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Wednesday, September 21, 2016

मणिमहेश ट्रैक पर क्या हुआ था?

यह एक दुखांत यात्रा रही और इसने मुझे इतना विचलित किया है कि मैं अपना सामाजिक दायरा समेटने के बारे में विचार करने लगा हूँ। कई बार मन में आता कि इस यात्रा के बारे में बिलकुल भी नहीं लिखूँगा, लेकिन फिर मन बदल जाता - अपने शुभचिंतकों और भावी यात्रियों के लिये अपने इस अनुभव को लिखना चाहिये।

यात्रा का आरंभ
हमेशा की तरह इस यात्रा का आरंभ भी फेसबुक से हुआ। मैं अपनी प्रत्येक यात्रा-योजना को फेसबुक पर अपडेट कर दिया करता था। इस यात्रा को भी फेसबुक इवेंट बनाकर 24 जुलाई को अपडेट कर दिया। इसमें हमें 4800 मीटर ऊँचा जोतनू दर्रा पार करना था। हिमालय में इतनी ऊँचाई के सभी दर्रे खतरनाक होते हैं, इसलिये इस दर्रे का अनुभव न होने के बावज़ूद भी मुझे अंदाज़ा था कि इसे पार करना आसान नहीं होगा। लेकिन चूँकि यह मणिमहेश परिक्रमा मार्ग पर स्थित था और आजकल मणिमहेश की सालाना यात्रा आरंभ हो चुकी थी, तो उम्मीद थी कि आते-जाते यात्री भी मिलेंगे और रास्ते में खाने-रुकने के लिये दुकानें भी। दुकान मिलने का पक्का भरोसा नहीं था, इसलिये अपने साथ टैंट और स्लीपिंग बैग भी ले जाने का निश्चय कर लिया। यही सब फेसबुक पर भी अपडेट कर दिया। साथ ही यह भी लिख दिया कि जिसने पहले कभी ट्रैकिंग नहीं की है, वह इस यात्रा पर न चले।
दो व्यक्तियों ने साथ चलने के लिये संपर्क किया - दिल्ली में बी-टेक कर रहे 19 वर्षीय मनीष पाल और पटना के रहने वाले 31 वर्षीय राहुल कुमार। मनीष ने बताया कि वह पहले खीरगंगा और त्रिउंड जा चुका है और राहुल ने बताया कि वह यमुनोत्री और गंगोत्री-गौमुख जा चुका है। त्रिउंड 3000 मीटर पर है और गौमुख 3900 मीटर पर। दोनों के पास इनके अलावा कुछ भी ट्रैकिंग अनुभव नहीं था, तो मैंने उनसे इस ट्रैक पर चलने के लिये पुनर्विचार करने को कहा। दोनों ने उत्तर दिया कि वे इसे कर लेंगे। फिर मैं कौन होता हूँ किसी को कहीं जाने से रोकने के लिये? दोनों अपने-अपने समयानुसार हमारे यहाँ आये और टैंट, स्लीपिंग बैग, मैट्रेस और ट्रैकिंग पोल ले गये।
16 अगस्त 2016 की शाम सात बजे मैंने निशा और छोटे भाई धीरज के साथ हिमाचल परिवहन की चंबा जाने वाली टाटा एसी बस पकड़ ली, जबकि राहुल व मनीष ने उत्तर संपर्क क्रांति। वे दोनों पठानकोट उतरे और फिर बस से चंबा गये। चलने से पहले मैंने फेसबुक पर लिख दिया - “धीरज का यह पहला ट्रैक है, लेकिन चूँकि वह एक एथलीट है तो मुझे लगता है कि वह इस यात्रा को सफलतापूर्वक पूरा कर लेगा। मनीष के बारे में पता नहीं क्यों मुझे लग रहा है कि वह इस यात्रा को पूरा नहीं कर सकेगा। और राहुल का तो पक्का विश्वास है कि उसे बीच से लौटना पड़ सकता है।” यह चलने से पहले का एक पूर्वाग्रह था। आप भी अगर नियमित ट्रैकिंग करते हैं, तो इस तरह किसी नये साथी को देखने मात्र से काफी अंदाज़ा लगा लेते होंगे। यह अंदाज़ा अक्सर गलत होता है, लेकिन कभी-कभी ठीक भी निकल जाता है। लेकिन सामने वाला अगर आत्मविश्वास से कह रहा है, तो आप उसे जाने से कैसे मना कर सकते हैं?
17 अगस्त की दोपहर 11 बजे हम सभी चंबा बस अड्डे पर मिले। तुरंत भरमौर जाने वाली एक बस पकड़ी और दो बजे तक भरमौर पहुँच गये। हड़सर जाने वाली एक शेयर्ड़ जीप से हड़सर पहुँच गये और इसी जीप को आगे कुगती तक के लिये बुक कर लिया। कुगती से तकरीबन एक किलोमीटर पहले तक गाड़ियाँ जा सकती हैं। जीप ने हमें वहाँ उतार दिया। यहीं एक दुकान भी थी। अंड़े देखकर मेरा जी ललचा गया। मैंने मनीष से पूछा तो उसने बताया कि वह अंड़े खा लेता है। राहुल ने बताया कि वह अंड़े नहीं खाता है, लेकिन अगर हम उसके सामने बैठकर खायेंगे, तो उसे कोई ऐतराज नहीं होगा।
कुगती में प्रवेश करते ही एक सरकारी रेस्ट हाउस है। हमारी यहाँ अग्रिम बुकिंग नहीं थी, तो केयर-टेकर हिचक रहा था। उसने सलाह दी कि आप एक बार गाँव में जाकर कोशिश कर लो; अगर कोई इंतज़ाम नहीं हुआ, तो यहाँ आ जाना। कुगती में कोई होटल नहीं है। एक दुकान वाले से ठहरने के बारे में पूछा तो उसने हमें अपने ही घर में ठहरा दिया। छोटे-छोटे दो कमरे दे दिये, जो उनकी रोजमर्रा की चीजों से भरे पड़े थे।
मैंने राहुल और मनीष दोनों से पूछा कि उन्हें खाने में क्या चीज नापसंद है। इस बारे में पहले ही पता होगा तो हम आगे उस चीज का ऑर्डर नहीं देंगे। मनीष तुरंत बोला - ‘मैं रोटी-पोटी सब खा लेता हूँ। मुझे कुछ भी नापसंद नहीं है।’ मैंने आश्चर्य से पूछा - “रोटी भी और पोटी भी!’ सब खूब हँसे। लेकिन उसकी यह पोल थोड़ी ही देर में खुल गई, जब राजमा सामने देखकर उसने कहा - ‘मुझे राजमा पसंद नहीं है।’ उस रात वह भूखा ही रहा। घरवालों ने पहले ही बता दिया था कि वे राजमा बनायेंगे। अगर मनीष समय रहते बता देता, तो हम आलू बनवा लेते और उसे भूखा न रहना पड़ता। तब मैंने जोर देकर कहा कि हमें न भूखा रहना है और न ही खाने के बारे में किसी तरह का संकोच करना है।

कुगती गाँव के रास्ते में - बायें राहुल, दाहिने मनीष

कुगती गाँव

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नक्शे पर क्लिक कीजिये। यह अलग ‘टैब’ में खुलेगा और काफी बड़ा भी होगा। इसके बाद आगे की घटना पढ़ेंगे, तो ज्यादा अच्छी तरह समझ में आयेगी।

18 अगस्त 2016
घरवालों ने स्पष्ट कर दिया कि आज हम हनुमान शिला पहुँच जायेंगे, जहाँ एक दुकान है और हमें रात का खाना आसानी से मिल जायेगा। कुगती और हनुमान शिला के बीच में कोई दुकान नहीं है, इसलिये लंच के लिये हमने यहीं से आलू के पराँठे पैक करवा लिये। आठ बजे के आसपास यहाँ से चल दिये। कुगती लगभग 2600 मीटर की ऊँचाई पर है।
शुरू में जंगल है। चढ़ाई भी अच्छी-खासी है। राहुल और मनीष चढ़ाई पर संघर्ष करते दिखे तो उन्हें कुछ तकनीक बतायी - बहुत धीरे-धीरे चलो, साँस चढ़ जाये तो बैठो मत, ट्रैकिंग स्टिक के सहारे खड़े होकर अपनी साँस सामान्य करो, अपने कदमों के साथ साँसों का तालमेल बनाओ, केवल नाक से साँस लो। इन बातों का दोनों ने पालन किया और स्पष्ट असर भी दिखायी दिया।
3000 मीटर के बाद जंगल खत्म हो गया। लंबी-लंबी घास आने लगी और चढ़ाई भी खत्म हो गयी। कुछ दूर तक समतल रास्ता रहा, फिर थोड़ा-सा ढलान आ गया। ढलान खत्म होते ही लोहे का एक छोटा-सा पुल आया। अब तक हमें भूख लगने लगी थी। यहीं पुल के पास बैठकर एक-एक पराँठे खाये। कुछ पराँठे बचाकर रख लिये। गाँव वालों ने कहा ज़रूर है कि आगे एक दुकान मिलेगी। लेकिन अगर दुकान न मिली तो? एक संभावना यह भी हो सकती है। तब हम बाकी पराँठे खा लेंगे।
आगे चले तो एक गद्दी मिला। उससे हनुमान शिला के बारे में पूछा तो बताया कि दो-तीन घंटे और लगेंगे। वहाँ दुकान होने की पुष्टि इस गद्दी ने भी की।
शाम चार बजे तक 3400 मीटर की ऊँचाई तक आ चुके थे। कुगती से हम 800 मीटर ऊपर आ गये थे। इस बात का असर हम सभी पर पड़ रहा था। चलने का बिलकुल भी मन नहीं था, लेकिन हनुमान शिला की दुकान के लालच में चलते रहे। हर मोड़ पर लगता कि अब दुकान दिखेगी, अब दिखेगी। लेकिन हर बार निराशा हाथ लगती। सामने बादल उठते दिखते, तो लगता कि दुकान के चूल्हे का धुआँ है। आख़िरकार छह बजे जब हम 3600 मीटर तक पहुँच चुके, तो मैंने घुटने टेक दिये। हम 1000 मीटर ऊपर आ चुके थे और मेरी एक दिन की सीमा 1000 मीटर चढ़ने की ही है। हालाँकि अगर सामने दूर भी कहीं दुकान दिख जाती तो मैं और ज्यादा चढ़ सकता था। इस समय मुझसे भी ख़राब हालत मनीष और राहुल की थी। दोनों खुद को किसी तरह बस धकेल रहे थे। जैसे ही उन्हें पता चला कि हम यहाँ रुक रहे हैं, तो वे बड़े खुश हुए। यहीं घास में समतल जगह देखकर तीन टैंट लगा लिये। मनीष और राहुल को टैंट लगाना नहीं आता था, आज उन्होंने भी टैंट लगाना सीख लिया।






