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Saturday, November 29, 2008

मुसाफिर जा पहुँचा कुमाऊँ में (भाग-2)

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पहाड़ पर गांवों में घर दूर दूर होते हैं। बीच में खेत होते है। अब रमेश मुझे गाँव के मन्दिर में ले गया। मन्दिर क्या एक पीपल के पेड़ के नीचे पूजा घर की तरह था। इस मन्दिर के पुजारी रमेश के पिताजी ही थे। मान्यता है कि हर रोज ताजे निकले दूध में से थोड़ा थोड़ा यहाँ पर चढाया जाता है। नहीं तो अगले दिन से पशु के थन से दूध की जगह खून निकलता है।
अब रमेश कहने लगा कि चल तुझे एक गुफा दिखता हूँ। पूरा गाँव पार करके इस पहाडी की चोटी से ज़रा सा नीचे एक छोटी सी गुफा थी। हम उसे बाहर से ही देखने लगे। तभी अचानक मैं चौंक पड़ा। इसकी दीवारों पर सांप जैसी आकृतियाँ बनी हुई थी। पहली बार में तो मैं भी सोच बैठा था कि इसमे तो सांप हैं। लेकिन वो बिल्कुल प्राकृतिक थी।
जब हम वापस घर की तरफ़ जा रहे थे तो अँधेरा हो चुका था। दिन ढलते ही ठण्ड अचानक बढ़ गई थी। और मैं हलकी सी जैकेट पहनने के बावजूद थरथर कांप रहा था। इतने में रमेश को एक दोस्त ने अपने घर पर बुला लिया। यहाँ पर चाय पी। उसका दोस्त केबल ऑपरेटर था। पूरे गाँव में वो ही केबल ऑपरेट करता था। यहाँ करीब आधा घंटा बिताने के बाद हम घर की तरफ़ चल पड़े। घुप्प अँधेरा। उसके घर की तरफ़ जाने वाली पगडण्डी नहीं दिख रही थी। इसलिए दोस्त के यहाँ से एक टॉर्च ले ली।
जब हम घर पर पहुंचे तो घरवाले हमारा इंतज़ार कर रहे थे। जाते ही भाभी ने दोनों को नमक मिश्रित गर्म पानी दिया- पैर धोने के लिए। इससे पैरों की थकावट दूर होती है। मुझे हद से ज्यादा ठण्ड तो लग ही रही थी। मैं सीधा चूल्हे के पास जा बैठा। पहाड़ पर घर के हर एक कमरे में चूल्हे होते हैं- कमरे को गर्म रखने के लिए। इसमे लकड़ी जलाई जाती है। लेकिन फ़िर भी यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं है। चूल्हे एक कोने में होते हैं। घर बनाते समय ही कोने को खोखला बनाते हैं। पूरा होने पर यह चिमनी की तरह काम करता है। सारा धुंआ चिमनी के रास्ते बाहर निकल जाता है। आप भी कभी पहाड़ पर गए होंगे तो देखा होगा कि घरों की छतों से धुंआ निकलता है। इससे पूरे कमरे में गर्मी बनी रहती है। यहाँ तक कि बर्फ़बारी के दौरान भी।
इस कमरे में एक तखत पड़ा हुआ था। बाकी जगह पर मोटी दरी बिछा रखी थी। इतने में हमारे लिए खाना आ गया। बंदगोभी की सब्जी थी। मूली का ठंडा ठंडा सलाद। खाने में मजा आ गया। चाय तो हर समय हाज़िर रहती ही है। मेरे कुमाऊंनी तो समझ में आती ही नहीं थी। वे आपस में क्या बात कर रहे है, मेरे सिर के ऊपर से जा रही थी। हालांकि मां को छोड़कर बाकी सभी हिन्दी जानते थे। अगर मां मुझसे कुछ कहती थी, तो कोई ना कोई अनुवादक का काम करता था। उसकी मां की इच्छा थी कि एक बार ट्रेन में बैठने की। बच्चों ने तो ट्रेन देखी भी नहीं थी कि कैसी होती है। बच्चे भी मेरी भाषा नहीं समझ पा रहे थे।
तभी एक घटना घटी। आस पड़ोस में लोग बाग़ शोर मचाने लगे, पटाखे फोड़ने लगे। यह परिवार भी बाहर निकल गया। थोडी देर में सब कुछ सामान्य हो गया। असल में गाँव में कभी कभी जंगल से बाघ आ जाते हैं। आज भी एक बाघ आ गया था। उसे भगाने के लिए ये लोग ऐसा करते हैं। बाघ आमतौर से आदमी को तो कुछ नहीं कहता, लेकिन बकरियों को उठा ले जाता है।
करीब नौ बजे मैं और रमेश दूसरे कमरे में सोने चले गए। वहां पर भी अंगारे रखे हुए थे। इसलिए वो कमरा भी गर्म था। बिस्तर में घुसते ही बड़ी जबरदस्त नींद आ गई। सोने से पहले रमेश ने बताया कि कल पड़ोस के गाँव से शादी का निमंत्रण आया हुआ है। दोनों वहां चलेंगे। पैदल का रास्ता है। कम से कम दो घंटे लगेंगे जाने जाने में।
