Buy My Book

Monday, November 10, 2008

हरिद्वार में गंगा आरती

इस शनिवार को हमने पहले ही योजना बना ली थी कि कल हरिद्वार चलेंगे। वैसे तो मैं हरिद्वार में ही नौकरी करता हूँ। हरिद्वार से बारह किलोमीटर दूर बहादराबाद गाँव में रहता हूँ। कभी कभी सप्ताहांत में ही कहीं घूमने का मौका मिल पाता है। कमरे पर मैं और डोनू ही थे। इतवार को आठ बजे सोकर उठे। बड़े जोर की भूख भी लग रही थी। सोचा कि चलो परांठे बनाते हैं, आलू के। मैंने आलू उबलने रख दिए। डोनू पड़ोसी के यहाँ से कद्दूकस ले आया। बड़ी ही मुश्किल से परांठे बनाये। कोई ऑस्ट्रेलिया का नक्शा बना, कोई अमेरिका का। एक तो बिल्कुल इटली का नक्शा बना। दस बजे तक हम कई देशों को खा चुके थे। इतवार को सबसे बड़ी दिक्कत होती है-कपड़े धोने की। पूरे सप्ताह के गंदे कपड़े इतवार की बाट देखते रहते हैं। मेरे तीन जोड़ी थे, जबकि डोनू के भी करीब इतने ही थे। जितने चुस्त हम खाने में हैं, उतने ही सुस्त काम करने में। सुबह को आठ बजे तक पानी आता है, फिर दोपहर को आता है, भर लिया तो ठीक, वरना नल से खींचना पड़ता है। आठ बजे तो हम सोकर ही उठे थे। फिर भी हमने तीनों बाल्टी, सारे बड़े बर्तन जैसे कि कुकर, भगोना, पतीली वगैरा सब भरकर रख लिए। कौन खींचे नल से?
अब शुरू हुआ कपड़े धोने का दौर। पहले मैंने धोए, फिर डोनू ने। इसके बाद जैसे ही नहाने के लिए तौलिया उठाया, तुंरत याद आया कि इसे भी धोना था। धो डाला। तौलिया धोते टाइम याद ही नही रहा कि बेटा तुझे नहाना भी है। नहा कर जब तौलिया उठाने के लिए खूँटी की तरफ हाथ बढाया तो खूँटी बड़े जोर से हाथ में लगी। तब अकल ठिकाने आई कि तौलिया तो मैंने पहले ही धो डाला है। फिर अपना भारी भरकम खेस लाया, उससे तौलिये का काम चलाया। हम आपस में एक दूसरे का तौलिया प्रयोग नही करते हैं। नहाने के बाद तो कोई काम ही नही था। बस अब मजे से हरिद्वार चलेंगे। लेकिन यहाँ भी एक पंगा हो गया। पहनने को कपड़े ही नही थे। सारे के सारे कपडों को धो डाला था। एक बार तो सोचा कि लोवर पहन कर चलूँ। फिर सचिन की एक पैंट मिल गई। डोनू की शर्ट मिल गई। काम चल गया, बात बन गई। फिर जूते पहनते टाइम मूड बिगड़ गया। जैसे ही जूते में से जुराब निकाली, एक जबरदस्त नाकफाड़ गंध बाहर निकली। अरे यार इसे भी तो धोना था। और जूते भी धोने थे। चलो छोडो, फिर कभी धो लेंगे। अब तो हम जल्दी से जल्दी निकल जाना चाहते थे। ताला लगाया और चल पड़े।
डोनू को पहले ज्वालापुर जाना था। उसके किसी दोस्त को जूते खरीदने थे। मुझे ऐसी जगहें बहुत ही बोर लगती हैं। खैर उसे सात सौ रूपये के जूते दिलाकर हमने उससे कोल्ड ड्रिंक्स व कुरकुरे की पार्टी ली। फिर टम्पू में बैठकर पहुँच गए हरिद्वार। डोनू ने मुझसे पूछा कि तूने कभी गंगा आरती देखी है? मैंने देखी होती तो मैं हाँ भी करता। मैंने मना कर दिया। बोला कि चल आज तुझे गंगा आरती दिखाता हूँ। हम बाज़ार में घूमते घामते हर की पैडी पहुंचे। करीब चार बजे का टाइम था। अभी से लोगबाग आरती देखने के लिए हर की पैडी पर कतारों में बैठने लगे थे। मुझे हरिद्वार में एक बात बड़ी अजीब लगती है कि यहाँ हिन्दी बोलने वाले बहुत ही कम लोग होते हैं। हरिद्वार जितना लोकप्रिय राजस्थान में है, उतना ही गुजरात में, तथा उतना ही दक्षिण में। अधिकतर लोग यहाँ पर पूरे परिवार के साथ आते हैं। बस हम जैसे ही होते है, जो कभी भी मूड बना, मुँह उठाकर चले आए।