19 अगस्त 2016
सुबह सात बजकर बीस मिनट पर सबकुछ समेटकर हम आगे चल दिये। रात 3600 मीटर की ऊँचाई पर रुकने के कारण सभी के शरीर इसी ऊँचाई के अनुकूल हो गये। कल जब हम यहाँ आये थे, तो सभी पूरी तरह ‘खत्म’ थे। जबकि अब सब के सब तरोताजा। जब सभी थोड़ा आगे निकल चुके, तब मैंने यहाँ से बैग उठाया। देखा कि पानी की एक बोतल पड़ी हुई है। शायद किसी की छूट गई हो, मैंने इसे उठा लिया। आगे जब सब मिले, तो मैंने इस बोतल के बारे में पूछा। राहुल की बोतल थी और वह इसमें पानी लेकर टट्टी करने गया था। इसलिये उसने बोतल छोड़ दी। मैंने समझाया - कल सभी को टॉफी के रैपर फेंकने के बारे में सख्त मना किया था। यह इतनी बड़ी बोतल भी नहीं फेंकनी चाहिये थी। इसे अपने पास रखिये। आगे कहीं कूड़ेदार मिलेगा, उसमें डाल देना। राहुल ने कुछ दूर तक तो वह बोतल अपने हाथ में लिये रखी, फिर बैग में रख ली।
डेढ़ घंटे चलने के बाद हमें हनुमान शिला की दुकानें दिखीं। हम बिना कुछ खाये चले थे और इतने तरोताजा थे कि इन डेढ़ घंटों में ही 300 मीटर से ज्यादा ऊपर आ गये। निशा ने कहा कि अगर हम कल ही मेहनत कर लेते तो डेढ़ घंटे चलने के बाद यहाँ आ जाते। मैंने कहा - कल हम यहाँ डेढ़ घंटे में नहीं आ सकते थे। जिस समय कल हम रुके थे, उस समय हम सभी ‘एग्जहोस्टेड़’ हो चुके थे। एक कदम भी चलने की ताकत नहीं बची थी। कम से कम तीन घंटे लगते। जबकि आज तो सभी तरोताजा हैं।

हनुमान शिला की दुकानें

यहाँ कांगड़ा के चार लोग और थे, जो परिक्रमा पर जा रहे थे। इन्होंने बताया कि इनके कुछ मित्र आज सुबह निकले हैं और ये लोग कल निकलेंगे। अक्सर हनुमान शिला पर सभी लोग रात रुकते हैं और सुबह सवेरे आगे के लिये चलते हैं, ताकि शाम तक मणिमहेश - कैलाश कुंड - पहुँच जाएँ। लेकिन हमारे पास टैंट और स्लीपिंग बैग थे, इसलिये हमारे सामने अंधेरा होने से पहले तक मणिमहेश पहुँचने की बाध्यता नहीं थी। दुकान वाले ने भी हमारा उत्साहवर्धन किया कि आपके पास तो टैंट है, पाँच-छह घंटे में जोत पर पहुँच जाओगे और फिर तो नीचे ही उतरना है।
यहाँ पहले चाय पी, फिर आलू के ताज़े पराँठे खाये और फिर चाय पी। रास्ते के लिये सभी ने कोल्ड़ ड्रिंक की दो-दो बोतलें और बिस्कुट के पैकेट रख लिये। मनीष बिस्कुट नहीं खाता, उसने नमकीन के पैकेट रखे। सभी के पास थोड़े-थोड़े ड्राई-फ्रूट तो थे ही। साढ़े दस बजे यहाँ से चल दिये।
जोतनू और चौबू को अक्सर एक ही दर्रा माना जाता है। बहुत सारे यात्रा-वृत्तांतों में और किताबों में जोतनू को चौबू लिखा हुआ है। इस बारे में तरुण गोयल ने बताया था कि दोनों अलग-अलग दर्रे हैं। मैंने यहाँ दुकान वाले से इस बारे में बात की तो उसने दुकान से बाहर आकर बताया - ‘वो उधर जोतनू है। थोड़ा बायें उधर चौबू है, जहाँ से होली जा सकते हैं। और उधर पीछे मकोड़ा जोत है, जहाँ से बड़ा भंगाल जाया जाता है।’ इसे यूँ समझिये कि हनुमान शिला, मणिमहेश और होली एक त्रिभुज के तीन कोने हैं। हनुमान शिला और मणिमहेश के बीच में जोतनू जोत है। हनुमान शिला और होली के बीच में चौबू जोत है। और मणिमहेश व होली के बीच में सुखडली जोत है। हमारी आरंभिक योजना हनुमान शिला - जोतनू - मणिमहेश - सुखडली - होली ट्रैक पर चलने की थी। होली के बाद फिर हमें जालसू जोत पार करके सीधे बैजनाथ जाना था। अर्थात इस यात्रा में हमें तीन दर्रों को पार करना था।
तो साढ़े दस बजे यहाँ से चल दिये। खड़ी चढ़ाई है, लेकिन पगडंडी बनी है। यह पगडंडी ‘ज़िग-ज़ैग’ तरीके से ऊपर जाती हुई हनुमान शिला से भी दिखाई देती है। तीन घंटे में अर्थात डेढ़ बजे तक हम 4400 मीटर की ऊँचाई तक पहुँच गये। अब मुझे भूख लगने लगी। बाकियों को भूख नहीं लग रही थी, लेकिन मुझे बिस्कुट खाते व कोल्ड़ ड्रिंक पीते देख बाकियों का भी मन डोल गया। जैसे ही यहाँ से चलने को हुए, बारिश पड़ने लगी। हम तीनों ने रेनकोट पहन लिये और मनीष व राहुल ने छतरियाँ तान लीं। आधे घंटे तक अच्छी-खासी बारिश हुई, सभी यहीं बैठे रहे। बारिश रुकने पर फिर चल दिये।
अब भूदृश्य में एक और परिवर्तन हो गया। घास खत्म हो गयी और पत्थर शुरू हो गये। जब हम हनुमान शिला पर होते हैं, तो नीचे से देखने पर 4400 मीटर का यह स्थान एक दर्रे जैसा ही दिखता है। जोतनू भले ही 4800 मीटर की ऊँचाई पर हो, लेकिन हनुमान शिला से नहीं दिखायी देता। तो जब नये ट्रैकर इस 4400 मीटर को जोतनू समझकर यहाँ तक आ जाते हैं, तो यही सोचते हैं कि जोतनू पार हो गया, अब उतराई मिलेगी। लेकिन उतराई तो मिलती नहीं, बल्कि विशालकाय और डरावना जोतनू सामने आ जाता है। अब पगडंडी भी नहीं है और आपको केवल अंदाज़े से आगे बढ़ना होता है। जगह-जगह एक के ऊपर एक रखे पत्थर रास्ता ढूंढने में सहायता करते हैं, लेकिन एक सीमा के बाद ये भी नहीं मिलते।
हमें हनुमान मंदिर पर ही बता दिया गया था कि जोतनू पर ही एक बहुत बड़ा गोल पत्थर इस तरह रखा हुआ है कि लगता है कि लुढ़कने ही वाला है। उस पत्थर को धाम-घोड़ी भी कहते हैं। और इसी वजह से जोतनू जोत को धाम-घोड़ी जोत भी कह दिया जाता है। जब आप जोतनू के नीचे होते हैं, तो यह बड़ा पत्थर ही इस जोत की पहचान करने में सहायक होता है। वैसे जोत पर झंड़ियाँ भी लगीं हैं, धाम-घोड़ी के नज़दीक भी झंड़ियाँ हैं, लेकिन धाम-घोड़ी से बायें करीब 200 मीटर के दायरे में दो स्थानों पर भी झंड़ियाँ हैं। लेकिन हमें सबसे बायीं वाली या मध्य वाली झंड़ियों की तरफ नहीं चढ़ना होता, बल्कि सबसे दाहिनी यानी बड़े पत्थर के नज़दीक वाली झंड़ी तक चढ़ना होता है।
तो 4400 मीटर के बाद पगडंडी भी खत्म हो जाती है और हमें पत्थरों पर चलना होता है। हमारे दाहिनी तरफ कैलाश चोटी है तो बायीं तरफ एक ‘रिज’ है। सामने जोतनू तो है ही। यानी हमारे आसपास कहीं भी खाई नहीं है। गिरने का कोई डर नहीं होता। अगर आप लापरवाही-वश चलते-चलते गिर भी पड़ें, तो उठकर फिर से चल देना होता है।
रात हम 3600 मीटर पर रुके थे। यानी अब तक करीब 800 मीटर ऊपर आ चुके थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि फिर से हम सभी ‘एग्जहोस्टेड़’ होने लगे थे। लेकिन सामने जोतनू दिख रहा था। उसके बाद ढलान ही ढलान है, इसलिये यही बात हमें आगे बढ़ने की हिम्मत दे रही थी। 4400 मीटर से 4550 मीटर तक की दूरी करीब 2 किलोमीटर है। यानी लगभग समतल-सा ही रास्ता है। इसलिये इसे पार करने में उतनी परेशानी नहीं हुई। लेकिन जब बरफ़ का एक छोटा-सा टुकड़ा पार करके जोतनू की ‘फाइनल’ चढ़ाई शुरू हुई, तो यह किसी दीवार पर सीधा चढ़ने जैसा था। स्लेटी पत्थरों की भरमार है। इनके छोटे-छोटे टुकड़े ही थे। इन पर पैर रखते और ये नीचे खिसक जाते। इस पर हम थोड़ा ही चले थे कि राहुल ने कहा कि वह और आगे नहीं बढ़ सकता। मैंने वजह पूछी तो बताया - ‘मुझसे नहीं हो सकेगा। यह बहुत खतरनाक है और मैं चढ़ भी नहीं पा रहा हूँ।’
मैं - ‘देख लो। चढ़ना तो पड़ेगा ही।’
राहुल - ‘नहीं, मैं वापस कुगती चला जाऊँगा।’
मैं - ‘इतना आ गये। अब केवल 250-300 मीटर की ही चढ़ाई और बची है। कर लो हिम्मत। बहुत धीरे-धीरे चलना। इसके बाद तो ढलान ही है। ऊपर जोत पर चढ़कर मणिमहेश भी दिख जायेगा। यहाँ से वापस नीचे जाओगे, तो क्यों न 300 मीटर चढ़कर तब नीचे जाना?’
राहुल - ‘नहीं होगा मुझसे। यह बहुत कठिन है। आप लोग जाओ। मैं कुगती जा रहा हूँ।’
मुझे एवरेस्ट बेस कैंप ट्रैक की ऐसी ही घटना याद आ गयी, जब कोठारी जी भी यही सब कहते हुए वापस मुड़े थे। मैंने कोठारी जी को रोकने की खूब कोशिश की थी - ‘आप थके हुए हो। हम जो भी पहला होटल मिलेगा, उसी में रुकेंगे। एक दिन, दो दिन। आराम मिलेगा, तो आगे चल पड़ेंगे। आप बहुत धीरे-धीरे चलना। हम गोक्यो नहीं जायेंगे। आप एक बार हिम्मत तो करो।’ लेकिन कोठारी जी आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर सके। उन्हें अकेले वापस लौटना पड़ा। मैं नहीं चाहता था कि कोठारी जी इस तरह वापस लौटें।
यही आज हो रहा था। केवल 300 मीटर ही बाकी था। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि हम 4500 मीटर की ऊँचाई पर थे। आप में से ज्यादातर लोग इतनी ऊँचाई तक कभी नहीं गये होंगे। वैष्णों देवी, अमरनाथ, उत्तराखंड़ के चारों धाम, रोहतांग भी इतनी ऊँचाई पर नहीं हैं। 4500 मीटर बहुत होती है - बहुत ज्यादा। ऐसे में राहुल पर ज़बरदस्ती आगे बढ़ने का दबाव डालना बहुत गलत होता। अगर वह कल यहाँ आने के बारे में कहता तो हम सब उसके साथ होते। नीचे जहाँ बरफ थी, वहाँ टैंट लगा लेते। लेकिन जब उसने पूरे विश्वास से कहा कि वह कुगती लौट जायेगा, तो मैं क्यों मना करता? कुगती से यहाँ तक का रास्ता कठिन नहीं था। पगडंडी बनी थी। इस बात को मैं भी जानता था और राहुल भी। तय हुआ कि आज वह हनुमान शिला पर उसी दुकान में रुकेगा और कल कुगती चला जायेगा। इसके अलावा अगर उसका मन टैंट लगाने का करेगा; तो उसके पास टैंट, स्लीपिंग बैग और मैट्रेस थे ही। साथ ही कोल्ड ड्रिंक की एक बोतल, बिस्कुट के पैकेट और ड्राई-फ्रूट भी। वह ज्यादातर अकेला ही यात्रा किया करता था, इसलिये उसने बताया कि अकेला होने के बावज़ूद भी उसे कोई दिक्कत नहीं होगी।
सब तरह से संतुष्ट होने के बाद हमने उसे अलविदा कह दिया। अगर आज वह जीवित होता, तो हमारा और उसका यही निर्णय इस ट्रैक का सर्वोत्तम निर्णय होता।
उसकी जानकारी में हम मणिमहेश जायेंगे, फिर होली जायेंगे और फिर बैजनाथ। यानी उसे हम हड़सर या भरमौर या चंबा में कहीं नहीं मिलने वाले थे। 25 को हमें दिल्ली पहुँचना था और 26 को उसका दिल्ली से पटना की ट्रेन में आरक्षण था। तो वह हमें 25 या 26 तारीख़ को दिल्ली में मिलेगा।
कुछ दूर तक मैंने उसे जाते देखा। बरफ़ का वो टुकड़ा भी उसने पार कर लिया था। फिर हम जोतनू की इस खतरनाक चढ़ाई को पार करने में लग गये। हमने सोचा था कि दो घंटे में यानी छह बजे तक ऊपर चढ़ जायेंगे। फिर उस तरफ उतराई में हमें सात बजे तक ही उजाला मिलेगा। या तो टैंट लगा लेंगे या फिर अंधेरे में टॉर्च की रोशनी में चलते जायेंगे। रात नौ बजे तक या दस बजे तक भी अगर गौरीकुंड़ पहुँचेंगे, तब भी दिक्कत की कोई बात नहीं। वहाँ लोगों का खूब आना-जाना लगा मिलेगा और दुकानें भी।
लेकिन जोतनू की यह आख़िरी चढ़ाई बहुत मुश्किल थी। हमें तीन घंटे लग गये। सात बजे जब हम जोतनू पहुँचे और दूसरी तरफ देखा तो होश उड़ गये। जितनी खतरनाक और खड़ी चढ़ाई अभी हमने चढ़ी, उससे भी ज्यादा खतरनाक ढलान अब सामने था। दूसरी बात कि इस ढलान के बाद बहुत बड़ा ग्लेशियर था। इसका नाम कुज़ा ग्लेशियर है। अगर हम अभी नीचे उतरने की कोशिश करते हैं तो ग्लेशियर तक पहुँचने में कम से कम एक घंटा लगना ही है, यानी अंधेरा हो जाना है। अंधेरे में न हम ग्लेशियर पर चल सकते थे और न टैंट लगा सकते थे। आज ही नीचे उतरने का इरादा त्याग दिया। इधर जोतनू पर समतल स्थान बिल्कुल नहीं है। आख़िरकार बीस मीटर बायें जाकर एक ऐसा स्थान मिला, जहाँ पत्थर आदि एडजस्ट करके टैंट लगाया जा सकता था। एक बार तो मन में आया कि एक ही टैंट लगाते हैं और चारों उसमें बैठ जायेंगे। लेकिन पूरी रात हमारे सामने थी। बैठे-बैठे नहीं कट सकती। किसी तरह दूसरे टैंट की भी जगह बनायी।
उधर राहुल हनुमान शिला पर कंबलों में सो रहा होगा।


