Monday 9 November 2009

करोल टिब्बा और पांडव गुफा

अभी तक आपने पढ़ा कि मैं अकेला ही सोलन जा पहुंचा। यहाँ से आगे करोल के जंगलों में एक कॉलेज का ग्रुप मिल गया। और मैं भी उस ग्रुप का हिस्सा बन गया। फिर हम जंगल में भटक गए लेकिन फिर भी दो घंटे बाद करोल के टिब्बे पर पहुँच ही गए। अब पढिये आगे:-
टिब्बा यानी पहाड़ की चोटी पर छोटा सा समतल भाग। मेरे अंदाज से इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 2500 मीटर से ज्यादा ही होगी। पेडों पर बरफ के निशान स्पष्ट दिख रहे थे। यानी कि शिमला में बरफ पड़े या ना पड़े यहाँ जरूर पड़ती है। इसके आस पास इसके बराबर की चोटी नहीं है। इस कारण हवा पूरे जोश से बह रही थी - पेडों व झाडियों के बीच से सीटी बजाते हुए।
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यहाँ चोटी पर एक छोटा सा मंदिर है। दो-तीन मूर्तियाँ रखी हुई हैं और बीच में हवन कुण्ड है। बगल में एक धर्मशाला भी है। इसमें दो कमरे हैं। एक में ताला लगा हुआ है। नीची छत और बिना खिड़की की धर्मशाला है यह। बर्फ़बारी में भी थोडी देर आग जला लेने पर रात भर के लिए पर्याप्त गर्मी मिल सकती है। धर्मशाला के पीछे कंक्रीट की एक टंकी है। इसमें पीने के लिए पानी भरा रहता है। लेकिन मुझे अभी तक समझ नहीं आया कि यह टंकी भरती कैसे है। पहाड़ की चोटी पर प्राकृतिक पानी की कमी रहती है क्योंकि यह नीचे चला जाता है। ना ही यहाँ बिजली की व्यवस्था है इसलिए बोरिंग की भी सम्भावना नहीं है। हो सकता है कि नीचे से ही पाइप लाइन हो। लेकिन हमें पूरे रास्ते में कहीं भी पाइप नहीं दिखा और पहाड़ पर जंगल में भूमिगत लाइन नहीं होती।
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धर्मशाला की छत एक बेहतरीन व्यू पॉइंट है। यहाँ से पूरा सोलन शहर, दूसरी और शिमला, चायल, कसौली की मंकी हिल, चुरधार चोटी और जब्बरहट्टी हवाई पट्टी स्पष्ट दिख रही थी। शिमला की तरफ देखें तो अपर शिमला के पर्वत व किन्नौर की बर्फीली चोटियाँ भी दिख रही थीं। चूंकि मैं एक कॉलेज ग्रुप के साथ था तो मौज मस्ती तो होनी ही थी। सभी ने अपने अपने बैग खोले तो खाने की चीजें निकल पड़ीं। खा-पीकर मुलायम धूप में अन्त्याक्षरी खेलने लगे। यह नरम साफ धूप ही हमें ऊर्जा दे रही थी नहीं तो कभी के कुल्फी बन जाते।
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तीन बजे यहाँ से नीचे उतरना शुरू किया। इस बार हमने पगडण्डी नहीं छोड़ी और घंटे भर में एक ऐसी जगह पर पहुँच गए जहाँ पर एक मंदिर था। मंदिर के बराबर में एक घर बना हुआ था। बरामदे में फर्श पर मिर्चें सूख रही थीं। सामने गायों के लिए एक कमरा भी था। कुछ दूरी पर दो कुत्ते भी बंधे थे लेकिन वे भौंके नहीं। इसके अलावा चारों और जंगल ही जंगल। यहीं पर वन विभाग का बोर्ड भी लगा था-"जंगल में बिना अनुमति के जाना मना है। अनुमति लेने के लिए कंडाघाट वन विभाग से संपर्क करें।" एक आश्चर्य और था कि उस समय वहां कोई भी नहीं था - ना तो मंदिर में ना ही घर में।
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यह मंदिर था तो छोटा सा ही लेकिन बेहद खूबसूरत। मैं खुद को अर्धनास्तिक मानता हूँ इसलिए बाहर ही रहा। तभी एक आस्तिक जो मंदिर में गया था, खबर लाया कि मंदिर के पीछे एक गुफा है। यह खबर सभी के लिए महत्वपूर्ण थी। तुंरत ही मंदिर के पीछे पहुंचे। देखा कि चट्टानों के नीचे एक गुफा है। आखिर हम इसी गुफा को देखने के लिए ही तो सुबह से जंगल में भटक रहे थे।
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अन्दर घुसे। कुछ दूर तक तो नीचे उतरने के लिए सीढियां व रेलिंग थी। फिर कुछ नहीं। गुफा को ज्यादा से ज्यादा देखने के लिए हमने और अन्दर जाने का मन बना लिया। यहाँ घुप्प अँधेरा भी था। मोबाइल की टोर्चें जलाई गयीं। लेकिन यह भी अपर्याप्त थी। अन्दर पानी के रिसाव के कारण नमी व फिसलन थी। रिसाव से गुफा की चट्टानों पर अजीब-अजीब आकृतियाँ बन गयी हैं। कैमरे के फ्लैश से गुफा क्षण भर के लिए दिख जाती जो धरातल के गर्भ में ही जाती दिखती।
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इस गुफा को पांडव गुफा कहते हैं। किंवदंती है कि वनवास काल में पांडव यहाँ आये थे। यह गुफा यहाँ से चलकर कालका-पंचकुला के आसपास कहीं निकलती है। पांडव इसका उपयोग रहने व आने-जाने में करते थे। इसे हिमालय क्षेत्र की सबसे लम्बी गुफा भी माना जाता है। हम कम से कम पचास मीटर तक अन्दर घुस गए थे। अँधेरा व फिसलन होने के कारण और ज्यादा अन्दर नहीं गए।
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इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य था - गुफा देखना। अब तो फटाफट सोलन पहुंचना था। सोलन पहुंचकर सभी ने मुझे भावविभोर होकर विदाई दी - फिर कभी दोबारा आने का वचन लेकर।
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अब एक सलाह शिमला जाने वालों के लिए। तुम लोग हफ्तों शिमला के होटलों में बिता देते हो। इस बार करोल में भी एक दिन बिताकर देखना। लेकिन अपनी गंदगी व प्लास्टिक फैलाने की आदत से बाज आकर। जब हम वापस आये थे तो हमारे साथ दो बैग ऐसे थे जिनमे प्लास्टिक का कूड़ा भरा हुआ था - बोतलें व चिप्स के पैकेट। सभी को कम से कम अपनी गंदगी तो वापस लानी ही चाहिए।
(धर्मशाला की छत पर)
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(टिब्बे पर बना मन्दिर)
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(वो जो सामने चोटी पर कुछ सफ़ेद सा दिख रहा है, जानते हैं की वो क्या है? वो है चायल के पास एक मन्दिर)
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(सामने पहाडी पर फैला सोलन शहर)
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(पांडव गुफा के पास लगा वन विभाग का बोर्ड)
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(इसके बारे में भी कुछ लिखना है?)
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(देखा है भारत में ऐसा मन्दिर? इसी मन्दिर के पीछे गुफा है।)
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(गुफा का प्रवेश द्वार)
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(गुफा में कुछ दूर तक तो रेलिंग है)
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(गुफा का अंदरूनी भाग)
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(मोबाइल की टॉर्च से गुफा देखता हुआ। दिख रहा है ना?)
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(सभी फोटो कैमरे के फ्लैश से खींचे गए हैं। एकदम घुप्प अँधेरा था।)
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(जगह-जगह नुकीली चट्टानें भी निकली हुई हैं।)
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(पानी के रिसाव से अजीब अजीब आकृतियाँ बन गई हैं।)
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(पानी की ताकत। चट्टानों पर स्थाई निशान छोड़ दिए हैं।)
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(अच्छा, अब अलविदा आप सभी को। फ़िर कभी मिलेंगे। अगर मुझे आप ना मिलते तो शायद ना तो मैं गुफा ही देख पाता ना ही टिब्बे तक पहुँच पाता।)
घुमक्कडी जिंदाबाद

