Friday 24 February 2012

पराशर झील- जानकारी और नक्शा

पराशर झील हिमाचल प्रदेश के मण्डी जिले में समुद्र तल से करीब 2600 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां जाने से कम से कम चार रास्ते हैं:

1. सडक मार्ग से: पराशर झील तक पक्की मोटर रोड बनी हुई है यानी अपनी गाडी से या टैक्सी से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। मण्डी के बस अड्डे से जब कुल्लू की तरफ चलते हैं तो हमारे बायें तरफ ब्यास नदी बहती है। मण्डी शहर से बाहर निकलने से पहले ब्यास पर एक पुल आता है। कुल्लू वाली सडक को छोडकर पुल पार करना पडता है। पुल पार करके यह रोड जोगिन्दर नगर होते हुए कांगडा चली जाती है। इसी कांगडा वाली रोड पर थोडा आगे बढें तो सीधे हाथ की ओर एक और सडक निकलती दिखाई देती है। यह कटौला होते हुए बजौरा चली जाती है और उसी मण्डी-कुल्लू मुख्य राजमार्ग में जा मिलती है। इस सडक पर मण्डी से कटौला तक बहुत सारी बसें भी चलती हैं। 

कटौला से चार किलोमीटर आगे निकलने पर एक सडक दाहिने नीचे की ओर जाती दिखाई देती है। अब हमें मुख्य सडक छोडकर इस नीचे की ओर जाती सडक पर चल देना है। यहां से चार किलोमीटर चलने पर बागी गांव आता है। मण्डी से बागी तक गिनी चुनी बसें ही चलती हैं। बागी से यही सडक 18 किलोमीटर का सफर तय करके पराशर झील तक पहुंचती है। वैसे आखिर में गाडी से नीचे उतरकर करीब आधा किलोमीटर पैदल भी चलना पडता है।

2. बागी से पैदल रास्ता: मण्डी से बागी तक बसें भी चलती हैं। आगे जाने के लिये या तो टैक्सी करो या फिर पैदल जाओ। पैदल दूरी करीब 5 किलोमीटर है। और ये 5 किलोमीटर घने जंगल से होकर जाते हैं तथा बडी भयानक चढाई है। बागी की समुद्र तल से ऊंचाई 1730 मीटर है जबकि पराशर करीब 2600 मीटर। हम अपनी यात्रा में इस रास्ते से नीचे उतरे थे।

3. देवरी से पैदल रास्ता: देवरी जाने के लिये पहले पण्डोह जाना पडेगा। पण्डोह मण्डी से करीब 15-20 किलोमीटर आगे मनाली हाइवे पर स्थित है। पण्डोह में ब्यास नदी पर एक बांध भी है। पण्डोह कस्बे में घुसते ही ब्यास पर एक पतला सा लोहे का पुल है। इस पुल से एक बार में केवल एक ही गाडी निकल सकती है। पुल पार करके यह सडक शिवाबधार नामक गांव तक जाती है। पण्डोह से इसी सडक पर 6 किलोमीटर आगे एक तिराहा है। यहां से एक तीसरी टूटी-फूटी सडक 3 किलोमीटर दूर देवरी तक जाती है। पण्डोह से शिवाबधार तक दिन भर में दो-तीन बसें ही चलती हैं, शायद देवरी तक एक भी नहीं चलती हो या फिर हो सकता है कि शिवाबधार वाली बस ही छह किलोमीटर का आना-जाना कर लेती हो। हमने पण्डोह से ही एक टैक्सी कर ली थी- डेढ सौ रुपये लिये थे, तीन जने थे। देवरी से पैदल रास्ता शुरू हो जाता है। दूरी करीब 11 किलोमीटर है। अच्छी-खासी चढाई है। रास्ते में लहर और बांदल नामक दो छोटे छोटे गांव भी पडते हैं। रास्ते में जंगल नहीं के बराबर है, लोगों की आवाजाही लगी रहती है, रास्ता भटकने का डर नहीं है।