जिस स्थान पर खड़े होकर मैंने यह फोटो लिया है, उसकी ऊँचाई लगभग 4550 मीटर है। मेरे पीछे जोतनू जोत है और सामने से मनीष और राहुल धीरे-धीरे मेरी तरफ यानी ऊपर की तरफ आ रहे हैं। उनके आने तक मैं यहीं खड़ा रहा। मनीष आगे निकल गया और राहुल मेरे पास खड़ा हो गया। थोड़ी देर चुप खड़े रहकर साँस सामान्य की और तब उसने अपने वापस कुगती जाने का निर्णय सुनाया।


20 अगस्त 2016
कल बहुत थक गये थे, इसलिये देर से आँख खुली। मौसम साफ था और हमारे बगल में कैलाश पर्वत बहुत शानदार लग रहा था। दस बजे सबकुछ समेटकर यहाँ से चल दिये। लेकिन नीचे उतरने का रास्ता बहुत खतरनाक था। सबसे आगे धीरज था और फिर निशा, फिर मैं और सबसे पीछे मनीष। लेकिन यहाँ मैंने मनीष को आगे कर दिया, ताकि वह हमें तेज उतरते देख किसी तरह की जल्दबाजी न करे। लेकिन जब देखा कि नीचे उतरते समय उसके पैर बुरी तरह काँप रहे हैं, तो उसे आदेश दिया - ‘अपना बैग उतारकर यहीं रख दे और खाली हाथ बहुत धीरे-धीरे उतर।’ उसने ऐसा ही किया। इसके बावज़ूद भी वह गिरने से कई बार बाल-बाल बचा। पीछे-पीछे मैं एक हाथ में उसका बैग उठाकर लाया। जब रास्ता ठीक हुआ, तब उसे बैग वापस किया।
नीचे उतरने के बाद कुज़ा ग्लेशियर आरंभ हो जाता है। यह काफी बड़ा ग्लेशियर है और इसका काफी हिस्सा पत्थरों से ढका हुआ है। ऐसे ही एक पत्थर पर जब मैंने पैर रखा, तो वह ठोस बर्फ पर फिसल गया और मैं धड़ाम से गिर पड़ा। ऐसा दो बार हुआ। नतीज़ा मेरे दाहिने पैर में ऐड़ी के पास दर्द होने लगा और गौरीकुंड़ पहुँचने तक तो यह सूज भी गया था। कुज़ा ग्लेशियर के बाद घास के मैदान हैं, जहाँ गद्दियों की भेड़ें चलती दिखती हैं। यहीं थोड़ा हटकर कमल कुंड़ भी है।
जब सवा तीन बजे हम गौरीकुंड़ पहुँचे तो चोटिल पैर की वजह से मेरी आज ही कैलाश कुंड़ जाने की हिम्मत नहीं हो सकी। उधर मनीष भी बेहद थका हुआ था और जोतनू की खतरनाक उतराई ने उसे डरा भी दिया था। सबने एक सुर में कहा - हम होली और बैजनाथ नहीं जायेंगे।
उधर राहुल आज कुगती पहुँच चुका होगा। कल वह कोई गाड़ी पकड़ लेगा और जहाँ उसका मन करेगा, चला जायेगा। खतरा जोतनू पर था। हम अब खतरे से बाहर निकल चुके थे और राहुल तो कल ही खतरा आरंभ होने से पहले वापस चला गया था।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाद में जब खोजबीन की गयी तो पता चला कि राहुल हनुमान शिला तक नहीं पहुँचा था। ज़ाहिर है कि उसने टैंट लगाया होगा। हनुमान शिला लगभग 3900 मीटर पर है और वह लगभग 4550 मीटर से वापस मुड़ा था। तो मान लेते हैं कि उसने दोनों के बीच में यानी 4200 मीटर की ऊँचाई पर टैंट लगाया होगा। अगले दिन जब वह सोकर उठा होगा, तो एकदम तरोताज़ा होगा। कल वह 4500 मीटर से ऊपर नहीं चढ़ पाया, लेकिन अब उसका शरीर 4200 मीटर के अनुकूल हो चुका होगा और वह 5000 मीटर तक भी चढ़ जाने के लिये तैयार हो गया होगा। यही सोचकर उसने फिर से जोतनू चढ़ने का निर्णय लिया होगा - अकेले। और उसका यही निर्णय प्राणघातक सिद्ध हुआ।
उसका शव कुज़ा ग्लेशियर पर धाम-घोड़ी से काफी हटकर मिला। यानी वह जोतनू पर चढ़ चुका था। मैंने अभी बताया था कि कल जब हम 4500 मीटर पर थे और हमारे सामने जोतनू था, तो वहाँ लगभग 200 मीटर के दायरे में तीन स्थानों पर झंड़ियाँ लगी थीं। नीचे उतरने का सुविधाजनक रास्ता सबसे दाहिनी झंड़ी के पास से था। लेकिन राहुल का शव सबसे बायीं झंड़ी के नीचे ग्लेशियर पर मिला। ज़ाहिर है कि वह सबसे बायीं झंड़ी को जोतनू समझकर ऊपर चढ़ गया। और वहाँ से नीचे उतरना एकदम असंभव था।
इधर राहुल के साथ हादसा हुआ और उधर गौरीकुंड़ में हम यही सोचते रह गये कि वह कुगती पहुँच गया है।

जोतनू जोत से कैलाश कुंड़ की तरफ का खतरनाक ढाल

जोतनू जोत से कैलाश कुंड़ की तरफ का खतरनाक ढाल। इस खड़े ढलान के बाद कुज़ा ग्लेशियर का विस्तार आरंभ हो जाता है। राहुल का शव इसी ग्लेशियर पर यहाँ से लगभग 200 मीटर दूर मिला। जहाँ हम खड़े हैं, यहाँ से तो नीचे उतरने की संभावना है, लेकिन 200 मीटर दूर नीचे उतरने की कोई संभावना नहीं दिखायी दे रही। ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल रास्ता भटककर 200 मीटर दूर चला गया और वहाँ से नीचे उतरते समय असंतुलित हो गया।