Friday 6 November 2009

आज हमारे ब्लॉग का जन्मदिन है

पिछली दो पोस्टों से इस ब्लॉग पर करोल यात्रा का सचित्र विवरण छापा जा रहा है। करोल का मुख्य आकर्षण पांडव गुफा है। तभी अपने घुमक्कड़ साथी मुनीश का फोन आया। बोले कि भाई, तुमने पहले भाग में भी गुफा नहीं दिखाई और अब दूसरे भाग में भी नहीं दिखाई। जल्दी दिखाओ, मैं उतावला हो रहा हूँ। मैंने कहा कि साहब, अभी दो भागों का इन्तजार और करना पड़ेगा। हम आपको गुफा बाद में दिखाएँगे, 6 नवम्बर को हमारे ब्लॉग का जन्मदिन है, पहले पूरी धूमधाम से जन्मदिन मनाएंगे।
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आज के दिन मैंने अपने लिए एक क्रांतिकारी खोज की थी। वह खोज थी - अपना ब्लॉग बनाना। उत्साह-उत्साह में लगातार चार छोटी-छोटी पोस्टें भी डाल दी थी। लेकिन अगले दिन कोई टिप्पणी नहीं आई। उन दिनों मैं टिप्पणी पाने के लिए लिखता था। पहली टिप्पणी आई 6 दिन बाद यानी बारह नवम्बर को ताऊ की और वो पोस्ट थी - क्या ऐसे ही होते हैं जाट?
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जब तक मैं हरिद्वार में रहा, सप्ताह में छः पोस्ट डाल ही देता था। दिल्ली आने पर जैसे-जैसे घुमक्कडी बढ़ी, पोस्टों की संख्या कम होने लगी। इसी के साथ गुणवत्ता में भी बढोत्तरी हुई। मैं कुछ दिन से एक अंग्रेजी ब्लॉग भी बनाने की सोच रहा था। ताकि मेरी घुमक्कडी का मजा हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेज भी उठा सकें। लेकिन इसके लिए पहले मुझे ही अंग्रेजी सीखनी पड़ेगी।
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अच्छा हाँ, आज जब जन्मदिन है तो केक-कूक की भी मांग बढेगी। अपना जन्मदिन तो मैंने सूखा ही मना लिया था। लेकिन ब्लॉग का जन्मदिन सूखा नहीं मनाएंगे। हिंदुस्तान की अलग-अलग जगहों से केक लाये गए हैं। जो भी केक अच्छा लगे, उसे खुद ही काट-वाट लेना और खा भी लेना। ठीक है? फिर बाद में मुझसे मत कहना कि हमारे हिस्से का केक कहाँ है?
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कैसे लगे केक? अगर आप ऊपर वाले चित्रों को देखकर बता सको कि ये कहाँ के हैं तो कृपया बता दें।
घुमक्कडी जिंदाबाद

Monday 2 November 2009

करोल के जंगलों में

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस तरह मैं सोलन जा पहुंचा। सोलन हिमाचल प्रदेश में स्थित है और कालका-शिमला के बिलकुल बीच में है। मुझे यहाँ से आगे करोल टिब्बा जाना था। इसके पास ही कोई प्रसिद्ध गुफा है। सोलन से दो-तीन किलोमीटर आगे चम्बाघाट है। चम्बाघाट से करोल जाने के लिए पैदल चलना पड़ता है।
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यहाँ से करोल जाने का जो रास्ता मुझे बताया गया, उसकी दिशा एक ऐसी पहाडी की और है जो ज्यादा ऊँची नहीं दिख रही थी। मेरा अंदाजा था कि वो गुफा व गुफा के पास बना एक मंदिर इस पहाडी के उस पार होना चाहिए। जल्दी ही चम्बाघाट क़स्बा भी पीछे छूट गया। अब मेरा साथ दे रहे थे केवल जंगल, पर्वत व कंक्रीट की बनी पगडण्डी। जितना ऊपर चढ़ता जा रहा था, चम्बाघाट व सोलन शहर भी उतने ही विहंगम लग रहे थे। कभी-कभी रास्ते में कोई मिल भी जाता था, उससे रास्ता कन्फर्म कर लेता था।
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तभी कुछ आगे ऊपर शोर सुनाई दिया - इंसानी शोर। शोर सुनकर ही लगभग मालूम पड़ जाता है कि यह शोर क्यों हो रहा है। मुझे लगा कि आठ-दस लड़के हैं और शायद वे भी करोल ही जा रहे हैं। वह एक हँसी-मजाक व तफरीह का शोर था। जल्दी ही मैं उनके पास जा पहुंचा। देखा कि काफी बड़ा ग्रुप है। इसमें कुछ लड़कियां व कुछ लड़के थे। खूब हा-हा, हू-हू करते हुए चल रहे थे। मेरी ये आदत है या कहिये कमी है कि मैं बाहर किसी से घुलमिल नहीं पाता हूँ। इसलिए उनसे बिना कुछ कहे सुने ही मैं आगे निकल गया। सभी के पास कमर पर लटके बैग थे तो जाहिर था कि वे भी करोल ही जा रहे होंगे।
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आगे एक महिला मिली। वे नीचे चम्बाघाट से ऊपर अपने गाँव जा रही थी। उन्होंने बताया कि गुफा अभी भी बहुत दूर है। कम से कम दो घंटे और लगेंगे। सीधे इसी पगडण्डी से चलते जाना, पहुँच जाओगे।
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आगे बिलकुल सीधी खड़ी चट्टान थी। यहाँ कंक्रीट की पगडण्डी नहीं थी। केवल कटर से चट्टान को काटकर रास्ता बना रखा था। यहीं पर एक चट्टान ऐसी काटी गयी थी कि दो दिशाओं में दो पगडंडियाँ जाती दिखाई दीं। मेरा दिमाग खराब हो गया कि किस रास्ते से जाऊं। अब मैंने एक ट्रिक सोची। यहीं बैठकर उस ग्रुप की प्रतीक्षा करने लगा। जब वे लोग पास आते दिखे, फटाफट चढ़कर एक पगडण्डी पर चलने लगा। और थोडी दूर जाकर फिर बैठ गया।
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मुझे देखना ये था कि वे लोग किस रास्ते से जायेंगे। अगर मेरी तरफ आये तो मेरी बल्ले-बल्ले हो जायेगी। और अगर दूसरी तरफ से चले गए तो मैं भी उनके पीछे-पीछे हो लूँगा। यानी कि दोनों हाथों में लड्डू। भटकूँगा नहीं। अच्छा, जब वे उस 'तिराहे' पर पहुंचे, तो उनका भी दिमाग खराब हो गया होगा। संयोग से उनमे से एक ने मुझे देख लिया। बस, फिर क्या था। सभी मेरी तरफ ही आने लगे।
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यहाँ से आगे भी पगडण्डी बहुत ही खराब हालत में थी। रास्ते में कोई मिल भी नहीं रहा था, इसलिए मुझे उस ग्रुप के साथ ही मिलना पड़ा। वे कुल सोलह जने थे - आठ लड़के व आठ लड़कियां। सोलन से ला स्टुडेंट थे यानी कानूनी छात्र। मेरा परिचय जानकार सभी आश्चर्यचकित रह गए कि तुम केवल करोल के लिए दिल्ली से यहाँ आये हो!
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अच्छा हाँ, हमने उस तिराहे से वो जो दूसरी पगडण्डी भ्रमवश छोड़ दी थी, वही असली रास्ता था। वही गुफा के पास से होता हुआ टिब्बे तक जाता था। इधर हम, थोडा आगे चलकर यह पगडण्डी ख़त्म होनी ही थी और ख़त्म हो भी गयी। अब हमारे आगे था चीड - देवदार का घना जंगल, घुटनों से ऊपर तक उगी घास। अब हम गुफा तक तो पहुँच ही नहीं सकते थे, टिब्बे पर पहुँच सकते थे। टिब्बा कहते हैं किसी पहाड़ की चोटी पर छोटा सा समतल भाग। चोटी पर पहुँचने के लिए हमें लगातार ऊपर चढ़ते रहना था। बिना किसी रास्ते के झाडियों में चलते हुए हम भी चढ़ते ही जा रहे थे। ज्यादातर झाडियाँ कंटीली थी। दल के सदस्य बारी-बारी से डंडे से कंटीली झाडियों को हटाते और तब बाकी वहां से निकलते।
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घंटा डेढ़ घंटा बीत गया। सभी में निराशा छाने लगी। एक ने कहा कि वापस चलो। लेकिन वापस भी नहीं जा सकते थे। आगे बढ़ रहे हैं तो आखिरकार चोटी पर पहुंचेंगे भी। अगर अभी वापस हो जायेंगे तो नीचे घाटी में खो जायेंगे। रास्ता भी नहीं मिलेगा।
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डेढ़ घंटे बाद। एक पगडण्डी मिली। यहीं वो पगडण्डी थी, जिसे हमने उस 'तिराहे' पर छोड़ दिया था। यह सीधी चोटी पर यानी टिब्बे पर जाती है। करोल के टिब्बे पर।
(...जारी)
(जंगल के बीच में)
(कंक्रीट की पगडण्डी और पीछे सोलन शहर)
(ये टेढ़े मेढे रास्ते)
(यही तो हिमालय का आनंद है)
(मैंने कैमरे को एक झाड़ पर सेट कर दिया और टाइमर लगा दिया।)
(कंक्रीट की पगडण्डी ख़त्म। अब शुरू होती है खेतों के बीच से कच्ची पगडण्डी। इन खेतों में मक्का बो रखी है।)
(यहाँ टमाटर व शिमला मिर्च भी खूब बोई जाती है। अपने खेत से टमाटर इकट्ठे करता एक बालक। मैंने भी इससे बात करते-करते तीन-चार टमाटर खा डाले।)
(रास्ते में कई बुग्याल मिले। बुग्याल कहते हैं पहाड़ पर घास के मैदान को।वैसे बुग्याल एक गढ़वाली शब्द है।)
(यह एक ताल है जिसमे थोड़ा पानी था। है ना खूबसूरत नजारा!)
(इसके बारे में भी कुछ लिखने की जरुरत है?)
(रास्ता ढूंढो और आगे बढो।)
(चोटी से किन्नौर के बर्फीले पहाड़ भी दिख रहे थे। दूर एक हलकी सी लकीर दिख रही है।)