अभी तीन चार दिन पहले ही गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया है। कुछ ही दिन पहले हर की पैडी क्षेत्र पर जल का प्रवाह रोक दिया गया था। इसका कारण ये था कि हर साल अक्टूबर के अंत में यहाँ की सफाई होती है। उस दौरान गंगा की धारा के बीचोंबीच गंगा मैया की प्रतिमा भी लगायी गई थी। आज भी यहाँ पर पानी ज्यादा नही था। हम भी वैसे तो निक्कर तौलिया लेकर आए थे। लेकिन यहाँ पर उपस्थित ठण्ड ने मेरे हौंसले पस्त कर दिए थे। मुझे यहाँ पर सबसे बुरे लगते हैं गंगा सभा के कथित कर्मचारी। वे पूरे दिन हाथ में रसीद बुक लिए चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं। पूरे दिन में वे गंगा भक्तों की भक्ति का ग़लत फायदा उठा कर लाखों की "लूट" करते हैं। ये लोग गंगा की शुद्धता के लिए जोर शोर से अखबारों में अपील तो करते हैं, लेकिन ख़ुद ही इनका पालन नहीं करते। यहाँ पर दीपदान के नाम पर रोजाना टनों "कूड़ा" गंगा में डाला जाता है। लोगबाग गंगा में सिक्के भी डालते हैं, जिन्हें भिखारी बच्चे चुम्बक से व कई अन्य तरीकों से ढूंढ लेते हैं।
मै जब भी हरिद्वार जाता हूँ, मुझे वहां पर कुछ भी बदलाव नहीं दीखता। मैं न तो कभी किसी को "दान" देकर अपना परलोक सुधारने की कोशिश करता हूँ, न ही कभी दीपदान वगैरा करता हूँ। लेकिन मेरा उसूल ये भी है कि मै गंगा में प्लास्टिक या कूड़ा कचरा भी नही डालता। लेकिन वहां पर मै केवल गंगा के दर्शन करने जाता हूँ। कभी कभी तो गंगा का ये बेटा उसकी गोदी में खेलता भी है। जैसे जैसे आरती का टाइम नजदीक आता जा रहा था, हर की पैडी पर भीड़ भी बढती जा रही थी। जगह जगह फोटोग्राफ़र फोटो खिंचवाने की गुजारिश कर रहे थे। हम भी कभी इस पुल से जाकर उस पुल से आ रहे थे। प्यास लगी तो बोतल में गंगाजल भरके पी लिया। छः बजे आरती शुरू हुई। पंडितों ने बड़े बड़े पात्रों में अग्नि प्रज्वलित कर गंगा आरती शुरू की। एक चेला पात्रों के हैंडिल पर पानी दाल कर उसे ठंडा कर रहा था। यही सबसे बड़ा आकर्षण है हरिद्वार का। दूर दूर से श्रद्धालु आते हैं गंगा आरती देखे बिना उनकी यात्रा पूरी नहीं होती। ऋषिकेश में भी गंगा आरती होती है। बड़ा ही भक्तिमय वातावरण होता है। एक नदी की इतनी इज्ज़त! लेकिन गंगा एक नदी मात्र नहीं है। अगर हम इसे माँ कहते हैं तो यह भी हमें बेटे से कम नही मानती। पिछले दिनों बिहार में इतनी भयंकर बाढ़ आई। लेकिन उसमे गंगा का जरा सा भी हाथ नही था। कोसी नदी इतना उत्पात मचाती है, लेकिन गंगा में मिलकर वो भी शांत हो जाती है। गंगा से निकली नहरें भी गंगा से कम नहीं होतीं। जहाँ गंगा मनुष्य के पापों को धोती है, वहीँ नहरें खेतों के पापों को साफ करती हैं।
आरती के बाद हम वहीँ पुल पर खड़े हो गए। करीब एक घंटे तक पुल पर ही खड़े रहने के बाद वहां से चले। आज मेरा गला ख़राब था, वरना मै यहाँ पर लस्सी जरूर पीता हूँ। आज पहली बार यहाँ से बिना कुछ खाए पिए जा रहा था। मेन रोड पर पहुंचकर टम्पू पकड़ा और चल दिए अपने कमरे की तरफ।
आज पहली बार मैंने गंगा आरती देखी। इतवार को ही कहीं घूमने का टाइम मिल पाता है। अगले इतवार को तो हमने आगरा जाने का प्रोग्राम बना रखा है। उससे अगले इतवार को मैं घर जाऊँगा। उससे अगले को चंडीगढ़। यानी पहाडों पर तो अब दिसम्बर में ही जा सकता हूँ। अच्छा अब अलविदा। फिर मिलेंगे।

2 comments:

  1. preetipraveen.blogspot.comNovember 15, 2010 at 11:52 AM

    Aapne ati sunder likha,aisa laga mano mai swyam Gangaji ki aarti me
    shamil hun.Isi tarah sajha karte rahen....aapki lekhani ka parcham sada ujjwal rahe,meri shubhkamnayen.

    ReplyDelete