हमारे पीछे जो एक बड़ी-सी चट्टान बमुश्किल संतुलन बनाये रखी हुई है, वही ‘धामघोड़ी’ है। वैसे तो इस जोत का नाम जोतनू जोत है, लेकिन इसे धामघोड़ी जोत भी कह दिया जाता है। कुगती की तरफ से जब आते हैं, तो यह चट्टान स्काईलाइन पर बड़ी दूर से ही दिख जाती है, जिससे हमें जोत की पहचान हो जाती है।

कुज़ा ग्लेशियर

नीचे उतरने का रास्ता ग्लेशियर से होकर जाता है।

दूर से दिखता ऊपर कैलाश कुंड़ और नीचे गौरीकुंड़

गौरीकुंड़

21 अगस्त 2016
सुबह पैर में थोड़ा आराम था। यहाँ से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर और 150 मीटर ऊपर कैलाश कुंड़ है। लोगों की भीड़ लगी पड़ी थी। पौन घंटे में हम कैलाश कुंड़ पहुँच गये। यहाँ मनीष ने स्नान किया। स्नान भी कैसे किया - यह देखना भी मज़ेदार था। वह कपड़े उतारकर एक बाल्टी के पास बैठ गया। बगल में खड़े एक आदमी से कह दिया कि चाहे कुछ भी हो जाये, भले ही मैं आपको रोकूँ; लेकिन आपको चार बाल्टी भरकर मेरे ऊपर उड़ेलनी है। उस आदमी ने ऐसा ही किया। तीन बाल्टियाँ उड़ेलने के बाद मनीष जब भागने लगा, तो उसने चौथी बाल्टी भागते के ऊपर ही उड़ेल मारी। मैंने इसका वीड़ियो भी बनाया है, लेकिन मनीष ने उसे सार्वजनिक करने से मना किया है।
खैर, भंड़ारे में खाना खाकर वापसी की राह पकड़ी। साढ़े ग्यारह बजे गौरीकुंड़ से चल दिये। नदी के बायें तरफ़ वाले रास्ते से नीचे उतरे। लेकिन जैसे-जैसे नीचे उतरता गया, एड़ी में झटके लगते गये और धंछो तक पहुँचते-पहुँचते तो फिर से असह्य दर्द होने लगा। साढ़े तीन बजे धंछो पहुँचे। मैं आज यहीं रुकने के बारे में सोचने लगा, लेकिन निशा ने हौंसला बढ़ाया कि किसी तरह आज हड़सर पहुँच जायेंगे तो कल हमें ट्रैकिंग नहीं करनी पड़ेगी। लेकिन धंछो से दो किलोमीटर आगे मैंने घुटने गाड़ दिये। दर्द इतना ज्यादा था कि मैं एक कदम भी आगे चलने में असमर्थ था। इस दौरान मनीष हमसे आगे-आगे चल रहा था। निशा ने उससे कह भी दिया था कि हम धीरे-धीरे आयेंगे, तू अपनी चाल से चल और हड़सर में मिलना। मनीष आगे बढ़ गया और हमें बीच में ही रुकना पड़ गया। बाद में पता चला कि उसने हड़सर में रात दस बजे तक हमारी प्रतीक्षा की थी।
उधर हमारी नज़र में राहुल ने आज कुगती से गाड़ी पकड़ी होगी और कहीं का कहीं पहुँच गया होगा। यहाँ तक कि वह पठानकोट तक भी पहुँच गया होगा। यदि वह मणिमहेश न आता, तो वह फूलों की घाटी जाता। क्या पता आज वो पठानकोट से ऋषिकेश के लिये हेमकुंट एक्सप्रेस पकड़ ले। या वह जम्मू भी जा सकता था। या हो सकता है कि भरमौर में ही हो और आज उसने भरमाणी माता के दर्शन किये हों। कुछ भी हो, लेकिन जहाँ भी होगा, सुरक्षित ही होगा।
लेकिन ऐसा नहीं था। हमें दूर-दूर तक भी एहसास नहीं था कि वह मुसीबत में भी हो सकता है।


हड़सर

22 अगस्त 2016
सुबह सात बजे उठे और साढ़े सात बजे के आसपास चल दिये। पैर में आराम तो था, लेकिन थोड़ा चलने पर फिर से दर्द बढ़ गया। दस बजे तक हड़सर पहुँचे। जाते ही एक शेयर्ड़ टैक्सी से भरमौर पहुँच गये और दो बजे तक चंबा। चंबा जाकर राहुल को फोन किया, जो कि स्विच ऑफ मिला। हमारी नज़र में राहुल अब तक कहीं भी पहुँच सकता था। हो सकता है कि वह कल से लगातार बस और ट्रेन में यात्रा ही कर रहा हो और उसके मोबाइल की बैटरी डाउन हो गयी हो। लेकिन हमारा यह आकलन गलत था। ‘स्विच ऑफ’ का मतलब केवल मोबाइल बंद होना ही नहीं होता, बल्कि और भी बहुत कुछ हो सकता है। वह किसी मुसीबत में भी हो सकता है, यह विचार इस समय तक दिमाग में नहीं आया।
शाम छह बजे दिल्ली वाली वोल्वो पकड़ ली। मनीष पठानकोट तक साधारण बस से गया और उसके बाद ट्रेन से।

23 अगस्त 2016
दिल्ली पहुँचकर जब फिर से राहुल को फोन किया, तो आज भी उसका मोबाइल स्विच ऑफ़ मिला। अब पहली बार एहसास हुआ कि कोई गड़बड़ भी हो सकती है। इस बात की जानकारी उसके घर तक पहुँचानी बेहद ज़रूरी थी। लेकिन उसके फेसबुक एकाउंट पर उसके परिजनों के संबंध में कुछ भी जानकारी नहीं मिल सकी। आख़िरकार मैंने इस संदेह को अपनी फेसबुक वाल पर लिख दिया। थोड़ी ही देर में राहुल के भानजे का मैसेज आया। फोन पर बात हुई और इस तरह उसके घर तक सूचना पहुँचा दी गयी।
फिर तो जो हुआ, आपको पता ही है।
इस पोस्ट का उद्देश्य यही है कि मणिमहेश ट्रैक पर क्या हुआ, इसकी जानकारी जिज्ञासु मित्रों को मिल सके। बाद में इस बारे में बहुत पूछताछ हो चुकी है; ऐसा क्यों हुआ, ऐसा क्यों किया, ऐसा क्यों नहीं किया, ऐसा नहीं करना चाहिये था, ऐसा करना चाहिये था; पिछले एक महीने से लगातार यही सब चल रहा था। इसलिये मैंने इस घटना का यहाँ विश्लेषण नहीं किया है। मिनट-दर-मिनट का सारा घटनाक्रम आपके सामने है, आपको जैसा उचित लगे, निष्कर्ष निकाल लीजिये। लेकिन बाद में हुई एक छोटी-सी घटना का मैं जिक्र अवश्य करना चाहूँगा।

जब हम पुलिस पूछताछ के सिलसिले में 31 अगस्त से 6 सितंबर तक भरमौर में थे, तो हमने थाने के पास ही होशियारपुर वालों के भंड़ारे के पास एक होटल में एक कमरा ले रखा था। इसमें चार बिस्तर थे। दो बिस्तरों पर मैं और मनीष रहते थे और बाकी बिस्तर कभी खाली रहते, तो कभी कोई मुसाफ़िर आ जाता। इसी तरह एक दिन पठानकोट के पास का एक लड़का आ गया। उसने बताया - “हम बारह लोग मणिमहेश यात्रा पर आये थे। आज सुबह सभी ने हड़सर से पैदल यात्रा आरंभ की। बड़ी भयंकर चढ़ाई थी और मैं नहीं चढ़ पाया। आखिरकार धंछो से पहले ही मैं उन सभी को पठानकोट जाने को कहकर वापस मुड़ गया। आज मैं यहाँ भरमौर में हूँ और बाकी ग्यारह लोग ऊपर मणिमहेश पहुँच गये होंगे। ... लेकिन यहाँ बार-बार तो आया नहीं जाता। अब मैं कल सुबह हेलीकॉप्टर से ऊपर जाऊँगा और पैदल नीचे उतरूँगा।”
यह सुनते ही मैंने उसे टोका - “कल तुम हेलीकॉप्टर से ऊपर पहुँचोगे और आपके बाकी साथी नीचे उतरना शुरू कर देंगे। उन्हें नहीं पता होगा कि तुम भी ऊपर ही हो। वे यही सोचेंगे कि तुम पठानकोट पहुँच गये होंगे। अब अगर नीचे उतरते समय तुम्हारे साथ कोई दुर्घटना हो गयी, या तुम नाले में गिर पड़े, या तुम्हें हार्ट अटैक हो गया; तो बेचारे वे ग्यारह लोग बेवजह फँस जायेंगे। वे भरमौर पहुँचकर तुम्हें फोन करेंगे, तुम्हारा फोन स्विच ऑफ मिलेगा। वे सोचेंगे कि तुम पठानकोट चले गये होंगे, या रास्ते में होंगे और किसी वजह से तुम्हारा मोबाइल स्विच ऑफ हो गया है। भाई जी, कल सुबह मत जाओ। जाना ही है तो अपने साथियों को आ जाने दो, उसके बाद उन्हें बताकर जाना। नोरमली होगा कुछ नहीं, लेकिन अगर ‘कुछ’ हो गया, तो उन ग्यारह लोगों पर आफत आ जायेगी।”
खैर, वह नहीं माना और हमारे उठने से पहले ही सुबह-सवेरे हेलीपैड़ की तरफ निकल गया।

Monday, August 8, 2016

नचिकेता ताल

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18 फरवरी 2016
आज इस यात्रा का हमारा आख़िरी दिन था और रात होने तक हमें कम से कम हरिद्वार या ऋषिकेश पहुँच जाना था। आज के लिये हमारे सामने दो विकल्प थे - सेम मुखेम और नचिकेता ताल। 
यदि हम सेम मुखेम जाते हैं तो उसी रास्ते वापस लौटना पड़ेगा, लेकिन यदि नचिकेता ताल जाते हैं तो इस रास्ते से वापस नहीं लौटना है। मुझे ‘सरकुलर’ यात्राएँ पसंद हैं अर्थात जाना किसी और रास्ते से और वापस लौटना किसी और रास्ते से। दूसरी बात, सेम मुखेम एक चोटी पर स्थित एक मंदिर है, जबकि नचिकेता ताल एक झील है। मुझे झीलें देखना ज्यादा पसंद है। सबकुछ नचिकेता ताल के पक्ष में था, इसलिये सेम मुखेम जाना स्थगित करके नचिकेता ताल की ओर चल दिये।
लंबगांव से उत्तरकाशी मार्ग पर चलना होता है। थोड़ा आगे चलकर इसी से बाएँ मुड़कर सेम मुखेम के लिये रास्ता चला जाता है। हम सीधे चलते रहे। जिस स्थान से रास्ता अलग होता है, वहाँ से सेम मुखेम 24 किलोमीटर दूर है। 
उत्तराखंड के रास्तों की तो जितनी तारीफ़ की जाए, कम है। ज्यादातर तो बहुत अच्छे बने हैं और ट्रैफिक है नहीं। जहाँ आप 2000 मीटर के आसपास पहुँचे, चीड़ का जंगल आरंभ हो जाता है। चीड़ के जंगल में बाइक चलाने का आनंद स्वर्गीय होता है। 