घुमक्कडी जिंदाबाद

Thursday 29 October 2009

चलो सोलन की ओर

एक महीने से भी ज्यादा समय हो गया था कहीं गए हुए। पिछले महीने देवप्रयाग गया था। तभी एक दोस्त ललित को पता चला कि मैं घुमक्कडी करता हूँ। बोला कि यार अब जहाँ भी जाएगा, बता देना, मैं भी चलूँगा तेरे साथ। अब मैंने अपना दिमाग लगाया। सोचा कि मेरी तरह इसे भी तीन-चार दिन की छुट्टी आराम से मिल जायेगी। चल बेटे, केदारनाथ चलते हैं। बैठे-बिठाए थोडी देर में ही तय हो गया कि कब यहाँ से चलना है, कब वहां से चलना है। लेकिन 19 अक्टूबर को केदारनाथ के कपाट बंद हो गए। कपाट बंद होते ही अगले के तो तोते उड़ गए। बोला कि नहीं यार, इस रविवार को मेरी फलानी परीक्षा है। वैसे भी अब क्या फायदा वहां जाने का? वहां तो भगवान् जी के भी दर्शन नहीं होंगे। अगली बार चलूँगा, जहाँ भी तू कहेगा, पक्का।
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ललित ने तो इस बार मेरे साथ जाने से मना कर दिया लेकिन उधर मेरी हालत खराब होनी शुरू हो गयी। पेट में घुमक्कडी के खदके लगने शुरू हो गए, गैस के गोले बनने लगे। इसका मतलब था कि कहीं ना कहीं जाना ही पड़ेगा। तभी आशीष खंडेलवाल से लाइन मिल गयी। उन्होंने फिलहाल जयपुर आने से मना कर दिया। ऑफिस वर्क की अति होने की वजह से। नैनीताल वाली विनीता यशस्वी से संपर्क किया। उन्होंने ना तो ना की, ना ही हाँ की। कहा कि बाद में बताती हूँ। अभी तक तो बताया नहीं।
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अब मैंने वो फैसला लिया, जिसे ऐसी परिस्थितियों में लेता ही हूँ। अकेला ही जाऊँगा। पहले तो हिमाचल में मण्डी जाने का प्लान बना। बना और कैंसल हो गया। फिर नैनीताल, फिर अमृतसर, फिर रेल संग्रहालय दिल्ली। शनिवार की शाम को दिमाग में आया - सोलन। हिंदुस्तान के एक व्यस्त पर्यटन मार्ग कालका-शिमला के बीचोंबीच है सोलन। हिमाचल प्रदेश का एक जिला।
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दिल्ली की रातों में आजकल ठंडक बढ़ने लगी है। तो जाहिर सी बात है कि 1600 मीटर की ऊंचाई वाले सोलन में तो और भी ज्यादा ठण्ड होगी। बैग में एक गर्म इनर रखा और चल पड़ा। कश्मीरी गेट से रात को दस बजे शिमला वाली बस पकड़ी और 25 अक्टूबर 2009 को सुबह छः बजे सोलन जा पहुंचा। मैं पहले से ही सोचकर आया था कि करोल का टिब्बा जाना है। वहां कोई गुफा-वुफा भी है। लेकिन यहाँ आते ही ठण्ड से बुरा हाल हो गया। बिलकुल पाला पड़ रहा था। बस स्टैंड के पास तो ज्यादा खुला नहीं है इसलिए धूप भी नहीं थी। मैं नीचे रेलवे स्टेशन पर चला गया। वहां धूप थी। मैं धूप में एक-डेढ़ घंटे तक बैठा रहा।
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अगर सोलन शिमला नहीं है, तो शिमला से कम भी नहीं है। यहाँ भी मॉल रोड है, जिस पर शाम के समय ट्रैफिक बंद कर दिया जाता है। शिमला की ही तरह यह भी कई पहाडियों पर काफी बड़े भाग में बसा हुआ है। लेकिन चूंकि यहाँ 'बाहरी लोग' नहीं आते, इसलिए ज्यादा शांत भी है। आसपास घूमने को भी बहुत कुछ है। चायल (चैल) है, जटोली है, अर्की है, बडोग है और करोल है। जब धूप बढ़ने लगी तो मुझमे भी हलचल हो गयी। नाश्ता करके 2-3 किलोमीटर दूर चम्बाघाट पहुंचा। करोल के लिए रास्ता यहीं से जाता है। यहाँ रेल का फाटक भी है। मेरे सामने एक ट्रेन भी गुजरी थी।
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यहाँ तक पंजाबी बोली का बाहुल्य है। मैंने एक सब्जी वाले से करोल का रास्ता पूछा तो उसने उल्टे मुझसे ही पूछ लिया -"ओ, केल्ले हो क्या?"
"हाँ जी, केल्ला ही हूँ।"
"यार, तैन्नूं बहोत चढाई करणी पड़ेगी।"
"कोई गल्ल नी जी।"
"तो जाओ, उत्थे मकानां विच्च रस्ता जांदा है। बाब्बे दी किरपा से पहोंच ही जाओगे।"
(यह है ललित। बेटे, ऑफिस में बैठकर मुस्कराना बहुत आसान है, जब मेरे साथ 'साईट' पर चलेगा तब पता चलेगा।)
(सोलन में एक रेलवे सुरंग)
(सामने है सोलन का रेलवे स्टेशन। वहां धूप में मैंने डेढ़ घंटा बिताया, तब जाकर मुझे गर्मी मिली।)
(सोलन शहर का एक हिस्सा)
(चम्बाघाट में रेल-रोड क्रोसिंग और सामने से आती ट्रेन)
(जारी)