सुबह को आँख खुली। देखा रमेश चाय लेकर खड़ा है। बोला कि यार तू तो पिछले किसी जन्म में कुम्भकर्ण था। मैं सोच में पड़ गया कि अभी तो ठीक से आँख भी नहीं खुली, कमरे में यह कौन आ गया। और क्यों मुझे कुम्भकर्ण बता रहा है? फ़िर बोला कि ले चाय पी ले, तेरी नींद भी उतर जायेगी। मैं अभी भी नींद में ही था। सोच रहा था कि रात शायद तूने कमरे की कुण्डी न लगायी हो, फ़िर ये चाय लेकर कौन आ गया। आज तक तो किसी ने खाने को भी नहीं पूछा। रमेश फ़िर बोला कि अरे चाय पी ले, ठंडी हो जायेगी।
अब मुझे कुछ होश सा आया। अच्छा, बेटा तू तो पहाडों पर है। मन अभी भी नोएडा में घूम रहा था। मेरे तभी ध्यान आया कि आज तो किसी दोस्त की शादी में भी जाना है। रमेश से पूछा कि पड़ोस के गाँव में लड़के की शादी है या लड़की की। बोला कि लड़के की। फ़िर बारात कहाँ जायेगी? धानाचूली के पास। मैंने फ़िर पूछा कि तो उस गाँव में जाने की जरुरत ही क्या है। वहां तक तो पक्की सड़क भी नहीं है। फ़िर मोतियापाथर तक तो बारात पैदल ही आएगी। जब इस गाँव में से गुजरेगी तो हम भी बारात में शामिल हो जायेंगे।
बोला कि सोच तो मैं भी ऐसा ही रहा था। लेकिन एक पंगा हो गया है। सारी रात हो गई, भैंस ने सोने नहीं दिया। रेंक रही है। इसे ग्याभन भी करवाना पड़ेगा। मैंने पूछा कि ग्याभन करवाने के लिए कहाँ ले जाना पड़ेगा?
"गाँव के उस तरफ़ से फलाना आदमी अपने भैंसे को यहाँ ले आएगा। दस बीस रूपये ले लेगा।"
"कब तक आ जाएगा?"
"अभी तो वो जंगल में गया हुआ है। पता नहीं कितनी देर में आएगा।"
"तो एक बार फोन करके पूछ ले।"
"फोन तो उसके घर पर रखा है।"
अब उसे तो आना नहीं था। तभी उसने बताया कि अब तो भैंस को दूसरी जगह ले जाना पड़ेगा। लेकिन वहां ले जाना काफी खतरनाक है। ऊपर पहाड़ की दूसरी तरफ़ है। मैं और वो दोनों भैंस को ले चले। कुछ दूर तक तो बेचारी चढ़ गई, लेकिन फ़िर भैंस ने भी चढ़ने से मना कर दिया। अब आगे से रमेश खींचने लगा और पीछे से मैंने धक्का देकर उसे चढ़ने में सहायता की। खैर पसीने पसीने होते हुए हम उसे सफलता पूर्वक ग्याभन करवा कर ले आए।
अब तो बारात में जाने का कोई मतलब ही नहीं था। बारात कब की जा चुकी होगी। लेकिन चलो फ़िर भी उनके घर तक तो घूम आयें।
रमेश से ज्यादा खुशी मुझे हो रही थी। क्योंकि दूसरे गाँव तक जाने का पूरा रास्ता जंगली था, पैदल था, ऊपर से पहाड़। एक तरह से ट्रेकिंग थी। मैंने रमेश से कहा कि यार तू अपना कैमरा ले ले। बोला कि कैमरे में रील नहीं है। रील लाने के लिए दो घंटे दूर मोतियापाथर जाना पड़ेगा।
हम चल पड़े बिन कैमरे के ही। रमेश के गाँव का ही एक और लड़का हमारे साथ हो लिया। दोपहर करीब दो बजे के आसपास हम रवाना हो चुके थे। इस पहाडी को पार करके सामने जो पहाड़ दिख रहा था, उसके दूसरी तरफ़ था हमारा टारगेट गाँव। नाम था मेरगांव। मेरगाँव तक जाने के लिए कोई पक्की सड़क भी नहीं है। बस घोडों और खच्चरों का ही सहारा है।
हालाँकि अब एक सड़क बन रही है जो इन बेसडक गावों को जोडेगी। यह मोतियापाथर से लमगडा तक जायेगी। अब हम इस पहाड़ की चोटी पर खड़े थे। सामने वाले पहाड़ पर जाने के लिए हमें नीचे उतरकर फ़िर चढ़ना पड़ेगा। लेकिन ये पहाडी लोग आने जाने के लिए ऐसा रास्ता बनाते हैं कि कम से कम टाइम लगे। भले ही यह रास्ता कितना भी खतरनाक हो।
सामने वाली घाटी में पूर्ण रूप से चीड के जंगल हैं। चीड का जंगल गर्म होता है। चीड के लंबे लंबे पेड़, उनके भारी भरकम फूल। चीड का फूल भी लकड़ी का ही होता है। लोग इसे जंगलों से लाते हैं, और जलाकर प्रयोग करते हैं। चीड की लकड़ी आग बड़ी जल्दी पकड़ती है। चीड का तेल भी बड़ा ही कीमती होता है। जगह जगह पेडों के तनों में चीरा लगाकर उसके नीचे एक कीप बाँध दी जाती है, तेल बूँद बूंद करके इसमे भरता रहता है।