Wednesday, August 3, 2016

चंद्रबदनी मंदिर और लंबगांव की ओर

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17 फरवरी 2016
ज्यादा विस्तार से नहीं लिखेंगे। एक तो यात्रा किये हुए अरसा हो गया है, अब वृत्तांत लिखने बैठा हूं तो वैसा नहीं लिखा जाता, जैसा ताजे वृत्तांत में लिखा जाता है। लिखने में तो मजा नहीं आता, पता नहीं आपको पढने में मजा आता है या नहीं।
तो जामणीखाल से सुबह नौ बजे बाइक स्टार्ट कर दी और चंद्रबदनी की ओर मुड गये। चंद्रबदनी मैं पहले भी जा चुका हूं - शायद 2009 में। तब जामणीखाल तक हम बस से आये थे और यहां से करीब आठ-नौ किलोमीटर दूर चंद्रबदनी तक पैदल गये थे। पक्की अच्छी सडक बनी है। आज बीस मिनट लगे हमें चंद्रबदनी के आधार तक पहुंचने में। यहां सडक समाप्त हो जाती है और बाकी एक किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी होती है।
यह दूरी भी तय हो गई। पक्का रास्ता बना है। लेकिन अच्छी चढाई है। चंद्रबदनी मंदिर की समुद्र तल से ऊंचाई करीब 2200 मीटर है। मंदिर के सामने पहुंचे तो वो नजारा दिखाई पडा, जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। किन्नौर हिमालय से लेकर नंदादेवी तक की चोटियां स्पष्ट दिखाई दे रही थीं और चौखंबा इनके राजा की तरह अलग ही चमक रही थी। कुमाऊं में किसी ऊंचाई वाले स्थान से देखेंगे तो नंदादेवी और पंचचूली चोटियों का प्रभुत्व दिखाई देता है और गढवाल में चौखम्बा का। अलग ही रुतबा है चौखम्बा का। किसी को भले ही इसकी पहचान न हो, लेकिन ध्यान अवश्य आकर्षित करती है यह। मुझे तो इसकी अच्छी तरह पहचान है।
चौखंबा ऐसे ही नगाधिपति नहीं बन गई। इसकी भौगोलिक स्थिति भी इसे अति विशिष्ट बनाती है। इसके पश्चिमी ढलान पर गौमुख ग्लेशियर का आरंभ है और पूर्वी ढाल पर सतोपंथ ग्लेशियर का। सतोपंथ ग्लेशियर को ही स्वर्गारोहिणी माना जाता है, जहां से युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग गये थे। यदि इस कथा को सत्य माना जाये, तो युधिष्ठिर चौखंबा पर ही चढ रहे थे। यदि गंगोत्री से बद्रीनाथ तक एक सीधी रेखा खींची जाये, तो चौखंबा इसी रेखा पर स्थित है और इस रेखा का सबसे ऊंचा बिंदु भी है। अर्थात इसके एक तरफ भागीरथी का जल-प्रवाह क्षेत्र है और दूसरी तरफ अलकनंदा का। वैसे तो हिमालय पर्वत श्रंखला 2400 किलोमीटर लंबाई में फैली है, लेकिन पुराणों में वर्णित स्वर्ग यही गंगोत्री और बद्रीनाथ के मध्य का क्षेत्र है। चौखंबा इसी क्षेत्र के केंद्र में है।

Friday, July 29, 2016

गढवाल में बाइक यात्रा

इसी साल फरवरी में हमारी योजना शिमला जाने की बनी। उम्मीद थी कि इन दिनों तक बर्फ पड जायेगी और हम छोटी ट्रेन में बर्फीले रास्तों का सफर तय करेंगे। साथ चलने वालों में नागटिब्बा यात्रा के साथी नरेंद्र, उसकी घरवाली पूनम और ग्वालियर से प्रशांत जी तैयार हुए। शिमला में रिटायरिंग रूम भी ऑनलाइन बुक कर लिये थे।
एक दिन पहले प्रशांत जी ने आने में असमर्थता जता दी। उनके यहां एक देहांत हो गया था। लेकिन कमाल की बात यह रही कि 15 फरवरी की दोपहर 12:10 बजे कालका से चलने वाली छोटी ट्रेन का चार्ट 13 फरवरी को ही बन गया था। इस वजह से प्रशांत जी का आरक्षण भी रद्द नहीं हो सका। हाँ, शिमला में रिटायरिंग रूम अवश्य रद्द कर दिया था।
मैं 15 की सुबह नाइट ड्यूटी करके आया। 07:40 बजे नई दिल्ली से शताब्दी में आरक्षण था। नरेंद्र और पूनम कल ही हमारे यहां आ गये थे। नहा-धोकर बिना नाश्ता किये जब घर से निकले तो 07:10 बज चुके थे। सुबह के समय मेट्रो भी देर-देर में आती है। जब नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकले तो 07:40 हो चुके थे। कालका शताब्दी के लेट होने की संभावना तो थी ही नहीं। जब लंबी लाइन की सुरक्षा जांच के बाद पैदल-पार-पथ से एक के बाद एक प्लेटफार्म पार करते हुए प्लेटफार्म नंबर 2 पर पहुंचे, तो 07:50 हो गये थे और दूर शताब्दी जाती हुई दिख रही थी। कोई और ट्रेन होती, तो शायद उतना दुख न होता; लेकिन शताब्दी के छूट जाने का बहुत दुख हुआ। ऊपर से भागदौड और भीड में निशा व पूनम किसी दूसरे पैदल-पार-पथ पर जा चढीं और हम कुछ देर के लिये अलग हो गये। मैं और नरेंद्र साथ थे। चूंकि ट्रेन हमें जाती हुई दिख रही थी, तो हमें लगा कि कहीं वे दोनों ट्रेन में न चढ गई हों। यही निशा और पूनम को भी लगा। तीसरी हताशा की बात थी कि न निशा के पास फोन था और न ही पूनम के पास। अब वे ही किसी के मोबाइल से हमें फोन करेंगी और हम इंतजार करते हुए खाली पडी एक बेंच पर बैठ गये।

Monday, July 4, 2016

खम्भात-आणंद-गोधरा पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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15 मार्च 2016
जब आणंद के उस 100 रुपये वाले आलीशान कमरे में मैं गहरी नींद में सोया हुआ था तो विमलेश जी का फोन आया- उठ जाओ। चार बज गये। वैसे मैंने अलार्म भी लगा रखा था लेकिन अलार्म से अक्सर मेरी आंख नहीं खुला करती। विमलेश जी गजब इंसान हैं कि चार बजे उठ गये, केवल मुझे जगाने को। अगर मैं नींद में उनका फोन न उठाता, तो मुझे यकीन है कि स्टेशन स्टाफ आ जाता मुझे जगाने।
04:55 बजे खम्भात की ट्रेन थी। आणंद-खम्भात के बीच में सभी डेमू ट्रेनें ही चलती हैं, विद्युतीकृत मार्ग नहीं है। खम्भात के नाम पर ही खम्भात की खाडी नाम पडा। खम्भात के पास साबरमती नदी समुद्र में गिरती है। ब्रिटिश काल में इसे कैम्बे कहा जाता था, जिसकी वजह से खम्भात स्टेशन का कोड आज भी CBY है।

Wednesday, June 29, 2016

यात्रा पुस्तक चर्चा

पिछले दिनों कुछ यात्रा पुस्तकें पढने को मिलीं। इनके बारे में संक्षेप में लिख रहा हूं:

1. कर विजय हर शिखर (प्रथम संस्करण, 2016)
लेखिका: प्रेमलता अग्रवाल
प्रकाशक: प्रभात पेपरबैक्स
ISBN: 978-93-5186-574-2



दार्जीलिंग में मारवाडी परिवार में जन्मीं प्रेमलता अग्रवाल का विवाह जमशेदपुर में हुआ। संयुक्त परिवार था और उन्हें पारिवारिक दायित्वों का कडाई से पालन करना होता था। कभी घुमक्कडी या पर्वतारोहण जैसी इच्छा मन में पनपी ही नहीं। समय का चक्र चलता रहा और दो बेटियां भी हो गईं। इसके आगे प्रेमलता जी लिखती हैं:

Monday, June 27, 2016

वडोदरा-कठाणा और भादरण-नडियाद रेल यात्रा

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Nadiad-Bhadran NG Railway14 मार्च 2016, सोमवार
गुजरात मेल सुबह पांच बजे वडोदरा पहुंच गई और मैं यहीं उतर गया। वैसे इस ट्रेन में मेरा आरक्षण आणंद तक था। आणंद तक आरक्षण कराने का मकसद इतना था ताकि वहां डोरमेट्री में बिस्तर बुक कर सकूं। ऑनलाइन बुकिंग कराते समय पीएनआर नम्बर की आवश्यकता जो पडती है। आज मुझे रात को आणंद रुकना है।
सुबह पांच बजे वडोदरा पहुंच गया और विमलेश जी का फोन आ गया। मेरी इस आठ-दिनी यात्रा को वे भावनगर में होते हुए भी सोते और जगते लगातार देख रहे थे। सारा कार्यक्रम उन्हें मालूम था और वे मेरे परेशान होने से पहले ही सूचित कर देते थे कि अब मुझे क्या करना है। अब उन्होंने कहा कि अधिकारी विश्राम गृह में जाओ। वहां उन्होंने केयर-टेकर से पहले ही पता कर रखा था कि एक कमरा खाली है और उसे यह भी बता रखा था कि सवा चार बजे मेरी ट्रेन वडोदरा आ जायेगी। बेचारा केयर-टेकर सुबह चार बजे से ही जगा हुआ था। ट्रेन वडोदरा पौन घण्टा विलम्ब से पहुंची, केयर-टेकर मेरा इंतजार करते-करते सोता भी रहा और सोते-सोते इंतजार भी करता रहा। यह एक घण्टा उसके लिये बडा मुश्किल कटा होगा। नींद की चरम अवस्था होती है इस समय।
लेकिन विमलेश जी की नींद की चरम अवस्था पता नहीं किस समय होती है?
नींद मुझे भी आ रही थी। आखिर मैं भी चार बजे से जगा हुआ था। वातानुकूलित कमरा था। नहाने के बाद कम्बल ओढकर जो सोया, साढे आठ बजे विमलेश जी का फोन आने के बाद ही उठा। उन्होंने जब बताया कि मुख्य प्लेटफार्म के बिल्कुल आख़िर में उत्तर दिशा में साइड में एक प्लेटफार्म है (शायद प्लेटफार्म नम्बर एक वही है), वहां से ट्रेन मिलेगी तो होश उड गये। अभी मुझे नहाना भी था, टिकट भी लेना था, नाश्ता भी करना था और एक किलोमीटर के लगभग ट्रेन खडी थी। तो जब सारे काम करके ट्रेन तक पहुंचा तो नौ बजकर पांच मिनट हो गये थे। पांच मिनट बाद ट्रेन चल देगी। गार्ड साहब पहले ही मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। ट्रेन में बिल्कुल भी भीड नहीं थी।