घुमक्कडी जिंदाबाद

Monday 26 October 2009

जब पहली बार ट्रेन से सफर किया

मैंने पहली बार ट्रेन से सफ़र किया था आज से लगभग साढे चार साल पहले यानी अप्रैल 2005 में। भारतीय नौसेना की परीक्षा देने कानपुर जाना था। मैंने तब तक ट्रेन देखी तो थी लेकिन बैठा नहीं था। यहाँ तक कि मेरठ सिटी रेलवे स्टेशन भी नहीं देखा था। मेरठ छावनी तो देख रखा था - दो प्लेटफोर्म वाला।
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इन परिस्थितियों में पिताजी मुझे अकेले नहीं भेज सकते थे। बोले कि मैं चलूँगा तेरे साथ। इतने लम्बे सफ़र के लिए रिजर्वेशन भी नहीं कराया। तब तो मुझे भी नहीं पता था कि रिजर्वेशन नाम की भी कोई चीज होती है। मेरठ सिटी पहुंचे। मैं अति हर्ष उल्लाषित हो रहा था कि आज ट्रेन में बैठूंगा। पिताजी की आज्ञा से मैं ही कानपुर के दो टिकट लाया।
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शाम को सात बजे ट्रेन यहाँ से चलनी थी। अभी पांच ही बजे थे। हाँ, ट्रेन थी संगम एक्सप्रेस, जो मेरठ सिटी से इलाहाबाद जाती है। यह यहीं से बनकर चलती है। लेकिन फिर भी पिताजी ने एक कुली को बीस रूपये दे दिए- जनरल डिब्बे में एक बर्थ कब्जाने के लिए। जब खाली ट्रेन प्लेटफोर्म पर आकर लगी तो भारी धक्का-मुक्की के कारण मैं तो चढ़ ही नहीं पाया। जब धक्कामुक्की शांत हो गयी तब अन्दर घुसा। आज पहली बार ट्रेन के अन्दर घुसा था। पिताजी ऊपर एक बर्थ पर बैठे थे और मैं भी वहीं जा बैठा।
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ठीक सात बजे ट्रेन चल पड़ी। मन मीलों उछल रहा था। विश्वास नहीं हो रहा था कि आज मैं ट्रेन में हूँ। यहाँ एक और अनुभव हुआ। ट्रेन के चलने से खड-खड, खड-खड की जो जोर जोर से अनवरत आवाज आ रही थी, यह कहाँ से आ रही है? ओहो, आ गया समझ में। डिब्बे के नीचे शायद ढोल जैसा कुछ बाँध रखा है जो ट्रेन के चलने पर बजता है ताकि सवारियां सो ना जाएँ और रात बे-रात को आने वाले अपने स्टेशनों पर उतर सकें। वास्तविकता बहुत बाद में पता चली। हापुड़ पहुंचे। भीड़ जैसे ट्रेन का ही इन्तजार कर रही थी। इसके बाद बाहर अँधेरा हो गया।
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घंटे डेढ़ घंटे बाद एक और स्टेशन आया। भीड़ में हलचल हुई। किसी ने कहा कि खुर्जा है। अब तक मैं भी आदी हो चुका था। लेटा और सो गया। लेकिन नींद कहाँ!!! कुछ देर बाद आवाज आई कि अलीगढ पहुँच गए हैं। रात ग्यारह बजे के बाद यहाँ से चली। जहाँ भी रूकती, वहीं चाय-चाय का शोर मच जाता। अन्दर भी एक हलचल होती। कोई पूछता कि कहाँ आ गए। कई लोग बताते कि टूंडला आ गए। टूंडला? यह भी कोई स्टेशन है? हा हा हा हा। क्या नाम है!!!!! टूंडला।
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मन ही मन में सोच रहा था कि इतने घंटे हो गए चलते हुए। दूर बहुत दूर क्षितिज में गाँव की एक हलकी सी धुंध सी दिखती। बीच में हापुड़ भी दिखता, खुर्जा भी दिखता।
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आधी रात से ज्यादा हो गयी थी। अब कोई सवारी ना तो उतरती थी, ना ही चढ़ती थी। सब सोये पड़े थे। स्टेशन आये, गाडी रुके, कोई मतलब नहीं। अब पता नहीं चल रहा था कि कहाँ पहुँच गए। ढाई तीन बजे के आसपास कानों में एक हलकी सी आवाज आई - इटावा है। गाँव की और देखा। अब गाँव और छोटा हो गया था। अपना घर भी दिखा, सब सोये पड़े थे।
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सुबह पांच बजे। ट्रेन में जबरदस्त हलचल हो गयी। हर कोई अपना सामान समेट रहा था। ट्रेन रुकी तो पिताजी की भी आँख खुली। मुहं से निकल पड़ा - कौन सा स्टेशन है? कईयों ने तुंरत बताया- कानपुर है। चल बेटे, उतर। कानपुर पहुँच गए। आँखों में नींद भरी हुई, अलसाया सा मैं भी ट्रेन से उतर गया। फिर गाँव की और देखा। इटावा दिख रहा था, टूंडला भी दिख सा रहा था, अलीगढ पर धुंध सी छाई थी। लेकिन गाँव स्पष्ट दिख रहा था। मां ने दूध दुह लिया था।

Thursday 22 October 2009

घुमक्कडी का एक टिप

आज बहुत दिन बाद घुमक्कडी से पीछा छूटा है तो सोचा कि चलो एक-आध किस्से व टिप्स सुना दिए जाएँ। मैं जब भी कहीं जाता हूँ तो वहीं के लहजे में बात करने की कोशिश करता हूँ। मैं नहीं चाहता कि वहां के लोग मुझे पर्यटक समझें। गंदे से जूते, बेतरतीब कपडे, बढ़ी हुई दाढी, शर्ट की बाजू कोहनी से ऊपर तक फोल्ड और सबसे बड़ी बात - स्थानीय लहजा। ऐसा करने के कई फायदे होते हैं। एक तो सुरक्षा मिलती है, ठगी व धोखाधडी से भी बचते हैं। रास्ता पूछना हो तो दुकानदारों से पूछता हूँ, रिक्शेवाले व टम्पूवालों से ठगे जाने का डर रहता है।

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अभी अगस्त में जब मैं भोपाल गया तो आदिमानव की कलाकारी देखने भीमबैठका भी चला गया। रातापानी अभयारण्य के घने जंगलों में स्थित है भीमबैठका की गुफाएं। गुफाओं को विस्तार से देखने के लिए गाइड की जरुरत पड़ती है। गाइड वहीं पर बैठे मिल जाते हैं। लेकिन ऐसे में हमें भी सावधानी बरतनी पड़ती है। उन सुनसान गुफाओं में स्थानीय गाइड (जिनमे एकाध नकली भी हो सकता है) क्या नहीं कर सकते? मारकर भी फेंक देंगे तो लाश ढूँढने से भी नहीं मिलेगी।

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घुमाते हुए ही गाइड ने मुझसे पूछा -"कहाँ से आये हो?"