4. ज्वालापुर से पैदल रास्ता: मण्डी-कुल्लू के बीच में सुरंग पार करने के बाद ज्वालापुर गांव है। यहां से भी पराशर झील तक पहुंचा जा सकता है। इसके लिये पहले दुर्दांत चढाई चढकर 3000 मीटर की ऊंचाई पर तुंगा माता तक जाना होता है, वहां से फिर धीरे धीरे नीचे उतरते हुए पराशर झील तक। यह रास्ता मेरा देखा हुआ नहीं है लेकिन बताया जाता है कि रास्ता ठीक-ठाक बना हुआ है। इस रास्ते में जंगल भी है और कोई आदमजात नहीं मिलती। 

मुझे उम्मीद है कि एक पांचवा रास्ता भी है जो हणोगी माता से आता है। इस रास्ते के बारे में हमने कोई पूछताछ नहीं की, मेरा मात्र अन्दाजा ही है। 

ठहरने के लिये पराशर झील के पास निर्माण विभाग और जंगलात वालों के रेस्ट हाउस हैं। इसके अलावा मन्दिर की धर्मशाला भी है लेकिन धर्मशाला में ठहरने के लिये ब्राह्मण या क्षत्रिय ही होना चाहिये। अब बात मौसम की। सालभर में कभी भी जाया जा सकता है। हर मौसम में पराशर का रूप अलग होता है। सर्दियों में जनवरी-फरवरी में बर्फ भी पडती है।

यह नक्शा अपने साथ ले जाये गये जीपीएस युक्त मोबाइल से प्राप्त डाटा के आधार पर बनाया गया है। हमने यात्रा देवरी से शुरू की थी और बागी की तरफ नीचे उतरे थे। नक्शे को देखने पर पता चल रहा है कि देवरी के मुकाबले बागी की तरफ से ज्यादा तेज चढाई है। हालांकि देवरी के मुकाबले बागी पहुंचना ज्यादा आसान है क्योंकि मण्डी से बागी के लिये बसें चलती हैं। 

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Monday 13 February 2012

सोलांग घाटी में बर्फबारी

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8 दिसम्बर, 2011 की सुबह मैं और भरत कुल्लू में बस अड्डे के पास एक सस्ते यानी दो सौ रुपये के रेस्ट हाउस में सोकर उठे। पडे पडे ही लगा कि रात बारिश हुई है क्योंकि जब काफी दिन बाद बारिश होती है तो वातावरण में एक खुशबू फैल जाती है- बारिश की खुशबू। इस देशी जानवर को इस खुशबू की बखूबी पहचान है। और जब दरवाजा खोलकर बाहर देखा तो पक्का हो गया कि रात बारिश हुई थी। हालांकि अब नहीं हो रही थी। 

और दिसम्बर में इन दिनों हिमालय में बारिश होने का एक अर्थ और है कि बर्फबारी भी जरूर होवेगी। मैं खुश हो गया और घोषणा कर दी कि बेटा भरत, तूने आज तक जिन्दगी में बर्फबारी तो दूर, बर्फ तक नहीं देखी है। आज तेरा नसीब बहुत बढिया है। आज तुझे बर्फबारी दिखाऊंगा। बोला कि क्या मनाली में स्नो फाल मिलेगा। मैंने कहा कि मनाली में तो मुश्किल है लेकिन सोलांग में चांस हैं। मैं हालांकि पहले कभी मनाली नहीं गया था लेकिन इतनी तो परख है ही कि कैसा मौसम होने पर हिमालय के किस हिस्से में बारिश पडेगी, किस हिस्से में बर्फ गिरेगी। 

बस अड्डे पर दो दो आलू के परांठे और चाय सुडककर मनाली वाली बस में जा धरे। लोकल प्राइवेट बस थी- दो घण्टे लग गये हमें मनाली जाने में। जिस सुन्दरता के लिये मनाली जाना जाता है, वो हमें ना तो दिखनी थी और ना ही दिखी। बादल थे चारों ओर। और हां, बारिश भी होने लगी थी। ठण्ड हाथों को काटे जा रही थी। अब याद आ रहा था रेनकोट जिसे मैंने कल अमित को दे दिया था कि ले जा, मौसम बहुत बढिया है। मैं तो दूसरों को भी सलाह देता हूं कि तू हिमालय पर घूमने जाना या मत जाना, लेकिन रेनकोट जरूर होना चाहिये। आज अपनी यही सलाह मैंने खुद पर लागू नहीं करी और ले भुगत। 