Monday, June 20, 2016

मुम्बई लोकल ट्रेन यात्रा

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13 मार्च 2016
आज रविवार था। मुझे मुम्बई लोकल के अधिकतम स्टेशन बोर्डों के फोटो लेने थे। यह काम आसान तो नहीं है लेकिन रविवार को भीड अपेक्षाकृत कम होने के कारण सुविधा रहती है। सुबह चार बजे ही देहरादून एक्सप्रेस बान्द्रा टर्मिनस पहुंच गई। पहला फोटो बान्द्रा टर्मिनस के बोर्ड का ले लिया। यह स्टेशन मेन लाइन से थोडा हटकर है। कोई लोकल भी इस स्टेशन पर नहीं आती, ठीक लोकमान्य टर्मिनस की तरह। इस स्टेशन का फोटो लेने के बाद अब मेन लाइन का ही काम बच गया। नहा-धोकर एक किलोमीटर दूर मेन लाइन वाले बान्द्रा स्टेशन पहुंचा और विरार वाली लोकल पकड ली।
साढे पांच बजे थे और अभी उजाला भी नहीं हुआ था। इसलिये डेढ घण्टा विरार में ही बैठे रहना पडा। सात बजे मोर्चा सम्भाल लिया और अन्धेरी तक जाने वाली एक धीमी लोकल पकड ली।
मुम्बई में दो रेलवे जोन की लाइनें हैं- पश्चिम रेलवे और मध्य रेलवे। पश्चिम रेलवे की लाइन चर्चगेट से मुम्बई सेंट्रल होते हुए विरार तक जाती है। यही लाइन आगे सूरत, वडोदरा और अहमदाबाद भी जाती है। इसे वेस्टर्न लाइन भी कहते हैं। इसमें कोई ब्रांच लाइन नहीं है। समुद्र के साथ साथ है और कोई ब्रांच लाइन न होने के कारण इसमें भयंकर भीड रहती है। रविवार को सुबह सात-आठ बजे भी खूब भीड थी।

Wednesday, June 15, 2016

मियागाम करजन - डभोई - चांदोद - छोटा उदेपुर - वडोदरा

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OLYMPUS DIGITAL CAMERA         12 मार्च 2016
अगर मुझे चांदोद न जाना होता, तो मैं आराम से सात बजे के बाद उठता और 07:40 बजे डभोई जाने वाली ट्रेन पकडता। लेकिन चांदोद केवल एक ही ट्रेन जाती है और यह ट्रेन मियागाम से सुबह 06:20 बजे चल देती है। मुझे साढे पांच बजे उठना पडा। रनिंग रूम में बराबर वाले बेड पर इसी ट्रेन का एक ड्राइवर सो रहा था। दूसरा ड्राइवर और गार्ड दूसरे कमरे में थे। मियागाम के रनिंग रूम में केवल नैरोगेज के गार्ड-ड्राइवर ही विश्राम करते हैं। मेन लाइन के गार्ड-ड्राइवरों के लिये यहां का रनिंग रूम किसी काम का नहीं। या तो मेन लाइन की ट्रेनें यहां रुकती नहीं, और रुकती भी हैं तो एक-दो मिनट के लिये ही।
1855 में यानी भारत में पहली यात्री गाडी चलने के दो साल बाद बी.बी.एण्ड सी.आई. यानी बॉम्बे, बरोडा और सेण्ट्रल इण्डिया नामक रेलवे कम्पनी का गठन हुआ। इसने भरूच के दक्षिण में अंकलेश्वर से सूरत तक 1860 तक रेलवे लाइन बना दी। उधर 1861 में बरोडा स्टेशन बना और इधर 1862 में देश की और एशिया की भी पहली नैरोगेज लाइन मियागाम करजन से डभोई के बीच शुरू हो गई। यानी पहली ट्रेन चलने के 9 साल के अन्दर। इसका सारा श्रेय महाराजा बरोडा को जाता है। बरोडा रियासत एक काफी धनी रियासत थी। इसके कुछ प्रान्त सौराष्ट्र में भी थे जैसे अमरेली आदि। सौराष्ट्र में मीटर गेज का जाल बिछा दिया और बरोडा में नैरोगेज का।

Monday, May 23, 2016

मियागाम करजन से मोटी कोरल और मालसर

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Miyagam Karjan to Malsar and Moti Koral NG Railway

11 मार्च 2016
आज तो किसी भी तरह की जल्दबाजी करने की आवश्यकता ही नहीं थी। वडोदरा आराम से उठा और नौ बजे मियागाम करजन जाने के लिये गुजरात एक्सप्रेस पकड ली। अहमदाबाद-मुम्बई मार्ग गुजरात और पश्चिम रेलवे का एक बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। इस पर अहमदाबाद और मुम्बई के बीच में पैसेंजर ट्रेनों के साथ साथ शताब्दी, डबल डेकर और दुरन्तो जैसी ट्रेनें भी चलती हैं और सभी भरकर चलती हैं। ट्रेनें भी खूब हैं और यात्री भी। फिर सुबह का समय था। वडोदरा का पूरा प्लेटफार्म यात्रियों से भरा पडा था। ट्रेन आई तो यह भी पूरी भरी थी। फिर बहुत से यात्री इसमें से उतरे, तब जाकर हमें चढने की जगह मिली। एक बार वडोदरा से चली तो सीधे मियागाम करजन जाकर ही रुकी।
यहां ट्रैफिक इंचार्ज मिले - चौहान साहब। अपने कार्यालय में ही नाश्ता मंगा रखा था। यहां नैरोगेज के तीन प्लेटफार्म हैं। एक लाइन डभोई और चांदोद जाती है और एक लाइन चोरन्दा जंक्शन। चोरन्दा से फिर दो दिशाओं में लाइनें हैं- मालसर और मोटी कोरल। लेकिन इन ट्रेनों की समय सारणी ऐसी है कि चांदोद से लेकर मालसर और मोटी कोरल की 116 किलोमीटर की दूरी को आप एक दिन में तय नहीं कर सकते। इसलिये खूब सोच-विचार के बाद यह तय हुआ कि पहले दिन मियागाम से मालसर और मोटी कोरल का मार्ग देखूंगा और अगले दिन बाकी। इस दिशा में मियागाम से पहली गाडी साढे दस बजे है जो मोटी कोरल तक जाती है। मैं साढे नौ बजे ही यहां आ गया था। टिकट ले लेने और उनके कार्यालय में नाश्ता करने के बाद भी काफी समय अपने पास था।

Monday, May 16, 2016

जम्बूसर-प्रतापनगर नैरोगेज यात्रा और रेल संग्रहालय

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Jambusar-Pratap Nagar NG Railway10 मार्च 2016
दहेज वैसे तो एक औद्योगिक क्षेत्र है, बन्दरगाह भी है लेकिन है बिल्कुल उजाड सा। यहां हाल ही में विकास शुरू हुआ है, इसलिये काम होता-होता ही होगा। वैसे भी पूरे देश के औद्योगिक क्षेत्र एक जैसे ही दिखते हैं।
मेन चौराहे पर एक-डेढ घण्टे खडा रहा, तब जम्बूसर की बस आई। यहां चौराहे पर कुछ दुकानें थीं, जहां बेहद स्वादिष्ट पकौडियां मिल रही थीं। अक्सर स्वादिष्ट भोजन दूर-दराज के इन इलाकों में मिल जाता है। वो भी बहुत सस्ते में।
साढे ग्यारह बजे मैं जम्बूसर पहुंच गया। सुबह जल्दी उठा था, दो घण्टे की नींद बस में पूरी कर ली। वैसे तो मार्च का महीना था लेकिन जम्बूसर में काफी गर्मी थी। स्टेशन के पास ही एक होटल था, इसमें 90 रुपये की एक गुजराती थाली मिली। इसके साथ छाछ का गिलास ले लिया। इसे खाने के बाद रात में डिनर की भी आवश्यकता नहीं पडी। ट्रेन आने में अभी दो घण्टे बाकी थे, इसलिये स्टेशन पर ही एक बेंच पर जाकर सो गया।

Monday, May 9, 2016

अंकलेश्वर-राजपीपला और भरूच-दहेज ट्रेन यात्रा

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Dahej Railway Station9 मार्च 2016
तो मैं पौने दो बजे उमरपाडा में था। स्टेशन से बाहर आकर छोटे से तिराहे पर पहुंचा। दो मिनट बाद एक बाइक वाले को हाथ दिया और तीन किलोमीटर दूर केवडी पहुंच गया। गुजरात के इस सुदूरस्थ स्थान पर भी टू-लेन की शानदार सडक बनी थी। बाइक वाला लडका अपनी धुन में गुजराती में कुछ कहता रहा, मैं ह्म्म्म-ह्म्म्म करता गया। पता नहीं उसे कैसे पता चला कि मुझे केवडी उतरना है, उसने तिराहे पर उतार दिया। हां, शायद गुजराती में उसने मुझसे पूछा होगा, मैंने हम्म्म कहकर उसे उत्तर दे दिया। वो सीधा चला गया, मुझे बायीं तरफ वाली सडक पर जाना था।
जाते ही वाडी की जीप भरी खडी मिल गई। एक सवारी की कमी थी, वो मैंने पूरी कर दी। हिन्दी में बात हुई। उसने परदेसी का सम्मान करते हुए एक स्थानीय सवारी को पीछे भेजकर मुझे सबसे आगे बैठा दिया। यहां से वाडी 12 किलोमीटर दूर है। कुछ दूर तो सडक रेलवे लाइन के साथ-साथ है, फिर दूर होती चली जाती है। इसी सडक पर गुजरात रोडवेज की एक बस ने हमें ओवरटेक किया। मुझे लगा कि कहीं यह अंकलेश्वर की बस तो नहीं लेकिन बाद में पता चला कि यह उमरपाडा से सूरत जाने वाली बस थी। यह बस वाडी से बायें मुड गई, मुझे दाहिने जाना था।