"भोपाल से।"

"अच्छा, भोपाल में ही रहते हो?"

"हाँ।"

"कहाँ पर?"

"गांधीनगर में।"

(सोचते हुए) "गांधीनगर....ये कहाँ पर है?"

"शास्त्रीनगर के पास में।"

"अच्छा-अच्छा, ठीक है। समझ गया।"

वैसे मुझ दिल्ली में रहने वाले को ना तो तब पता था और ना ही अब पता है कि भोपाल में गांधीनगर व शास्त्रीनगर हैं भी या नहीं। फिर उसने पूछा कि आप अकेले ही आये हो?

"नहीं, हम छः जने हैं। बाकी सभी बाहर बैठे हैं। उन्होंने गुफाएं देख रखी हैं।"

अगर मैं उनसे सही-सही बता देता कि दिल्ली से आया हूँ और अकेला हूँ तो और बात होती।

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मेरी यह चोरी पकड़ी भी जाती थी। गुफाओं से मेन रोड तीन किलोमीटर दूर है और मैं पैदल जा रहा था। हलकी-हलकी फुहार पड़ रही थी। फुहार और सतपुडा की पहाडियों का मजा लेने के लिए मैं किनारे एक पत्थर पर बैठ गया। तभी सामने से एक मोटरसाईकिल गुजरी। इसमें पंचर हो गया था। मुझे याद है कि इस पर दो लडकियां भी थीं। खैर, थोडी देर बाद वे दोनों भी पैदल निकल गयी। उनके जाने के बाद मैं उठा और अपनी चाल से चलने लगा। जब मैं उनके बराबर से निकला तो एक ने टोका - "हेलो, आप मेन रोड से पैदल ही आये थे?"

"हाँ।"

"हमारी मोटरसाईकिल में पंचर हो गया है। अब हमें भी वहां तक पैदल ही घिसटना पड़ेगा। कितना दूर और हैं अभी?"

"दो किलोमीटर।"

(थोड़ी देर रूककर) "आप कहाँ से आये हो?"

"भोपाल से।"

"वहीं के रहने वाले हो?"

"हाँ।"

"कहाँ के?"

अब मैंने पलटते हुए पूछा -"क्यों, आप कहाँ की हो?"

"हम भी भोपाल की ही हैं।"

"अच्छा, मैं असल में इंदौर का रहने वाला हूँ। यहाँ मेरे कुछ दोस्त रहते हैं।"

"अच्छा, इंदौर में मेरे मामाजी हैं। आप इंदौर में कहाँ रहते हैं?"

"शास्त्रीनगर में।"

"अच्छा, ठीक है।"

जब मैंने देखा कि ये भी भोपाल की ही हैं और मेरी 'चोरी' पकड़ी जायेगी तो मैंने खुद को इंदौर का बता दिया। गांधीनगर, शास्त्रीनगर जैसी कालोनियां तो हर शहर में मिल ही जाती हैं।

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और हाँ, उन लड़कियों को अगर मैं दिल्ली भी बता देता तो भी कोई दिक्कत नहीं थी। क्या पता....

