Thursday, January 29, 2009

जाट धर्मशाला के ठाठ

मेरे साथ रहता था रोहित चौधरी । एक नंबर का कार्टून और दुनिया भर का खप्पर भरना। जिन सज्जन के यहाँ हमने कमरा किराये पर ले रखा था, वे थे पंडत। उनके मकान के उच्चतम बिन्दु पर भाई लोगों का कब्जा था। तीसरी मंजिल पर दो कमरे, किचन, बाथरूम वगैरा सब सुख सुविधा थी। गुडगाँव के मकान मालिकों को क्या चाहिए? हर महीने टाइम पर किराया। हम महीना होने से पहले ही बुढिया को दे देते थे। तो बुढिया इतनी खुश हो गई थी कि हमारा पानी का घडा तक भी ख़ुद ही भर जाया करती थी। ...हमारे इस कमरे का नाम था- जाट धर्मशाला। क्योंकि हम इतने आलसी थे कि बाहर आते जाते टाइम भी कभी ताला नहीं लगाते थे। तो जब हम ड्यूटी करके वापस आते थे, तो कोई ना कोई बाहरी व्यक्ति कमरे ने विराजमान पाता था। हमारे दोस्तों की आवाजाही से बुढिया इतनी तंग हो गई थी कि बेचारी ने किसी "बाहरी" के आने पर ही रोक लगा दी थी। चाहे हम कमरे पर हों या ना हों।
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एक कमरे में तो हम रहते थे। दूसरे में कुछ दिन बाद एक सरदारजी आ गए। सरदारजी क्या, सिर्फ़ नाम का सरदार, बिना केश व पगड़ी के ही रहता था। लता नाम की किसी लड़की का दीवाना था। पर था मेरठ का ही, इसलिए उसकी भी हमसे बन गई।
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अगर मैं जोनी का जिक्र ना करुँ, तो बेकार है। मारुति कंपनी का कर्मचारी। ठेठ जाट बुद्धि। किसी दिन दोस्त ने ताना मार दिया होगा कि यार, तू मेरी मोटर साइकिल मत लिया कर। चुभ गई अगले को ये बात। अगले दिन ही अपनी बाइक खरीद ली। किसी ने कह दिया कि भाई, तेरे पास तो टीवी भी नही है। टीवी तो क्या, बन्दे ने कंप्यूटर ही खरीद लिया। बुढिया ने उसे भी हमारे पास आने से रोका तो था, लेकिन रोज शाम को हमारी रजाई में ही बैठा मिलता। हमारे कमरे से कुछ ही दूरी पर उसका भी कमरा था।
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अब बात करते हैं घटोत्कच की। असली नाम तो उसका रणधीर था। बडौत का रहने वाला था। ससुरा कुत्ता कमीना जब भी हमारे पास आता था, शाम को खाने के टाइम पर ही आता। कम से कम दो तीन टाइम का खाना खाकर ही चैन लेता। अब हम ठहरे एक हाड के इंसान। दोनों उसे लात मार मारकर भी भगाने की कोशिश करते, तो बेशर्म इतना था कि एक कोने में बैठकर कहता कि दम हो तो अब हिलाकर दिखाओ। फ़िर हमें दूसरे कोने मे खेस खूस बिछाकर सोना पडता। ...एक दिन तो हम सीढी लगाकर टांड पर जा चढे। सीढी ऊपर खींच ली और सो गये। घटोत्कच हमे ना पाकर फ़िर भी नीचे ही जम गया। सुबह को हम हाथ मुहँ धोकर ड्यूटी चले गये। वो हमारे जाने के बाद ही उठा होगा।
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अरे हाँ, याद आया- जाट धर्मशाला का एक और मेम्बर था- कुलदीप मलिक। उसका हमने उपनाम रखा था- मि बीन। जुगाडबाजों का जुगाडबाज। एक दिन कहने लगा कि भाई, सुनो, वो जो दूर नीली सी दीवार दिख रही है ना, उस की बगल वाली छत पर मुंडेर के परली तरफ जो सिर दिख रहा है, बताओ वो लड़की है या लड़का? हमें कुछ दिख रहा हो तो बताएं भी। बोला कि चलो मैं ही बता देता हूँ। वो लड़की है। "लड़की" सुनते ही उसका सिर हमें भी दिखने लगा। तभी सिर की जगह से एक कौवा उडा और चला गया। लड़की दिखनी बंद।
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अब बात करते हैं जाट धर्मशाला के नियमों की। हमारे पास ताले तो कई थे, लेकिन पता नहीं कौन से बैग की कौन सी जेब में पड़े थे। हम कमरे का तो कमरे का, किचन का गेट भी खुला ही छोड़ देते थे। एक दिन तो जब हम वापस आये तो देखा कि कमरे में एक बंदरिया बैठी है। उसे भगाकर भीतर घुसे। उसने गद्दे पर ही शूशू कर दी थी। इसके बावजूद भी हम नहीं सुधरे।
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जाट धर्मशाला का संचालक रोहित ही था। उसी ने सभी जाट दोस्तों से कह दिया कि अपना ATM यहीं पर छोड़ दिया करें। तो हमारे पास सात ATM हो गए थे। सभी का पासवर्ड भी एक ही कर दिया था-1234 । जिसे भी पैसे की जरूरत पड़ती, आले में हाथ दो, कार्ड उठाओ, पैसे ले आओ। कभी कोई राड नहीं कभी कोई झगडा नहीं।
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वहां पर हम रोज ही नहाते थे। लेकिन रोहित के नहाने का तरीका बड़ा ही खतरनाक था। अपने कैसेट वाले टेप की फुल आवाज करके बड़ी ही धूमधाम से उछल कूद मचाता हुआ नहाता था। एक दिन मकान मालिक की हमउम्र खूबसूरत लड़की ऊपर तुलसी में पानी डालने आई, तो रोहित को नहाते देख ऐसी डरी कि हमें तो फिर कभी ऊपर दिखाई नहीं दी। हो सकता है कि हमारे जाने के बाद ही आती होगी।
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17 comments:

  1. वर्णन अच्छा लगा. इस उम्र में सभी के कमरे धरमशाला ही रहते है.तो उन दीनो गुड़गवाँ आधुनिक हो गया होगा?. हम नें जब देखा था तब सही में एक कस्बा ही था. आभार.

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  2. वाकई स्वर्णिम दिन थे भाई..

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  3. क्या कहा भविष्य काला होता है .

    हम तो भविष्य वक्ता से पूछे तो उन्होंने बताया कि हमारा भविष्य सुनहरा है :)

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  4. बड़ा सुन्दर राम राज (यानी जाट राज) का वर्णन है। इस राज की अर्थव्यवस्था कैसे चलती थी!

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  5. Koi lauta de fir vo bite hue din. Dilchasp sansmaran.

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  6. जाट रे जाट तेरे कैसे कैसे ठाठ। सच निराले ठाठ।

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  7. नीरज जी,
    आपका सुनहरा भूतकाल बहुत अच्छा लगा, जोनी जी, रणधीर जी, कुलदीप मलिक जी और रोहित जी सबकी व्यक्तिगत परफोर्मेंस बहुत अच्छी लगी, विशेष तौर पर कुलदीप मलिक जी की, लेकिन आप भी मिस्टर बीन से कम भेजबाज नही हो क्योंकि आपने भी कौए को लड़की का सिर समझ लिया, चलो जो सब सुनाया हंसाने के लिए काफी था,
    हाँ एक बात और, एक बार वहां जाकर देख लेना लड़की अभी भी ऊपर वाले कमरे की तरफ़ आती हैं या नही, इसके उत्तर के बाद ही हम सब ब्लॉग भाई आपकी पोस्ट को पुरा समझेंगे !
    आपका (अनदेखा) मित्र ,
    दिलीप कुमार गौड़
    गांधीधाम

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  8. भाई जाट के ठाटः भी निराले ही हौवैं सैं. पर ये नहाना कब तैं शुरु कर दिया? :)

    रामराम.

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  9. भाई जाट के ठाटः भी निराले ही हौवैं सैं. पर ये नहाना कब तैं शुरु कर दिया? :)

    रामराम.

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  10. जाट, टाट, खाट, लाट, पाट यें पांचो एक जैसैई होवैं.....

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  11. आज कल आपके वो ROOM संचालक हमारे साथ दिन फोड़ रहे हैं !! but बोहोत बढ़िया वर्णन रहा आपका और अच्छा समय बीता काफी :-)

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  12. हा, हा!! तुम भी गजब की लिखते हो मुसाफिर!!

    खास कर तुम्हारे दोस्त के नहाने की आदत बडी अच्छी लगी !!

    सस्नेह -- शास्त्री

    -- हर वैचारिक क्राति की नीव है लेखन, विचारों का आदानप्रदान, एवं सोचने के लिये प्रोत्साहन. हिन्दीजगत में एक सकारात्मक वैचारिक क्राति की जरूरत है.

    महज 10 साल में हिन्दी चिट्ठे यह कार्य कर सकते हैं. अत: नियमित रूप से लिखते रहें, एवं टिपिया कर साथियों को प्रोत्साहित करते रहें. (सारथी: http://www.Sarathi.info)

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  13. भाई तन्ने तो झंडे घाड़ दिये .....मन्ने तो बहुत भायो ....

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  14. बहुत बढिया पोस्ट लिखी है।अच्छी लगी।

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  15. OHHH!!!!! UR DHARMSHALA EXPLANATION (ACTIVITY,RULE ETC) VIEW VERY GOOD .TUMHARA ROOM SANCHALAK (ROHIT)YAHAN BHI VAHI KAM KAR RAHA HAI…………ALL THE VEST FOR NEXT COMMENT…………………

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  16. kaash main bhi apke saath hota

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