कहीं कहीं पर पगडण्डी दो भागों में बंट जाती है। अब दिक्कत होती है कि किस दिशा में जाएँ। पहाडी लोग जंगल में जाने के लिए इन पगडंडियों का प्रयोग करते हैं। अगर मैं अकेला होता या दो तीन मैदानी भी साथ होते तो पूरे दिन इस पहाडी घाटी में भटकते रहते, लेकिन रमेश सफलता पूर्वक चलता रहा।
एक जगह पर रमेश बोला कि यार वापसी में इस रास्ते से नहीं आयेंगे।
मैंने पूछा "क्यों?"
"इस इलाके में भूत रहते है। वापसी में हमें अँधेरा हो जाएगा। तो भूत दिक्कत पैदा करेंगे।"
मैं भूत भात में विश्वास तो करता नहीं हूँ। इसलिए मैंने कहा-" नहीं यार, भूत भात कुछ नहीं होते, इसी रास्ते से आयेंगे। मैं भी तो देखूं कि भूत कैसे होते हैं।"
इसके बाद उन्होंने भूतों से जुड़ी घटनाएँ सुनानी शुरू कर दी। कभी बताते कि फलाने के कंधे पर बैठकर गाँव तक गया था, कभी कहते कि बहुत बड़ी बिल्ली बनकर रास्ते में अड़ गया था। इनसे बचने के तरीके भी बताये, कि कभी भी भूत से डरना नहीं चाहिए। अगर डर गए तो समझो भूत हावी हो जाएगा, और आप दहशत के मारे मर भी सकते हो।
खैर इस "भूत घाटी" को पार करके अब चढाई शुरू की। लेकिन रास्ता ऐसा था कि चढ़ते हुए ज्यादा थकान नहीं हो रही थी। एक छोटे से झरने से निकले पानी ने पहाड़ की मिटटी को बहुत ही खतरनाक तरीके से काट रखा था। इस के ऊपर एक चीड का पेड़ डालकर पुल बनाया हुआ था। होगा करीब दसेक मीटर। इसी पुल का उपयोग नर-नारी से लेकर घोडे तक सफलतापूर्वक करते हैं।
थोडी ही देर में हम ऐसी जगह पर पहुँच गए, जहाँ से हमारा गंतव्य गाँव पूरा दिखाई दे रहा था। वहां एक घर के चारों और रंग बिरंगी झंडियाँ लगी हुई थी। निःसंदेह यही वो घर था जहाँ हमें जाना था। अब हम कुछ ऊपर थे और वो घर नीचे। इसलिए अब थोडी थोडी देर में अपने लक्ष्य को देखकर अंदाजा लगा लेते थे कि हम सही दिशा में जा रहे हैं।
यहाँ पर पहाडी केले के कई पेड़ थे। पहाडी केला काफी मोटा होता है और पकने के बाद भी हरा दिखाई देता है। बेहद मीठा भी होता है।
करीब डेढ़ घंटे का पहाडी सफर पैदल तय करके हम तीनों उस गाँव में पहुँच गए। जिस घर में शादी थी, वहां काफी चहल पहल थी। डीजे पर कुमाऊंनी लोकगीत बज रहे थे। लड़के लड़कियां साथ मिलकर डांस कर रहे थे। पहाडी गीतों में एक अजब सी मिठास होती है। वे कानों में चुभते नहीं हैं। मुझे कुमाऊंनी तो आती नहीं है, इसलिए रमेश कुछ ख़ास बोलों का हिन्दी अनुवाद करके बता रहा था।
बगल में ही खाने का इंतजाम हो रहा था। यहाँ पर शादी ब्याह में बाहर से हलवाई नहीं बुलाए जाते। घर के या अडोस पड़ोस के आदमी ही होते हैं। जाते ही हमें चाय मिली। यहाँ से कोसी की वह सहायक नदी बड़ी ही मस्त लग रही थी। दूर तलक जाती हुई पहाडों में ही खो रही थी। रमेश ने इशारा करके बताया कि मैंने उस स्कूल से दसवीं पास की है। यहाँ से बड़ी दूर था वह स्कूल। घर से स्कूल तक पहुँचने में कम से कम दो ढाई घंटे लगते होंगे।
जैसे जैसे दिन ढलता जा रहा था, माहौल में ठण्ड भी बढती जा रही थी। यह घर पहाड़ पर पूर्व दिशा में था, इसलिए यहाँ पर दिन जल्दी ढल गया था। सामने उस पहाड़ पर अभी भी अच्छी खासी धूप थी। जाहिर सी बात है कि यहाँ पर ठण्ड ज्यादा थी। मैं भी उसी चूल्हे के पास बैठ गया जिस पर बड़े भगोने में सब्जी बन रही थी। इसमे आग जलने में चीड की लकड़ी और फूल का इस्तेमाल हो रहा था।