Thursday 8 October 2009

चन्द्रबदनी - एक दुर्गम शक्तिपीठ

नवरात्र ख़त्म हो गए हैं। इन दिनों जम्मू स्थित वैष्णों देवी हो या हिमाचल वाली ज्वाला देवी आदि, सभी के दरबार में भयानक भीड़ रहती है। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी 'शक्ति' के दर्शन कराएँगे जो सुगम होने के साथ-साथ दुर्गम भी है। सुगम तो इसलिए कि मंदिर तक जाने के लिए करीब-करीब एक किलोमीटर चलना पड़ता है और दुर्गम इसलिए कि इतना सुगम होने के बावजूद भी लोग-बाग़ वहां नहीं जाते। यह उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में है। और समुद्र तल से लगभग 2500 मीटर की ऊंचाई पर। जाडों में यहाँ बरफ भी पड़ती है।
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पिछली पोस्ट में जब मैं देवप्रयाग गया था, तो पता चला कि चन्द्रबदनी देवी यहाँ से ज्यादा दूर नहीं है। अगर आप अभी तक देवप्रयाग नहीं गए हैं तो सलाह मानिए और फटाफट पहुँचिये। सुबह-सुबह संगम में स्नान करके सीधे तहसील के पास पहुँच जाओ और यहीं खड़े होकर हिण्डोलाखाल जाने वाली बस या जीप की प्रतीक्षा करो। अगर अपना वाहन लेकर आये हो तो सीधे हिण्डोलाखाल निकल जाओ और मेरी प्रतीक्षा करो। मैं अभी बस से आ रहा हूँ। देवप्रयाग से हिण्डोलाखाल तक महड, कांडीखाल जैसे करीब दर्जनभर गाँव पड़ते हैं। इन गांवों को हम लोग गढ़वाली गाँव कहते हैं। समुद्र तल से ऊंचाई भी लगातार बढती जाती है।
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हिण्डोलाखाल- ऊंचाई 1472 मीटर। गाँव कम क़स्बा ज्यादा लगता है। इसी सड़क पर और आगे जाएँ तो करीब आठ किलोमीटर पर एक और गाँव पड़ता है- जामणीखाल (ऊंचाई 1530 मीटर)। जामणीखाल से यह सड़क आगे जखणीधार और टिहरी चली जाती है लेकिन एक और सड़क निकलती है जो चन्द्रबदनी जाती है। यहाँ से चन्द्रबदनी आठ किलोमीटर है। इसमें से शुरूआती सात किलोमीटर तो मोटर मार्ग है और बाकी एक किलोमीटर है पैदल मार्ग। हम तो जामणीखाल से ही पैदल निकल पड़े थे। एक बाबाजी ने जामणीखाल से ही इशारा करके बता दिया था कि वो जो सबसे ऊंची चोटी दिख रही है, उसी पर मंदिर है। तुम तो जवान बालक हो, घंटे भर में ही पहुँच जाओगे।
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पहाड़ पर जंगल में चलते हुए सबसे ज्यादा डर होता है- रास्ता भटकने का। लेकिन अगर लक्ष्य चोटी हो और वो दिख भी रही हो तो कोई दिक्कत नहीं होती। इसीलिए हम बार-बार सड़क को छोड़कर कोई 'शोर्ट' रास्ता ढूंढते और थोडी देर चढ़ने के बाद फिर वही सड़क मिल जाती। अभी कुछ ही दिन पहले देवप्रयाग क्षेत्र में नरभक्षी 'बाघ' (पहाड़ पर तेंदुए को भी बाघ ही कहते हैं) का आतंक था। प्रशासन से अनुमति पाकर ग्रामीणों ने पांच बाघों को मार भी दिया था। इतना जानने के बाद भी हम इस अनजाने पहाडी जंगल में 'शोर्ट' रास्ते से चलते जा रहे थे। एक बार तो हम कंटीली झाडियों में इतनी बुरी तरह फंस गए थे कि वहां से निकलने के लिए हमें सांप की तरह रेंगकर झाडियों के नीचे से निकलना पड़ा था।
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आगे एक तिराहे पर बोर्ड लगा था- झल्ड। यानी तीसरा रास्ता नीचे झल्ड गाँव में जाता है। एक गाँव और मिला - नैखरी (1831 मीटर)। यहाँ से एक कंक्रीट की बनी 'पगडण्डी' ऊपर जाती है। एक विकट चढाई चढ़ने के बाद हम पहुंचे उस जगह पर जहाँ से आगे गाडियां नहीं जा सकतीं। यानी मंदिर से एक किलोमीटर पहले।
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इस जगह पर देवी सती का धड गिरा था। यहाँ से हिमालय की बर्फीली पहाडियां भी दिखती हैं, जिनमे गंगोत्री शिखर प्रमुख है। उस दिन धुंध छाई हुई थी, इसलिए बर्फ नहीं दिखी। और हाँ, नवरात्र होने के बावजूद भी भीड़ नाम की कोई चीज नहीं। इक्का-दुक्का लोग ही आ रहे थे, जो स्थानीय निवासी ही थे।
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अब ये भी बताऊँ कि हमने कितने का प्रसाद लिया, कितनी देर रुके, क्या-क्या किया? मंदिर देखना तो एक बहाना था गढ़वाल की इन वादियों में, इन छोटे-छोटे गांवों में घूमने का। असली देवता तो ये पर्वत हैं। इन पर छाई हरियाली ही देवी है। वापस आते हुए एक 'अम्मा' मिलीं जो झल्ड से जामणीखाल ही जा रहीं थीं। कितनी ममतामयी बातें थीं उनकी! उनके दो लडकियां हैं, दोनों की शादी हो चुकी है, लड़का नहीं है। बोली कि मेरी बहन के दो लड़के हैं, दोनों ही बिलकुल तुम्हारे जैसे हैं। तुम्हे देखकर मुझे वे ही याद आ गए।
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अम्मा ने बताया कि हमारे पहाड़ के लोग 'बाहरी' लोगों की बहुत इज्जत करते हैं। तुम किसी भी गाँव में चले जाओ, तुम्हे खाने-पीने, उठने-बैठने व सोने की कोई दिक्कत नहीं होने देंगे। हमारे यहाँ गढ़वाली भाषा बोली जाती है जिसे तुम लोग नहीं समझ पाओगे। अगली बार जब भी इधर आओ, तो देवप्रयाग में मत रुकना बल्कि झल्ड चले आना। यहाँ भी ना आओ तो किसी भी गाँव में चले जाना, हर जगह तुम्हे एक सा ही व्यवहार मिलेगा। अम्मा से बात करके सचिन बहुत प्रभावित हुआ। बोला कि कितनी इज्जत करते हैं ये लोग हमारी। और हम, अपने यहाँ कितनी आसानी से इनकी मजाक व बेइज्जती कर देते हैं।
(चल अकेला, चल अकेला। यह है सचिन)
(प्यास लग गई, चलो पानी पी लें।)
(चल चला चल। वो जो दूर धुंधली सी चोटी दिख रही है, वही जाना है।)
(नीचे वाला रास्ता झल्ड गाँव जाता है, जबकि ऊपर वाला चन्द्रबदनी)
(वीर तुम बढे चलो)
(यह है नैखरी गाँव। दूर सबसे ऊँची चोटी चन्द्रबदनी ही है।)
(बाबाजी, जरा रास्ता बता देना। आओ, बेटा, तुम्हे छोड़ दूँ।)
(बस, थोड़ा सा और चलना है। सो लूँ।)
(जय मां चन्द्रबदनी।)
(देख नजारे कुदरत के)
(अरे भाई, कंजूसों के सामने हाथ फैला रहे हो? तो चलो, तुम्हारे फोटू खींच लूँ। अब खुश।)
(चाउमीन)
(आ, अब लौट चलें।)
(यह है झल्ड गाँव। वापसी में हमने नैखरी से ही एक पगडण्डी पकड़ ली थी। संयोग से हम जंगल में भटके नहीं और झल्ड पहुँच गए।)
कैसे लगे फोटू?