Friday, May 6, 2016

कोसम्बा से उमरपाडा नैरोगेज ट्रेन यात्रा

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Kosamba railway station9 मार्च 2016
मुम्बई से आने वाली अहमदाबाद पैसेंजर आधा घण्टा लेट थी लेकिन इतनी लेट भी नहीं थी कि मुझे कोसम्बा पहुंचने में विलम्ब हो जाये। कोसम्बा से मेरी उमरपाडा वाली नैरोगेज की ट्रेन सुबह साढे नौ बजे थी और मैं साढे आठ बजे ही कोसम्बा पहुंच गया। टिकट लिया और भरूच से आने वाले नीरज जी का इंतजार करने लगा।
विमलेश चन्द्र जी के बारे में मैंने पिछली पोस्ट में भी बताया था। इस यात्रा में मुझे कोई दिक्कत न हो, इस बात का ख्याल सैकडों किलोमीटर दूर भावनगर में बैठे विमलेश जी ने खूब रखा। कार्यक्रम उन्हें मालूम ही था - इसलिये कब कहां मुझे होना है, इसे भी वे भली-भांति जानते थे। इसी का नतीजा था कि यहां सी.एण्ड.डब्लू. में वरिष्ठ खण्ड अभियन्ता नीरज जी मिले। नीरज जी को भरूच से आना था और वे वडोदरा-भिलाड एक्सप्रेस से आये। सुबह का समय था और कोसम्बा के एक तरफ भरूच है और एक तरफ सूरत - खूब भीड होना लाजिमी था। भिलाड एक्सप्रेस चली गई तो पीछे-पीछे ही भुज-बान्द्रा आ गई और सारी भीड को उठाकर ले गई। कोसम्बा में अब जो थोडे से ही यात्री बचे थे, वे प्लेटफार्म नम्बर तीन पर थे और मुझे उनके साथ यात्रा करनी थी।

Tuesday, April 26, 2016

बिलीमोरा से वघई नैरोगेज रेलयात्रा

Bilimora - Waghai Railway Line7 मार्च 2016 के दिन यह यात्रा आरम्भ की। मेरा मतलब दिल्ली से चल पडा। आठ दिनों की यह यात्रा थी जिसमें पश्चिम रेलवे की वडोदरा और मुम्बई डिवीजनों की सभी नैरो गेज लाइनों को देखना था और रविवार वाले दिन मुम्बई लोकल में घूमना था। सतपुडा नैरोगेज के बन्द हो जाने के बाद यह इलाका नैरोगेज का सबसे ज्यादा घनत्व वाला इलाका हो गया है। मुम्बई डिवीजन में तो खैर एक ही लाइन है लेकिन वडोदरा डिवीजन में नैरोगेज लाइनों की भरमार है। मैंने शुरूआत मुम्बई डिवीजन से ही करने की सोची यानी बिलीमोरा-वघई लाइन से।
कई दिन लगाये इन आठ दिनों के कार्यक्रम को बनाने में और एक-एक मिनट का इस्तेमाल करते हुए जो योजना बनी, वो भी फुलप्रूफ नहीं थी। उसमें भी एक पेंच फंस गया। मैंने इस कार्यक्रम को बिल्कुल एक आम यात्री के नजरिये से बनाया था। उसी हिसाब से अलग-अलग स्टेशनों पर डोरमेट्री में रुकना भी बुक कर लिया। लेकिन मियागाम करजन से सुबह 06.20 बजे जो चांदोद की ट्रेन चलती है, उसे पकडने के लिये मुझे उस रात करजन ही रुकना पडेगा। यहां डोरमेट्री नहीं है और शहर भी कोई इतना बडा नहीं है कि कोई होटल मिल सके। फिर भरूच और वडोदरा से भी इस समय कोई कनेक्टिंग ट्रेन नहीं है। हालांकि भरूच से देहरादून एक्सप्रेस जरूर है लेकिन इस ट्रेन के करजन आने का समय 06.06 बजे है यानी केवल 14 मिनट का मार्जिन। हालांकि पश्चिम रेलवे में ट्रेनें लेट नहीं होतीं लेकिन कभी-कभी 10-15 मिनट लेट हो भी जाया करती हैं। इसलिये भरूच से इस ट्रेन को पकडना खतरे वाली बात थी।

Monday, April 18, 2016

जाटराम की पहली पुस्तक: लद्दाख में पैदल यात्राएं


पुस्तक प्रकाशन की योजना तो काफी पहले से बनती आ रही थी लेकिन कुछ न कुछ समस्या आ ही जाती थी। सबसे बडी समस्या आती थी पैसों की। मैंने कई लेखकों से सुना था कि पुस्तक प्रकाशन में लगभग 25000 रुपये तक खर्च हो जाते हैं और अगर कोई नया-नवेला है यानी पहली पुस्तक प्रकाशित करा रहा है तो प्रकाशक उसे कुछ भी रॉयल्टी नहीं देते। मैंने कईयों से पूछा कि अगर ऐसा है तो आपने क्यों छपवाई? तो उत्तर मिलता कि केवल इस तसल्ली के लिये कि हमारी भी एक पुस्तक है।
फिर दिसम्बर 2015 में इस बारे में नई चीज पता चली- सेल्फ पब्लिकेशन। इसके बारे में और खोजबीन की तो पता चला कि यहां पुस्तक प्रकाशित हो सकती है। इसमें पुस्तक प्रकाशन का सारा नियन्त्रण लेखक का होता है। कई कम्पनियों के बारे में पता चला। सभी के अलग-अलग रेट थे। सबसे सस्ते रेट थे एजूक्रियेशन के- 10000 रुपये। दो चैप्टर सैम्पल भेज दिये और अगले ही दिन उन्होंने एप्रूव कर दिया कि आप अच्छा लिखते हो, अब पूरी पुस्तक भेजो। मैंने इनका सबसे सस्ता प्लान लिया था। इसमें एडिटिंग शामिल नहीं थी।

Wednesday, April 13, 2016

जनवरी में नागटिब्बा-3

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26 जनवरी 2016
सुबह उठे तो आसमान में बादल मिले। घने बादल। पूरी सम्भावना थी बरसने की। और बर्फबारी की भी। आखिर जनवरी का महीना है। जितना समय बीतता जायेगा, उतनी ही बारिश की सम्भावना बढती जायेगी। इसलिये जल्दी उठे और जल्दी ही नागटिब्बा के लिये चल भी दिये। इतनी जल्दी कि जिस समय हमने पहला कदम बढाया, उस समय नौ बज चुके थे।
2620 मीटर की ऊंचाई पर हमने टैंट लगाया था और नागटिब्बा 3020 मीटर के आसपास है। यानी 400 मीटर ऊपर चढना था और दूरी है 2 किमी। इसका मतलब अच्छी-खासी चढाई है। पूरा रास्ता रिज के साथ-साथ है। ऊपर चढते गये तो थोडी-थोडी बर्फ मिलने लगी। एक जगह बर्फ में किसी हथेली जैसे निशान भी थे। निशान कुछ धूमिल थे और पगडण्डी के पास ही थे। हो सकता है कि भालू के पंजों के निशान हों, या यह भी हो सकता है कि दो-चार दिन पहले किसी इंसान ने हथेली की छाप छोड दी हो।

Monday, April 11, 2016

जनवरी में नागटिब्बा-2

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25 जनवरी 2016
साढे आठ बजे हम सोकर उठे। हम मतलब मैं और निशा। बाकी तो सभी उठ चुके थे और कुछ जांबाज तो गर्म पानी में नहा भी चुके थे। सहगल साहब के ठिकाने पर पहुंचे तो पता चला कि वे चारों मनुष्य नागलोक के लिये प्रस्थान कर चुके हैं। उन्हें आज ऊपर नहीं रुकना था, बल्कि शाम तक यहीं पन्तवाडी आ जाना था, इसलिये वे जल्दी चले गये। जबकि हमें आज ऊपर नाग मन्दिर के पास ही रुकना था, दूरी ज्यादा नहीं है, इसलिये खूब सुस्ती दिखाई।
मेरी इच्छा थी कि सभी लोग अपना अपना सामान लेकर चलेंगे। दूरी ज्यादा नहीं है, इसलिये शाम तक ठिकाने पर पहुंच ही जायेंगे। अगर न भी पहुंचते, तो रास्ते में कहीं टिक जाते और कल वहीं सब सामान छोडकर खाली हाथ नागटिब्बा जाते और वापसी में सामान उठा लेते। लेकिन ज्यादातर सदस्यों की राय थी कि टैंटों और स्लीपिंग बैगों के लिये और बर्तन-भाण्डों और राशन-पानी के लिये एक खच्चर कर लेना चाहिये। सबकी राय सर-माथे पर। 700 रुपये रोज अर्थात 1400 रुपये में दो दिनों के लिये खच्चर होते देर नहीं लगी। जिनके यहां रात रुके थे, वे खच्चर कम्पनी भी चलाते हैं। बडी शिद्दत से उन्होंने सारा सामान बेचारे जानवर की पीठ पर बांध दिया और उसका मुंह नागटिब्बा जाने वाली पगडण्डी की तरफ करके चलने को कह दिया।
अब हम सात जने थे- मैं, निशा, नरेन्द्र, पूनम, सचिन त्यागी, सचिन जांगडा और पंकज मिश्रा जी। ऊपर हम क्या क्या पकवान बनायेंगे, कितना बनायेंगे; सभी ने अपनी अपनी राय दी और खूब सारी सब्जियां, मसाले खरीद लिये। बर्तन ले लिये। कौन सा हमें खुद ढोना था? खच्चर जिन्दाबाद।

Friday, April 8, 2016

जनवरी में नागटिब्बा-1

24 जनवरी 2016
दिसम्बर 2015 की लगभग इन्हीं तारीखों में हम तीन जने नागटिब्बा गये थे। वह यात्रा क्यों हुई थी, इस बारे में तो आपको पता ही है। मेरा काफी दिनों से एक यात्रा आयोजित करने का मन था। नवम्बर में ही योजना बन गई थी कि क्रिसमस के आसपास और गणतन्त्र दिवस के आसपास दो ग्रुपों को नागटिब्बा लेकर जाऊंगा। नागटिब्बा लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर है और यहां अच्छी खासी बर्फ पड जाया करती है। लेकिन इस बार पूरे हिमालय में कम बर्फबारी हुई है तो नागटिब्बा भी इससे अछूता नहीं रहा। दिसम्बर में हमें बर्फ नहीं मिली। फिर हमने देवलसारी वाला रास्ता पकड लिया और खूब पछताये। उस रास्ते में कहीं भी पानी नहीं है। हम प्यासे मर गये और आखिरकार नागटिब्बा तक नहीं पहुंच सके। वापस पंतवाडी की तरफ उतरे। इस रास्ते में खूब पानी है, इसलिये तय कर लिया कि जनवरी वाली यात्रा पन्तवाडी के रास्ते ही होगी।
लेकिन पन्तवाडी की तरफ मुझे जिस चीज ने सबसे ज्यादा डराया, वो था उस रास्ते का ढाल। इसमें काफी ज्यादा ढाल है। नीचे उतरने से ही खूब पता चल रहा था। फिर अगर जनवरी में इस रास्ते से आयेंगे तो इसी पर चढना पडेगा। यही सोच-सोचकर मेरी सांस रुकी जा रही थी और मैं नितिन और अमरीश से वादा भी करता जा रहा था कि अब के बाद ट्रैकिंग बन्द।