मुझे यहाँ जो देखना था, मै देख चुका था। अब अँधेरा भी तेजी से फैलने लगा। मैंने रमेश से कहा कि यार चल वापस चलें। मुझे भूतों से तो कोई डर नहीं था, लेकिन रात बाघ वाली घटना से मै कुछ कुछ सहमा हुआ था। पक्की आशंका थी कि रास्ते में कोई बाघ या कोई अन्य जानवर मिल जाए। लेकिन हमारे साथ जो तीसरा था, वो अभी चलने को राजी नहीं था, क्योंकि यहाँ पर कई सारी लड़कियां थी। अगला उनसे सेटिंग वेटिंग का चक्कर चला रहा था।
अँधेरा हो चुका था जब हम चले। तभी उन के दिमाग में जाने क्या आया। कहने लगे कि यहीं से एक मशाल का इंतजाम करते चले। तभी वहीँ से एक खाली शीशी में मिटटी का तेल भरा, उसमे लम्बी सी बत्ती लगाई, एक माचिश ली और चल पड़े। मैंने पूछा कि यह क्यों ली। बोला कि अँधेरा हो गया है, आगे रास्ता ढूँढने के काम आएगी। हालाँकि चांदनी रात थी। ज्यादा दूर तो नही लेकिन फ़िर भी अच्छा खासा दिख रहा था।
यहाँ तक कि रास्ते में जो झरने के पास चीड का पुल था, उसे भी हमने आसानी से पार कर लिया। इस बार जब काफ़ी दूर तक चढाई कर ली तो मुझे शक हुआ। मैंने पूछा कि यार हम इस रास्ते से तो आए नहीं थे। बोला कि हमने रास्ता बदल दिया है। कारण कि उस रास्ते पर भूत मिल सकते थे। मैंने पूछा कि जब उस रास्ते पर मिल सकते थे, तो इस पर भी मिल सकते हैं। बोला कि वो रास्ता नीचे घाटी से होकर जाता है। वह सुनसान इलाका है। जबकि यह इस पहाड़ पर ऊपर से जाता है, इसी पर घोडों का रास्ता है, इसलिए यहाँ भूत नहीं आते। मैंने पूछा कि आ तो सकते हैं। बोला कि हाँ, आ सकते हैं।
अब मैं सोचने लगा कि भूत वूत तो होते ही नहीं हैं, आख़िर ये लोग किस चीज को भूत कहते हैं। तभी मेरी निगाह पड़ी एक आदमकद आकृति पर। इसके हाथ पैर स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। रंग बिल्कुल काला। अगर काला ना भी हो तो रात होने की वजह से काला दिखाई दे रहा था। लेकिन इसमे कोई हलचल नहीं हो रही थी। पास जाने पर पता चला कि यह चीड के पेड़ का ठूंठ था, जो किसी कारण से जमीन से कुछ ऊपर से टूट गया था। अब तो मुझे पक्का यकीन हो गया कि भूत नहीं होते, पहाडी लोग रात को इसी तरह की घटनाओं से डर जाते होंगे। अगर भूत होते हैं तो उन्होंने हमें जाते समय कुछ क्यों नहीं कहा था।
कुल मिलाकर मै इस वातावरण में पूरा एन्जॉय लेता हुआ चल रहा था। जंगल की हर आवाज को सुनने की कोशिश करता हुआ। लगातार चढ़ते हुए ठण्ड तो लगनी बंद हो गई थी, पसीना भी आने लगा था। कुल मिलाकर शारीरिक रूप से बुरा हाल था।
तभी अचानक कुछ गिरा। शायद चीड का फूल गिरा हो। कुछ कुछ इसी तरह की आवाज आई जैसे कि सूखी पत्तियों में किसी ने कुछ फेंक कर मारा हो। चलो शुक्र था हमारे ऊपर नहीं गिरा। तभी एक और गिरा। चीड का जंगल है, कौन सा बड़ी बात है। नजरअंदाज करके बढ़ते गए।
तभी कहीं से झींगुरों के चिर्र चिर्र करने की आवाजें आने लगीं। बड़ी ही मस्त आवाजें। बिल्कुल ऐसे जैसे कोई घुँघरू बजा रहा हो। इतना होने के बावजूद भी अजीब सा जंगली सन्नाटा। इस रास्ते का उपयोग घोडों के आने जाने में होता है, इसलिए जगह जगह लीद भी पड़ी हुई थी। अचानक रमेश को ठोकर लगी। कोई बात नहीं। अब "तीसरे" ने कहा कि चलो मशाल जला लो। अच्छा खासा रास्ता दिख रहा था। मशाल जलने से आस पास का रास्ता तो दिख जाता था, लेकिन पैर कहाँ पड़ रहा है, ये पता नहीं चल पाता था। क्योंकि मशाल के नीचे तो अँधेरा ही था।
मशाल जलने के बाद मैंने गौर किया कि अब चीड के फूल गिरने और झींगुर बोलने बंद हो गये हैं। थोडी देर में जब हम निर्माणाधीन सड़क पर पहुंचे, मैंने रमेश से यही पूछा। उसने बताया कि ना तो चीड के फूल गिर रहे थे, ना ही झींगुर बोल रहे थे। यह सब भूतों की करतूत थी। आग से भूत डरते हैं, इसलिए मशाल जलने के बाद वे भाग गए।
है ना अजीब बात। तो क्या मैंने भी भूतों के अनुभव ले लिए? खैर, थोडी देर में हम घर जाकर खा पीकर सो गए।

