊपर सामने एक समतल सी पेड़ रहित चोटी है। वहीं बिलिंग है। कुछ दूर तो हम सड़क के साथ ही चले। जब हमें पहाड़ पर जाती एक पगडण्डी दिखी, तो हम रुक गए। सोचा कि किसी से पूछ लें कि क्या यही पगडण्डी बिलिंग जाती है? लेकिन कोई नहीं दिखा। फिर भी हमने चढ़ना शुरू कर दिया। सड़क को छोड़ दिया। पगडण्डी अच्छी तरह से हमारा साथ दे ही रही थी।


(ऊपर से बीड क़स्बा)
ऊंचे-ऊंचे घने पेडों की वजह से नीचे बीड क़स्बा भी नहीं दिखाई दे रहा था। ऊपर भी कुछ नहीं दिख रहा था सिवाय पेडों के। इतने घनघोर जंगल में रामबाबू तो डरा हुआ था। लेकिन मुझे डर नहीं लग रहा था। सही कह रहा हूँ, फेंक नहीं रहा हूँ। जब भी कहीं थक जाते, पत्थरों पर बैठ जाते, पानी पीते और फिर चल पड़ते।
(अच्छा, थक गया?)
पौन घंटे बाद एक गाडी के हार्न के आवाज सुनाई दी। इसका मतलब ये था कि आसपास ही कहीं सड़क है। और थोडा ऊपर चढ़े तो सड़क भी मिल गयी। अब हम सड़क पर चलने लगे। इतने घने जंगल को देखकर हमारे मन में ये बात बैठ गयी थी कि कहीं रास्ता ना भटक जाएँ। क्योंकि पहाडों पर दिशाओं का पता नहीं चलता। बस, हमने यहीं गड़बड़ कर दी। सीधे चढ़ जाते तो मजे में रहते।

ये देवदार के पेड़ हैं ना?
एक शोर्टकट दिखा। शोर्टकट मतलब पहाडी पगडण्डी। यह असल में बरसाती झरना था, जो अब सूखा पड़ा था। हमने इस पर चढ़ना शुरू कर दिया। इस पर बड़े-बड़े तो पत्थर थे ही, ऊपर से पेडों के सूखे पत्ते भी पड़े थे। पत्ते फिसलन पैदा कर रहे थे। एक बार तो मैं भी फिसल गया था, बड़ी मुश्किल से गिरते-गिरते बचा।

चल बेटा, सुस्ता ले, अभी तो बहुत चढ़ना है
मुसीबत तो तब आई, जब एक करीब आठ फीट की बिलकुल सीधी चट्टान सामने आ गयी। पहली नजर में तो लगा कि इस पर नहीं चढ़ पाएंगे। लेकिन चट्टान की दरारों में हाथ व पैर रख-रखकर चढ़ ही गए। दरारों में हाथ का सहारा लेना भी खतरनाक ही था, क्योंकि इनमे कीडे-मकोडे, सांप-बिच्छू भी हो सकते थे। इसी तरह एक बार मैंने चढ़ने के लिए एक झाडी का सहारा लिया तो उसके छोटे-छोटे कांटे हाथ में चुभ गए।
हम फिर सड़क पर आ गए। ऊपर काफी सारे पैराग्लाईडर उड़ रहे थे। उन्हें देखकर रामबाबू कहने लगा कि यार, इसमें काफी खतरा है। कहीं गिर भी सकते हैं। मैंने कहा कि भाई, इनसे गिरना भी आसान नहीं है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन किया जाता है। फिर बोला कि यार, मैं तो पैराग्लाइडिंग करूँगा नहीं। तू कर लेना। मैंने कहा कि हाँ, मैं तो जरुर करूँगा। और वहां धौलाधार की बर्फीली चोटियों तक भी जाऊंगा।

चढ़े बिना पिण्ड नहीं छूटेगा
तभी हमें अपने बाएं तरफ एक पगडण्डी दिखी। हमने सोचा कि इस पगडण्डी से चलें तो काफी सारा रास्ता बच जायेगा। चल पड़े। जितना ऊपर चढ़ते जा रहे थे, उतने ही बड़े-बड़े पत्थर आते जा रहे थे और पेड़ भी छोटे होते जा रहे थे। शायद चोटी पर पेड़ ना भी हो। हमें चढ़ते-चढ़ते डेढ़ घंटा हो गया था। और चोटी का कहीं अता-पता ही नहीं था। हम जरा-सा चढ़ते और हांफने लगते। अब हिम्मत भी जवाब देने लगी थी। भूख भी लगने लगी थी। सड़क का भी कहीं पता नहीं था। वैसे सड़क ही हमारी असली मार्गदर्शक थी। सड़क पर हमें भटकने का डर नहीं था।