Monday, April 4, 2016

जनवरी में स्पीति: काजा से दिल्ली वापस

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10 जनवरी 2016
कल की बात है। जब पौने पांच बजे रीकांग पीओ से बस आई तो इसमें से तीन-चार यात्री उतरे। एक को छोडकर सभी स्थानीय थे। वो एक बाहर का था और उसकी कमर पर बडा बैग लटका था और गले में कैमरा। उस समय हम चाय पी रहे थे। बातचीत हुई, तो वह चण्डीगढ का निकला। जनवरी में स्पीति घूमने आया था। चौबीस घण्टे पहले उसी बस से चण्डीगढ से चला था, जिससे हम कुछ दिन पहले चण्डीगढ से रीकांग पीओ आये थे। वह बस सुबह सात बजे रीकांग पीओ पहुंचती है और ठीक इसी समय वहां से काजा की बस चल देती है। वह पीओ नहीं रुका और सीधे काजा वाली बस में बैठ गया। इस प्रकार चण्डीगढ से चलकर बस से चौबीस घण्टे में वह काजा आ गया। उसकी क्या हालत हो रही होगी, हम समझ रहे थे।
वैसे तो उसकी काजा में रुकने की बुकिंग थी, हालांकि भुगतान नहीं किया था लेकिन हमसे बात करके उसने हमारे साथ रुकना पसन्द किया। तीनों एक ही कमरे में रुक गये। मकान मालकिन ने 200 रुपये अतिरिक्त मांगे। रात खाना खाने के लिये मालकिन ने अपने कमरे में ही बुला लिया। अंगीठी के कारण यह काफी गर्म था और मन कर रहा था कि खाना खाकर यहीं पीछे को लुढक जायें। लेकिन मैं यहां जिस बात की तारीफ करना चाहता हूं, वो है उनका खाना। कमरे भले ही उतने अच्छे न हों लेकिन खाना उन्होंने वाकई शानदार बनाया था। दाल, आलू की मिक्स सब्जी, रोटी और चावल; किसी भी चीज में आप एक भी कमी नहीं निकाल सकते। मैं दोबारा अगर काजा आया, तो इनके यहां केवल खाने के लिये ही रुकूंगा।

Friday, April 1, 2016

जनवरी में स्पीति: किब्बर में हिम-तेंदुए की खोज

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9 जनवरी 2016
कल जब हम दोरजे साहब के यहां बैठकर देर रात तक बातें कर रहे थे तो हिम तेंदुए के बारे में भी बातचीत होना लाजिमी था। किब्बर हिम तेंदुए के कारण प्रसिद्ध है। किब्बर के आसपास खूब हिम तेंदुए पाये जाते हैं। यहां तक कि ये गांव में भी घुस आते हैं। हालांकि हिम तेंदुआ बेहद शर्मीला होता है और आदमी से दूर ही दूर रहता है लेकिन गांव में आने का उसका मकसद भोजन होता है। यहां कुत्ते और भेडें आसानी से मिल जाते हैं।
दोरजे साहब जिन्हें हम अंकल जी कहने लगे थे, का घर नाले के बगल में है। किब्बर इसी नाले के इर्द-गिर्द बसा है। घर में नाले की तरफ कोई भी रोक नहीं है, जिससे कोई भी जानवर किसी भी समय घर में घुस सकता है। कमरों में तो अन्दर से कुण्डी लग जाती है, लेकिन बाहर बरामदा और आंगन खुले हैं। अंकल जी ने बताया कि रात में तेंदुआ और रेड फॉक्स खूब इधर आते हैं। आजकल तो बर्फ भी पडी है। उन्होंने दावे से यह भी कहा कि सुबह आपको इन दोनों जानवरों के पदचिह्न यहीं बर्फ में दिखाऊंगा। यह बात हमें रोमांचित कर गई।

Monday, March 28, 2016

जनवरी में स्पीति: किब्बर भ्रमण

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1. Sumit in Spiti8 जनवरी 2016
बारह बजे के आसपास जब किब्बर में प्रवेश किया तो बर्फबारी बन्द हो चुकी थी, लेकिन अब तक तकरीबन डेढ-दो इंच बर्फ पड चुकी थी। स्पीति में इतनी बर्फ पडने का अर्थ है कि सबकुछ सफेद हो गया। मौसम साफ हो गया। इससे दूर-दूर तक स्पीति की सफेदी दिखने लगी। गजब का नजारा था।
किब्बर लगभग 4200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इसे दुनिया का सबसे ऊंचा गांव माना जाता है। हालांकि लद्दाख में एकाध गांव इससे भी ऊंचा मिल जायेगा, लेकिन फिर भी यह सबसे ऊंचे गांवों में से तो है ही। यहां पहला कदम रखते ही एक सूचना लिखी दिखी - “आमतौर पर यह परांग ला दर्रा (18800 फीट) माह जून से सितम्बर के बीच खुला रहता है। फिर भी जाने से पहले इसकी सूचना प्रशासन काजा से जरूर लें (दूरभाष संख्या 1906-222202) तथा खास कर 15 सितम्बर के पश्चात दर्रे को पार करने की कोशिश घातक हो सकती है। यदि आप स्थानीय प्रदर्शक को साथ लें तो यह आपकी सुरक्षा के लिये उचित होगा।”

Tuesday, March 15, 2016

जनवरी मे स्पीति: की गोम्पा

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Frozen Spiti in Winters8 जनवरी 2016
सुबह उठा तो सबसे पहले बाहर रखे थर्मामीटर तक गया। रात न्यूनतम तापमान माइनस 6.5 डिग्री था। कल माइनस 10 डिग्री था, इसलिये आज उतनी ठण्ड नहीं थी। आपके लिये एक और बात बता दूं। ये माइनस तापमान जरूर काफी ठण्डा होता है लेकिन अगर आपको बताया न जाये, तो आप कभी भी पता नहीं लगा सकते कि तापमान माइनस में है। महसूस ही नहीं होता। कम से कम मुझे तो माइनस दस और प्लस पांच भी कई बार एक समान महसूस होते हैं। सुमित को भी ज्यादा ठण्ड नहीं लग रही थी।
हां, आज एक बात और भी थी। बर्फ पड रही थी। आसपास की पहाडियां और धरती भी सफेद हो गई थी। लेकिन जैसी स्पीति में बारिश होती है, वैसी ही बर्फबारी। एक-दो इंच तो छोडिये, आधा सेंटीमीटर भी बर्फ नहीं थी। लेकिन कम तापमान में यह बर्फ पिघली नहीं और इसने ही सबकुछ सफेद कर दिया था। बडा अच्छा लग रहा था। सुमित ने परसों पहली बार हिमालय देखा था, कल पहली बार बर्फ देखी और आज पहली बार बर्फबारी। वो तो स्वर्ग-वासी होने जैसा अनुभव कर रहा होगा।

Wednesday, March 9, 2016

जनवरी में स्पीति - बर्फीला लोसर

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Losar Village in January7 जनवरी 2016
सुबह उठा तो देखा कि सुमित कमरे में नहीं था। वो जरूर बाहर टहलने गया होगा। कुछ देर बाद वो वापस आ गया। बोला कि वो उजाला होने से पहले ही उठ गया था और बाहर घूमने चला गया। मैं भी कपडे-वपडे पहनकर बाहर निकला। असल में मुझे बिल्कुल भी ठण्ड नहीं लग रही थी। रात मैं कच्छे-बनियान में ही रजाई ओढकर सो गया था। स्पीति में जनवरी के लिहाज से उतनी ठण्ड नहीं थी, या फिर मुझे नहीं लग रही थी। मेरे पास एक थर्मामीटर था जिसे मैंने रात बाहर ही रख दिया था। अब सुबह आठ बजे तो ध्यान नहीं यह कितना तापमान बता रहा था लेकिन रात का न्यूनतम तापमान शून्य से दस डिग्री नीचे तक चला गया था। अभी भी शून्य से कम ही था।

Monday, March 7, 2016

जनवरी में स्पीति - रीकांग पीओ से काजा

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6 जनवरी 2016
रीकांग पीओ से काजा की बस सुबह सात बजे चलती है। मैं छह बजे ही बस अड्डे पर पहुंच गया। जाते ही टिकट ले लिये- आगे की ही सीटें देना। सीट नम्बर 4 और 5 मिल गईं। ये ड्राइवर के बिल्कुल पीछे वाली सीटें होती हैं। सुमित के लिये तो सबकुछ नया था ही, मेरे लिये भी यह इलाका नया ही था। बस अड्डे की कैण्टीन में ही आलू के परांठे खाये। तापमान तो सुबह सवेरे माइनस में ही था, इसलिये हम कम्बल ओढे हुए थे। छोटी सी कैण्टीन में सामानों की अधिकता में सुमित से एक स्थानीय टकरा गया और स्थानीय के हाथ से चाय का कांच का कप नीचे गिर गया और टूट गया। वो बडबडाने लगा लेकिन कैण्टीन मालिक ने तुरन्त मामला रफादफा कर दिया।
ठीक सात बजे बस चल पडी। जूते और दस्ताने पहनने के बावजूद भी उंगलियों में ठण्ड लग रही थी। पैरों पर कम्बल डाल लिया और हाथ उसमें घुसा लिये। बडा आराम मिला। बस अड्डे के सामने डाकखाना है। इतनी सुबह भी डाकखाना खुला था। काजा जाने वाली एकमात्र बस में खूब सारी डाक डाल दी गईं और उनकी लिस्ट कण्डक्टर को पकडा दी। गांव आते रहेंगे और कण्डक्टर लिस्ट में देख-देखकर सामान बाहर डालता जायेगा। दो-तीन अखबार ‘रोल’ बनाकर ड्राइवर के आगे डैशबॉर्ड पर डाल दिये। बाद में इन्हें ड्राइवर ने ही चलती बस से कुछ घरों में फेंक दिया। यह रोज का काम होता है, इसलिये इन्हें पता है कि अखबार कहां डालने हैं। सरकारी ड्राइवर फ्री में अखबार बेचने वाले ‘हॉकर’ भी बन गये।

Thursday, March 3, 2016

जनवरी में स्पीति- दिल्ली से रीकांग पीओ

Kinner Kailashजनवरी में वैसे तो दक्षिण भारत की यात्रा उचित रहती है लेकिन हमने स्पीति जाने का विचार किया। हम यानी मैं और सुमित। डॉ. सुमित फ्रॉम इन्दौर। लेकिन स्पीति जाने से पहले हमारे मन में महाराष्ट्र में पश्चिमी घाट में बाइक चलाने का भी विचार बना था। मैं इन्दौर ट्रेन से पहुंचता और वहां से हम दोनों बाइक उठाकर महाराष्ट्र के लिये निकल जाते। इसी दौरान कल्सुबाई आदि चोटियों तक ट्रैकिंग की भी योजना बनी। ट्रैकिंग का नाम सुनते ही सुमित भी खुश हो गया।
लेकिन सुमित की वास्तविक खुशी थी हिमालय जाने में। उधर मेरा भी मन बदलने लगा। महाराष्ट्र के इस इलाके में मानसून में जाना सर्वोत्तम रहता है, जब हरियाली चरम पर होती है। आखिरकार मैंने अपना इन्दौर का आरक्षण रद्द करा दिया और सुमित की दिल्ली तक की सीट बुक कर दी।