अगले दिन सोमवार था। आज हमें दोनों को वापस नोएडा जाना था। आठ बजे तक तैयार होकर हम चल पड़े। यात्रा से पहले भाभी ने दोनों को तिलक लगाया। और अच्छी यात्रा की शुभकामनायें दी। पड़ोसियों ने मुझसे फ़िर दोबारा आने की गुजारिश की। कुल मिलकर माहौल बहुत ही उदासी भरा था।
कैमरा तो हमने खाली ही साथ ले लिया था। सोचा कि ऊपर मोतियापाथर से इसमे रील डलवा लेंगे। कैमरे में रील डलवाई। कुछ फोटू खींचे। स्कैन करके दिखा रहा हूँ। आप भी देखिये।

सामने हिमालय की बर्फीली चोटियाँ स्पष्ट दिख रही हैं। नीचे घाटी में भागादयूनी गाँव । हालाँकि उस समय बादल आ गए थे।

नीचे नीली टीन जो है वो मोतियापाथर में प्राइमरी स्कूल की है।

इस समय पहाड़ की चोटी पर हूँ, इसलिए दूसरे पहाड़ नहीं दिख रहे है।

यह मोतियापाथर है।

भीमताल-अल्मोडा रोड पर.दूर उस पहाड़ पर पहाड़पानी गाँव दिखाई दे रहा है।

1. मुसाफ़िर जा पहुँचा कुमाऊँ में (भाग-1)
2. मुसाफ़िर जा पहुँचा कुमाऊँ में (भाग-2)

3 comments:

  1. रोचक यात्रा विवरण है। कुछ नई चीजों के बारे में भी पता चल रहा है जैसे, वो खुजली वाली घास और तिराहे को बेन्ड कहा जाना। उम्मीद है अगली पोस्ट भी रोचक होगी।

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  2. मज़ा आ गया कुमाऊं यात्रा के लाईव टेलिकास्ट में। आगे की यात्रा के वर्णन का इंतज़ार रहेगा।

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  3. apka blog aur yatra sansmaran padhe ke behad achha laga. bahut achha likha hai apne.

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