चढ़ते चलो, चढ़ते चलो,
तभी एक मंदिर दिखा। लिखा था कि किसी देवी का मंदिर है। इस पर झंडियाँ भी लगी हुई थी। बड़ा ही रहस्यमय लग रहा था यह। घनघोर बियावान में!!! कौन आता होगा यहाँ पूजा करने? हमने ऊपर वाले को याद किया कि हे भगवान्! यह मंदिर हमारे लिए कोई मुसीबत ना बन जाये। पहाड़ पर "कुछ भी" संभव है।

ऐसा है पहाड़ का रास्ता
अब हमें पहली बार लगा कि चोटी के पास पहुँच गए। रामबाबू बोला कि वो देख, वो रही चोटी। अब चोटी पर ही जाकर रुकेंगे। अब बड़े पेड़ नीचे ही छूट गए थे। बचे थे तो सिर्फ पत्थर और यत्र-तत्र झाडियाँ। सामने कुछ ही दूरी तक चढाई दिख रही थी। फिर तो शायद उतराई ही थी। यानी हम चोटी पर पहुँचने वाले हैं। टारगेट दीखते ही थकान ख़त्म हो गयी, चाल बढ़ गयी।

अरे भाई, किसके इन्तजार में बैठा है?
'चोटी' पर पहुंचे। थोड़े ही दूरी पर दाहिने की ओर सड़क भी मिल गयी। और सड़क के उस तरफ??? पूरा का पूरा पहाड़ खडा था। जिसे हम अभी तक चोटी समझ रहे थे, वो तो सिर्फ भ्रम था। अब तो हमें ऐसा लग रहा था कि हम जितना चढ़ते जा रहे हैं, चोटी भी उतना ही ऊपर उठती जा रही है। कुल मिलाकर हमें अपनी औकात मालूम पड़ गयी।

ये तो बुरांज है ना?
अब पेड़ नहीं रहे। चोटी स्पष्ट दिख रही थी। उस से उडान भरते पैराग्लाईडर भी दिखने लगे। चोटी की तरफ नाक की और नाक की सीध में चढ़ते चले गए। धीरे-धीरे वहां खड़ी गाडियां भी दिखने लगीं। टूटे-फूटे बिखरे पत्थरों को रौंदते हुए आखिरकार हम चोटी पर पहुँच ही गए। पूरे तीन घंटे लगे हमें यहाँ तक आने में। और हाँ, यहाँ एक बोर्ड भी रखा था-" समुद्र तल से ऊँचाई- 2350 मीटर।" यानी शिमला, मसूरी, नैनीताल से भी ऊपर!!!

वो रही चोटी

जिस समय हम वहां पहुंचे, तो बड़ी ही भयंकर भूख लग रही थी। सोच रहे थे कि हम कंजूसों को चाहे कितना भी महंगा खाना मिले, जी भरकर खायेंगे। लेकिन!!! ये "लेकिन" जहाँ भी आ जाता है, सत्यानाश कर देता है। बने-बनाये काम को बिगाड़ देता है। सुनने वाला और पढने वाला "लेकिन" को सुनते ही समझ जाता है कि क्या होने वाला है। तो आप भी समझ गए ना क्या हुआ होगा। हमें खाना जरा सा भी नहीं मिला। मिला क्या दिखा भी नहीं। हाँ, ठंडा पानी जरूर नसीब हो गया।

मतलब कि अब तो नीचे बीड में ही कुछ मिल सकता था। भूख के मारे घुटने भी "आउट ऑफ़ कण्ट्रोल" हो रहे थे, तो पैदल उतरने का भी कोई मतलब नहीं था। यहाँ चोटी पर अच्छी चहल-पहल थी। सभी पैराग्लाईडर ही थे। सोचा कि एक राउंड खुद भी मार लिया जाये। किसी से पूछा तो पता चला कि पैराग्लाइडिंग करने के लिए नीचे बीड में रजिस्ट्रेशन कराना होता है। यह 10-15 दिन का कोर्स होता है। इसकी कम से कम बारह हजार रूपये फीस देनी होती है। बीड में ही बेसिक ट्रेनिंग होती है। इसके बाद बिलिंग में एडवांस ट्रेनिंग होती है। अक्टूबर में यहाँ पर अंतर्राष्ट्रीय पैरा ग्लाइडिंग प्रतियोगिता होती है जिसमे विदेशों से भी प्रतियोगी आते हैं।