हमारे पास मात्र आज का ही दिन था। शाम को हमें दिल्ली के लिये प्रस्थान कर देना था। आज की योजना थी कि हिडिम्बा मन्दिर चलेंगे। तीन किलोमीटर दूर है, पैदल आना-जाना करेंगे, थोडा बहुत इधर-उधर मुंह मार लेंगे, ताक-झांक कर लेंगे और शाम हो जायेगी। लेकिन बारिश हो रही थी और हम ठण्ड से मरे जा रहे थे। 

अगर दिसम्बर के मध्य में मनाली में बारिश हो रही हो तो सीधी सी बात है, सरल सी बात है, साधारण सी बात है, सिम्पल सी बात है कि रोहतांग दर्रे पर बर्फ पड रही होगी। कल तक रोहतांग दर्रा खुला था, गाडियां आ-जा रही थी, लेकिन अब अगले पांच महीनों के लिये बन्द हो गया। मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी दे दी होगी, तभी तो मनाली बस अड्डे पर जगह जगह पर्चे चिपके हुए थे कि 6 तारीख के बाद केलांग के लिये कोई बस नहीं जायेगी। रोहतांग के उस पार केलांग है। रोहतांग ही बन्द हो जायेगा तो केलांग तक कैसे जा सकते हैं। हालांकि सुरंग का काम चल रहा है, जब यह पूरी बन जायेगी, विधिवत उदघाटन हो जायेगा, तो जनवरी फरवरी तक मनाली-केलांग रूट खुला रहेगा। 

बूंदाबांदी बन्द हुई तो हम दोनों गरीब निकल पडे। हवा तो नहीं चल रही थी लेकिन हमें लग रहा था कि बर्फीला तूफान चल रहा है और हम नंगे खडे हैं। मरे जा रहे थे ठण्ड से। भूमध्य सागर, तेरा बेडा गर्क हो कि तुझे आज ही इधर अपनी हवा भेजनी थी। अरे नहीं यार, बुरा मत मानता। तेरी तो जरुरत हमें हर साल जाडों में ही पडती है। जब भी तू नाराज हो जाता है तो हमारे उत्तर भारत में त्राहि-त्राहि मच जाती है। औली और मनाली जैसी जगहें बर्फ से वंचित रह जाती हैं, मैदानों में गेहूं के लिये तेरी दो घूंट जल की बूंदें बडी पावरफुल होती हैं। तेरा बेडा गर्क ना हो, मैंने ऐसे ही कह दिया, अब नहीं कहूंगा। 

बस अड्डे से आगे निकले तो एक तिराहा मिला। बिना तैयारी के गये थे, किस्मत के मारे थे इसलिये उस तिराहे का नाम नहीं पता। अगली बार जाऊंगा तो पता कर लूंगा। वहां से उल्टे हाथ की तरफ एक रास्ता हिडिम्बा की तरफ जाता है। मैंने भरत से पूछा कि भरत बता, हिडिम्बा या बर्फ। उसने तुरन्त कहा- बर्फ। बर्फ के लिये सोलांग जाना पडेगा और अगले दो घण्टों तक वहां के लिये कोई बस नहीं है। यह जानकारी मैंने बस अड्डे पर ही हासिल कर ली थी। टम्पू खडे थे, साथ ही टैक्सियां भी थीं। हम गये सीधे टम्पू वालों के पास। चार सौ रुपये मांग रहे थे सोलांग जाने के लेकिन जाट वाली बहसबाजी करी, मोलभाव किया और तब जाकर ढाई सौ में मामला फिट हुआ। 

