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Tuesday, December 23, 2008

चीला के जंगलों में


इस इतवार को हमने मूड बनाया चीला में घूमने का। राजाजी राष्ट्रीय पार्क में तीन मुख्य रेंज हैं-चीला, मोतीचूर और एक का नाम याद नहीं। सुबह ही हल्का नाश्ता करके मैं, डोनू और सचिन तीनों चल पड़े। हरिद्वार बस स्टैंड से पैदल हर की पैडी पहुंचे।


फ़िर घूमते हुए भीमगोड़ा बैराज। यह वो जगह है जहाँ से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जीवन रेखा गंगनहर निकलती है।


बैराज पार करते ही राजाजी राष्ट्रीय पार्क की चीला रेंज शुरू हो जाती है। घने जंगल के बीच से होती हुई एक सड़क जाती है, जो आगे ऋषिकेश होते हुए पहाडों में पता नहीं कहाँ गुम हो जाती है।


इस जंगल में मुख्यतया हाथी हैं, इसलिए वन विभाग ने जगह जगह पर चेतावनी संकेत के रूप में बोर्ड लगा रखे हैं।



बैराज से तीन किलोमीटर आगे चीला रेंज में प्रवेश होता है। यहाँ से आगे निर्धारित शुल्क देकर जाया जा सकता है। हम ने यहीं पर करीब दो घंटे गुजारे।



यहाँ पर प्रशिक्षित हाथी भी हैं, जो जंगल में सैर कराते हैं। हम तो केवल खा-पीकर ही वापस आ गए।
हमें यहाँ जंगल में कोई हाथी या तेंदुआ तो नहीं दिखा, लेकिन बारहसिंघे जरूर दिखे। एक दो नहीं बल्कि पूरा चालीस पचास का झुंड। उन्हें देखने के लिए हमें थोड़ा जंगल के भीतर घुसना पड़ा। लेकिन हमें देखते ही पूरा का पूरा झुंड भाग खड़ा हुआ। हम फोटो भी नहीं खींच सके।

9 comments:

  1. post dekh ke lagta hai ki apka itwaar to bara achha raha.

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  2. आज तो भाई मजा आ गया ! फ़ोटो तो घणै ही सुथरे लाग रे सैं ! बहुत बधाई !

    रामराम !

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  3. ट्रेवलाग किखने में तो महारत हो गयी है आपकी!

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  4. इस बहाने हम भी चीला के जंगलों में घूम आए। सुंदर चित्र और अच्छा वर्णन। बधाई।

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  5. क्या खूब पोस्ट लिख डाली मुसाफिर ने. फोटो तो और भी शानदार. पिच्छली पोस्ट सारी पढता हूँ अब.

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  6. सुंदर चित्र और बढिया जानकारी। मौका मिलते ही जाऊंगा।

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  7. मज़ा आ गया...इसी बहाने हम भी घूम लिए....फोटो काफ़ी अच्छे हैं...

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  8. good to see all this pics...
    humein bhi jaane ka dil karne laga wahan :)

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  9. मैं तो हर छुट्टी वाले दिन चिला के जंगलो में ही घूमता हू वेसे तो अक्सर बाइक से ही जाना होता है लेकिन जब अकेला जाता हू तो पैदल ही जाता हू मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है भीमगोड़ा का बेराज क्युकि मेरा घर भीमगोड़ा में ही है हम लोगो सुबह मोर्निंग वाक के लिए भी चिला जाते है और चिला में अब तक पता नहीं कितने हाथी हिरन चीते देख चुके है वेसे चिला से आगे एक और जगह है जहा हम अक्सर होली के दिन जाते है एक मंदिर है विन्धवियाशनी देवी का जहा जाने का आनंद ही कुछ और है इस मंदिर का रास्ता चिला के जंगलो से होकर जाता है और रस्ते में तीन या चार नदिया पडती है जिन्हें पार करके जाना पड़ता है यहाँ पैदल जाना पोसिबल नहीं है क्युकि रस्ते में पूरा जंगल पड़ता है जानवरों का खतरा रहता है और सबसे बड़ी बात जंगलो में कम से कम 6 या 7 किलोमीटर अन्दर है वो मंदिर कभी मोका मिले तो जाना जरुर हम लोग तो होली वाले दिन ही जाते है पिछले 6 साल से होली वाले दिन सुबह 6 बजे घर से निकल जाते है और 2 बजे तक वही रहते है क्युकि मैं मेरे भाई और 2 दोस्त हमे होली खेलना अच्छा नहीं लगता इसलिए अपनी होली जंगलो में बनाते है शांत जगह पर लोगो से दूर जहा मोबाइल के सिग्नल भी आने से डरते है इसकी एक पोस्ट मेने अपने ब्लॉग पर भी दी थी जिसका लिंक आपको दे रहा हू आप भी देखे होली स्पेशल

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