(ये उड़ने की तैयारी कर रहे हैं)
यह एक सीधी खड़ी सपाट चोटी है। इस पर प्रतियोगी अपने शरीर पर ग्लाईडर को पैराशूट की तरह कमर से बांधकर दौड़ लगाता है और चोटी से छलांग लगा देता है। इतने में ग्लाईडर में हवा भर जाती है और यह पतंग की तरह उड़ने लगता है। प्रतियोगी इस पर पूरा कंट्रोल रखता है। हवा की गति की सहायता से वह इसे बहुत ऊपर ले जा सकता है।

(और वो उड़ गए)
प्रतियोगी नीचे बीड से ही गाडी किराये पर ले आते हैं। इसमें वे अपने साथ भारी-भरकम ग्लाईडर को भी लाद कर लाते हैं। बाद में वह और ग्लाईडर तो उड़ जाते हैं, ड्राईवर गाडी को खाली ही नीचे ले जाता है। हमने बीड जाने के लिए एक ड्राईवर से बात की तो बोला कि दोनों के 300 रूपये लूँगा। फिर दूसरे से बात की। बोला कि यार, तुम चलो तो सही, दे देना जो देना हो। हम चल पड़े।
ड्राईवर बीड का ही रहने वाला था। उसने हमें गद्दियों और पैराग्लाइडिंग के बारे में काफी सारी बातें बताईं। एक जगह गाडी रोककर उसने अपना घर भी दिखाया। दिखाया क्या, बोला कि वो मंदिर दिख रहा है? हाँ, दिख रहा है। उसके बगल में वो लाल सा घर दिख रहा है? हाँ, दिख रहा है। उसके बगल वाला ही है। वैसे हमें ना तो मंदिर दिखा, ना ही लाल मकान।
एक जगह कुछ गद्दी शराब बना रहे थे। उसने गाडी रोकी और थोडी सी पी आया। हम अ-शराबी थे, नहीं तो हम भी पीते। आखिर में बीड पहुँचने पर हमने उसे पचास रूपये दे दिए। यहाँ हमने जी भरकर खाया। कोल्ड-ड्रिंक पी पीकर डकार लेते रहे और खाना हजम करते रहे। शाम को पांच बजे पालमपुर जाने वाली बस आई। दो घंटे में ही पालमपुर जा पहुंचे।

(पालमपुर का बस अड्डा, देखकर ठण्ड लग रही है ना?)
बस अड्डे के पास में ही "सरदार जी का रेस्ट हाउस" है। वहीं एक कमरा मिल गया। और रजाई लम्बी तानकर सो गए। आज हम बहुत ज्यादा थके हुए थे, तो पालमपुर में ज्यादा नहीं घूमे। कल घूम लेंगे।

अगला भाग: हिमाचल के गद्दी

बैजनाथ यात्रा श्रंखला
1. बैजनाथ यात्रा - कांगड़ा घाटी रेलवे
2. बैजनाथ मंदिर
3. बिलिंग यात्रा
4. हिमाचल के गद्दी
5. पालमपुर यात्रा और चामुंड़ा देवी

8 comments:

  1. चित्रों के साथ आपके यात्रा संस्मरण
    प्रभावित करते हैं।
    लिखते रहें।

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  2. पहाड़ बहुत नजदीक नजर आते हैं, इसीलिए लोग उन पर चढ़ जाते हैं।

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  3. बहुत घणा सुथरा लिख्या तन्नै तो . और भाई "इब आया ऊंट पहाड कै नीचै" ये कहावत भी तो ऐसी परिस्थितियों मे ही बनी होगी?

    रामराम.

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  4. सचित्र यात्रावृ्तांत बहुत बढिया रहा....घुमक्कडी जिन्दाबाद!!

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  5. हिमाचल वास्तव में ही धरती का स्वर्ग है.

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  6. ये लम्बे-2 देवदार के पेड़ मुझे बहुत अच्छे लगते है। जमे रहो और लगे रहो नीरज भाई।

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  7. बहुत सुन्दर पोस्ट और बहुत सुन्दर चित्र!

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  8. वाह मन ललचा उठा है सफ़र के लिये।लेकिन मै इस बार थोड़ा क्न्फ़्यूज़ हो गया था।बीड और बैजनाथं नामों से मैने इसे परळी बैजनाथ(ज्योतिर्लिंग)की यात्रा समझा।

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