Thursday 24 September 2009

देवप्रयाग - गंगा शुरू होती है जहाँ से

देवप्रयाग से वापस आकर जब मैंने अपने एक बिहारी दोस्त से बताया कि मैं देवप्रयाग से आया हूँ तो वो बोला कि -"अच्छा, तो तू इलाहाबाद भी घूम आया।" मैंने कहा कि नहीं भाई, मैं इलाहाबाद नहीं, देवप्रयाग गया था। बोला कि हाँ हाँ, एक ही बात तो है। इलाहाबाद को प्रयाग भी कहते हैं। अब तू उसे देवप्रयाग कह, शिवप्रयाग कह या रामप्रयाग कह। तेरी मर्जी।
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घरवालों, घरवाली, बॉस व ऑफिस में डूबे रहने वाले कुँए के मेंढकों को क्या मालूम कि इलाहाबाद के प्रयाग की ही तरह और भी प्रयाग हैं जिनमे से गढ़वाल के पांच प्रयाग प्रमुख हैं। प्रयाग कहते हैं जहाँ दो नदियाँ मिलती हैं। इसे संगम भी कहते हैं। इलाहाबाद में गंगा और यमुना मिलती हैं तो देवप्रयाग में भागीरथी व अलकनंदा का संगम होता है और यहाँ से आगे दोनों नदियों की जो सम्मिलित धारा बहती है उसे गंगा कहते हैं। भागीरथी तो आती है गोमुख-गंगोत्री से और अलकनंदा आती है बद्रीनाथ से।
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मैं 19 सितम्बर 2009 को अचानक ही हरिद्वार गया तो रात को अपने पुराने साथी डोनू व सचिन के पास ही रुका। थोडी देर में तय हो गया कि मैं और सचिन सुबह-सुबह ही देवप्रयाग चलेंगे। सुबह हुई, चल पड़े। ब्यासी तक तो पहाडों व गहरी गंगा घाटी को देख-देखकर वाह-वाह करते रहे। फिर सीट के पीछे सिर टिकाकर ऐसे सोये, ऐसे सोये कि देवप्रयाग से 30 किलोमीटर आगे कीर्तिनगर पहुँच गए। हम देवप्रयाग से आगे आ गए हैं, इसका पता हमें चला एक बोर्ड देखकर जिस पर लिखा था- श्रीनगर 10 किलोमीटर। फटाफट उतरे, फिर देवप्रयाग की बस पकड़कर पहुंचे।
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यहाँ का मुख्य आकर्षण तो संगम ही है। जैसे जैसे शाम बढती जाती है, पीछे टिहरी बांध की वजह से भागीरथी का पानी भी बढ़ने लगता है। तब संगम का जल-स्तर एक से डेढ़ मीटर बढ़ना आम बात है। यहाँ अलकनंदा का पानी अति वेगवान है जिससे रेलिंग व जंजीर पकड़कर नहाते हुए भी डर लगता है। नहाने के बाद जब बाहर निकलने के लिए वापस पलटते हैं तभी साधू महाराज तिलक लगा देते हैं।
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हमने भी बड़ी शान से तिलक लगवाया, लेकिन उसके बार-बार मांगने पर भी पैसे नहीं दिए। यहाँ धनेश तिवारी नाम के एक महाराज हैं। हमने उनसे दोस्ती कर ली। इसका हमें ये फायदा हुआ कि किसी भरजी नामक बन्दे के घर में मात्र सौ रूपये में कमरा मिल गया। शाम का खाना व सुबह का नाश्ता भी यहीं पर किया। वैसे यहाँ पर रुकने के लिए होटल व धर्मशाला भी हैं।
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कहा जाता है कि भगवान् राम ने रावण की ब्रह्महत्या का प्रायश्चित यहीं पर किया था। यहाँ एक शिला पर राम के पदचिन्ह भी बने हैं। घोर आस्तिकों के लिए तो यह शिला मत्था टेकने की चीज है लेकिन मेरे जैसों के लिए प्रकृति की करामात से ज्यादा कुछ नहीं है। हो सकता है कि छैनी व हथौडे की करामात भी हो। पास ही में कुछ ऊपर राम को समर्पित एक मंदिर भी है।
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देवप्रयाग में बहुत ही कम पर्यटक आते हैं। इसका कारण ये है कि ज्यादातर तो हरिद्वार-ऋषिकेश से ही वापस चले जाते हैं और जो कुछ बचते हैं वे बद्रीनाथ से पहले नहीं रुकते। यहाँ जाने का बेहतरीन समय बरसात के बाद व फ़रवरी-मार्च तक है। इन दिनों यहाँ की प्राकृतिक खूबसूरती चरम पर होती है। यह पौडी से भी सीधा सड़क मार्ग से जुडा है। हां, खाने की थोडी दिक्कत पड़ सकती है। क्योंकि आपको 'घर जैसा' खाना नहीं मिलेगा। हमने तो समोसे, कोल्ड ड्रिंक, बिस्कुट व कुछ मिठाइयों से ही काम चला लिया था।
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भीडभाड ना होने की वजह से यहाँ गंदगी भी नहीं है। जब अलकनंदा चढ़ने के बाद उतरती है तो उसकी रेत या पेडों से गिरी हुई टहनियां- पत्ते ऐसे ही पड़े रहते हैं क्योंकि उन्हें हटता भी कोई नहीं है। कुल मिलाकर कुदरत के बीच में कुदरत के साथ रहने का भरपूर आनंद मिलता है देवप्रयाग में।
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और हाँ, हरिद्वार से ज्यादा दूर भी नहीं है। बस से चार घंटे लगते हैं। अपना वाहन हो तो और भी कम समय लगेगा। आजकल लक्ष्मण झूला व ब्यासी के बीच में सड़क मरम्मत का कार्य चल रहा है, इसलिए रास्ता टूटा-फूटा, मलबे युक्त व धूल भरा है। ब्यासी के बाद तो बढ़िया रास्ता है।
(कीर्तिनगर में अलकनंदा पर बना पुल)
(देवप्रयाग, सामने से आती अलकनंदा और बाएँ से भागीरथी)
(देवप्रयाग में एक झूला पुल)
(संगम में स्नान)
(इसे ध्यान से देखिये और फ़िर नीचे वाला चित्र देखिये)
(जिस जगह पर ऊपर वाले चित्र में दाहिने से दूसरे साधू बैठे हैं, वह जगह अब पानी में डूब गई है। इतना काम केवल बीस मिनट में हुआ। इसीलिए यहाँ जगह-जगह चेतावनी वाले बोर्ड लगे हैं कि किसी भी समय पानी एक से पांच मीटर तक बढ़ सकता है।)
(ध्यानमग्न होकर नहीं बैठा हूँ, केवल मस्ती सूझ रही है)
(राम पद शिला, इस पर पैरों की आकृति दिख रही है।)
(राम मन्दिर परिसर)
(राम मन्दिर परिसर)
(पुजारी धनेश तिवारी के साथ सचिन। तिवारी जी हमारे बहुत काम आए।)
(गहरी घाटी से होकर बहती अलकनंदा)

Thursday 17 September 2009

मथुरा-भरतपुर-कोटा-नागदा-रतलाम

दिल्ली से मुंबई गए हो कभी? ट्रेन से। मथुरा तक तो ठीक है। फिर दो रास्ते हो जाते हैं- एक तो जाता है झाँसी, भोपाल, भुसावल होते हुए; दूसरा जाता है कोटा, रतलाम, वडोदरा होते हुए। अच्छा, ये और बताओ कि कौन सी ट्रेन से गए थे? चलो, कोई सी भी हो, मुझे क्या, लेकिन सुपरफास्ट ही होगी। पैसेंजर तो बिलकुल भी नहीं होगी।
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आज हम इसी रूट पर मथुरा से रतलाम जायेंगे पैसेंजर ट्रेन से। सुबह साढे पांच बजे ट्रेन नंबर 256 (मथुरा-रतलाम पैसेंजर) चलती है। रानीकुण्ड रारह स्टेशन के बाद यह राजस्थान के भरतपुर जिले में प्रवेश करती है। जिले में क्या, धौरमुई जघीना के बाद भरतपुर पहुँच भी जाती है। यहाँ तक तो सभी सवारियां सोते हुए आती हैं, लेकिन भरतपुर में रुकने से पहले ही राजस्थानी सवारियां घुसती हैं -"उठो, भई, उठो। तुम्हारा रिजर्वेशन नहीं है। नवाब बनकर सो रहे हो।"
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भरतपुर से चलकर वातावरण में गर्मी भी बढ़ने लगती है और ट्रेन में भीड़ भी। कहीं-कहीं इधर-उधर अरावली के टीले भी दिख जाते हैं। रास्ते में एक स्टेशन पड़ता है- केलादेवी। किसी को मालूम हो तो इस 'देवी' के बारे में बताना। बयाना भी भरतपुर जिले में ही है। यहाँ पर आगरा से आने वाली लाइन भी मिल जाती है। फतेहसिंह पुरा के बाद करौली जिला शुरू हो जाता है। हिंडौन सिटी भी करौली में ही है। फिर एक स्टेशन पड़ता है- श्री महाबीर जी। यह शायद जैनियों का तीर्थ है।
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इसके बाद सवाई माधोपुर शुरू हो जाता है। जिले में घुसते ही दूर पहाडियों की श्रंखला दिखाई देने लगती है। गंगापुर सिटी के बाद चौथा स्टेशन है- मलारना। यहाँ से बनास नदी बहती है। नदी के किनारे ही किसी महल के खंडहर से दिखते हैं। यहाँ पर नदी पथरीली जमीन में गहराई तक कटाव कर चुकी है, इसलिए खंडहर से नदी तक उतरने के लिए सीढियां भी बनी हैं। किसी को अगर जानकारी हो तो इसके बारे में भी बताना।
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फिर आता है- रणथम्भौर। इसी नाम से राजस्थान की शान व बाघों की शरणस्थली रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क भी है। बाएँ तरफ के इलाके में दूर तक फैली पहाडियों पर राष्ट्रीय पार्क स्थित है। इसके बाद है सवाई माधोपुर जंक्शन। यहाँ से एक लाइन जयपुर चली जाती है। रवांजना डूंगर, आमली व इंद्रगढ़ सुमेरगंज मण्डी तीन लगातार स्टेशन हैं और तीनों ही अलग-अलग जिलों में हैं क्रमशः सवाई माधोपुर, टोंक व बूंदी। यहाँ तक पहाडियां बिलकुल ख़त्म हो जाती हैं और दूर दूर तक खेत ही खेत दिखते हैं। यह सिलसिला कोटा तक चलता है। कोटा चम्बल नदी के किनारे बसा है। यहाँ चम्बल बेहद गहरी घाटी बनाकर बहती है।
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कोटा से दो लाइनें और निकलती हैं- एक तो जाती है गुना होते हुए बीना और दूसरी जाती है चित्तौड़गढ़ होते हुए उदयपुर। कोटा से निकलकर फिर पहाड़ शुरू हो जाते हैं। इन्ही पहाडों में जगह-जगह पिकनिक स्पॉट हैं जैसे अलनियां। और दरा में तो अभ्यारण्य भी है। रामगंज मण्डी से आगे झालावाड रोड है जहाँ से झालावाड शहर जाने का रास्ता है।
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फिर आता है भवानी मण्डी जो कि एक अलग तरह का स्टेशन है। आधा प्लेटफार्म तो राजस्थान में है और आधा प्लेटफार्म है मध्य प्रदेश में। है कोई ऐसा स्टेशन जहाँ पर ट्रेन रुके तो कुछ डिब्बे एक राज्य में हों और बाकी दूसरे राज्य में? यह इलाका संतरे के बागों के लिए भी प्रसिद्द है।
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शाम होते-होते शामगढ़ पहुँच जाते हैं। यह मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में है। आगे तो मध्य प्रदेश ही है लेकिन नाथूखेडी, चौमहला व तलावली के बहाने फिर राजस्थान आ जाता है। दो घंटे बाद पहुँचते हैं नागदा। यहाँ से उज्जैन- इंदौर के लिए लाइन जाती है। नागदा से रतलाम है ही कितना दूर? रतलाम से सीधे जाएँ तो वडोदरा जा पहुंचेंगे। एक लाइन मंदसौर, नीमच होते हुए चित्तौड़गढ़ तथा और भी आगे अजमेर पहुँच जाती है। पहले यह मीटर गेज थी जो अब बदलकर ब्रॉड गेज हो चुकी है। इसी तरह एक लाइन इंदौर होते हुए खंडवा व आगे अकोला, पूर्णा चली जाती है। यह अभी भी मीटर गेज है। पातालपानी व कालाकुण्ड और ओमकारेश्वर रोड भी इसी लाइन पर ही हैं।
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अच्छा जी, रतलाम तक आते-आते रात हो गयी है, नौ बज गए हैं। नींद आ रही है। सोता हूँ। किसी दिन किसी और लाइन के बारे में बताऊंगा। मन ना भरा हो तो ये लो एलबम लाया हूँ, फोटो देख लो।
(भरतपुर रेलवे स्टेशन)
(इस जगह के बारे में बताना)
(एक सूखी नदी)
(ये ट्रेन की प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि ट्रेन से उतरे हैं)
(रणथम्भौर रेलवे स्टेशन और पीछे राष्ट्रीय पार्क)
(रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क की पहाडियां)
(कोटा में चम्बल नदी)
(कोटा के बाद का भू-दृश्य। एकदम बंजर और पथरीला)
(नमक-मिर्च लगाकर खीरे बेचता एक 'ताऊ')
(दरा अभ्यारण्य से गुजरते हुए, जिला कोटा)
(यह है भवानी मण्डी। आधा प्लेटफार्म तो मध्य प्रदेश में है...)
(...और आधा राजस्थान में)
(नागदा रेलवे स्टेशन। यहाँ से उज्जैन और इंदौर के लिए ट्रेनें जाती हैं। कुछ ट्रेनें भोपाल भी जाती हैं।)

Monday 14 September 2009

कालाकुण्ड - पातालपानी

14 अगस्त 2009 को मैं इंदौर में ताऊ के यहाँ था। अगले दिन ओमकारेश्वर जाना था। तो रास्ते में स्टेशन तक छोड़ते समय ताऊपुत्र भरत ने बताया कि महू से आगे एक जगह पड़ती है- पातालपानी। पातालपानी से निकलकर बीच जंगल में ट्रेन रुकती है। ड्राईवर नीचे उतरकर एक स्थान पर पूजा करते हैं, फिर ट्रेन को आगे बढाते हैं। आते-जाते दोनों टाइम हरेक ट्रेन के ड्राईवर ऐसा ही करते हैं।
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आधी रात से ज्यादा हो चुकी थी। इसलिए इस दृश्य को देखने का मतलब ही नहीं था। सोचा कि उधर से वापसी में देख लूँगा। लेकिन 16 अगस्त को जब घूम-घामकर ओमकारेश्वर रोड स्टेशन पर आया तो शाम हो चुकी थी। अब पौने दस बजे एक ट्रेन थी जो बारह बजे पातालपानी पहुंचती थी। अँधेरा होने की वजह से ना तो कुछ देख ही सकता था ना ही फोटो खींच सकता था। इसलिए सुबह चार वाली ट्रेन से जाना तय हुआ जो साढे छः बजे पातालपानी पहुँचती है। वैसे तो स्टेशन के सामने ही एक धर्मशाला थी, जिसमे मेरे सोने का मतलब था गधे-घोडे बेचकर सोना। फिर चार बजे किसकी मजाल थी कि उठता। अलार्म व तीन-चार 'रिमाइंडर' भरकर स्टेशन पर ही सो गया।
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सुबह जब यहाँ से चला तो बारिश हो रही थी। नर्मदा नदी पार करके बड़वाह, मुख्तारा बलवाडा, चोरल से निकलकर ट्रेन पहुंची कालाकुण्ड। यहाँ तक आते-आते छः बज गए थे। बारिश हो ही रही थी। एक बुड्ढा बाल्टी में रखकर कलाकंद बेच रहा था- कालाकुण्ड के कलाकंद। मैं बाहर निकला और बारिश में भीगने लगा। लेकिन मेरे साथ कैमरा भी भीग रहा था इसलिए फिर अन्दर चला गया।
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कालाकुण्ड समुद्र तल से 210 मीटर की ऊंचाई पर है। इससे आगे पहाड़ दिख रहे थे- बिलकुल हिमालय के निचले इलाकों जैसे पहाड़। बारिश होने से और भी ज्यादा बहार आ गयी थी। यहाँ से दस किलोमीटर आगे अगला स्टेशन पातालपानी है जो समुद्र तल से 572 मीटर की ऊंचाई पर है। इतनी ऊंचाई तक चढाने के लिए ट्रेन में पीछे की तरफ दूसरा इंजन भी लगाया गया। कालाकुण्ड व पातालपानी के पहाड़ इस कदर घने हैं कि रास्ते में कम से कम आधे-आधे किलोमीटर की चार सुरंगें भी हैं। पहाडों के नीचे बहती नदी भी पूरे जोर पर थी। रास्ते में एक जगह तो बड़ा ही शानदार झरना भी दिखा। रतलाम से मुझे दोपहर एक बजे दिल्ली जाने वाली ट्रेन पकड़नी थी नहीं तो मैं यहाँ पर भी उतर जाता।
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यहाँ से आगे महू है। एक बात और, यहाँ तक स्टेशन के अलावा ट्रेन जंगल में कहीं नहीं रुकी। पता नहीं कौन सी ट्रेन के ड्राईवर पूजा करते हैं। पातालपानी पहुंचकर तो मालवा का पठार मिश्रित मैदान शुरू हो जाता है। इसलिए दूसरा इंजन यहीं पर छोड़ दिया।
और आखिर में, कभी इंदौर जाओ तो पातालपानी भी चले जाना।


(कोई शक? पता चल ही गया होगा की यह चित्र कहाँ का है)

















(इंदौर वाले चित्र को छोड़कर सभी चित्र पातालपानी और कालाकुण्ड के बीच के हैं)

कैसे लगे?????