टम्पू में बैठते ही हम दोनों को एहसास हुआ कि हमने अभी अभी अपनी जिन्दगी का एक गलत फैसला ले लिया है। टम्पू खुले होते हैं और जी भरकर हवा आर-पार जाती है। जितनी भी शरीर में गर्माई बची थी, सब खत्म। एक जगह टम्पू रुका और ड्राइवर ने कहा कि उतरो, सोलांग आ गया। एक बार तो जी में आया कि टम्पू वाले को वापस चलने को कह देते हैं। लेकिन फिर ढाई सौ रुपये दिखने लगे। उतर गये। इसीलिये तो कहते हैं कि पैसों में बडी गर्मी होती है। ढाई सौ रुपये वाला मामला ना होता तो हम टम्पू से नहीं उतरते और वापस मनाली जा पहुंचते। और टाइम टाइम की बात होती है। अच्छे भले कल मणिकर्ण जाने की सोच रहे थे। अगर वहां चले जाते तो मजे से गर्म पानी में पडे रहते और गुरुद्वारे के लंगर में दिनभर फ्री में खाते। 

जाते ही चाय पी। सोलांग नाले में रोड से करीब चार किलोमीटर दूर एक मन्दिर है। या तो पैदल जाओ या फिर खच्चर वाले खडे रहते हैं। वहां तक जाने का मूड बन गया। अभी साढे ग्यारह बजे थे, मनाली की बस अब डेढ बजे आयेगी। हम उस बस को किसी भी हालत में छोडने वाले नहीं थे। उधर मन्दिर भी दिमाग में था। वहां तक जाना और वापस आना पैदल दो घण्टे में नहीं हो सकता था इसलिये खच्चर ले लिये गये। वैसे एक बात है कि हमारा खच्चर लेने का मन बिल्कुल भी नहीं था, हम मन्दिर ना देखने की सोच चुके थे। हम बस ऐसे ही खच्चर वाले से बात करने लगे तो उसने दो खच्चरों का किराया 800 रुपये बताया। सुनते ही हमारी हवा खराब, हम नहीं जायेंगे। दो घण्टे बाद बस आयेगी, वापस मनाली चले जाना है। ठण्ड से हालत खराब हुई पडी है। चले आये हिमालय देखने और कपडे लत्ते लाये नहीं। 

हमारे रेट पूछते ही खच्चर वाला सिर हो गया कि साहब, बताओ कितने दोगे? मैंने कह दिया कि 200 से एक रुपया भी फालतू नहीं देंगे। मुझे उम्मीद थी कि खच्चर वाला बडबडाते हुए चला जायेगा लेकिन वो पट्ठा भी दिलेर था। डटा रहा, कुछ हमारे भी राहु-शनीचर दोस्ती कर बैठे, 300 में दो खच्चरों की शामत आ गयी। 

इस मन्दिर का भी नाम ध्यान नहीं है। यहां एक पतला सा काफी ऊंचा झरना है जिससे गर्मियों में पानी गिरता होगा, लेकिन आज बर्फ गिर रही थी ईंटों की तरह। वैसे गिर तो पानी ही रहा था लेकिन थोडी थोडी देर बाद ठोस बर्फ भी गिरती और नीचे गिरकर फूट जाती। हां, इस झरने की खास बात तो रह ही गई। इसका पानी सीधा एक शिवलिंग पर गिरता है। या यह कहिये कि पानी के नीचे एक शिवलिंग रख दिया है। कुछ दूर साधुओं के आश्रम हैं। आश्रम से शिवलिंग तक पक्की सीढियां बनी हैं। जब हम सीढियों पर अपने चमडे के जूते पहने चढ रहे थे तो आश्रम में से एक साधु चिल्लाया कि जूते उतारकर जाओ। मैंने कहा कि महाराज, बावले तो नहीं हो गये। जूते तो हमने पहन ही नहीं रखे हैं। बोला कि एक तो तुमने चमडे के जूते पहन रखे हैं और ऊपर से कह रहे हो कि जूते नहीं पहन रखे। मैंने कहा कि आगे चमडा ले जाना मना है क्या? बोला कि हां। मैंने कहा कि ठीक है। जूते मैं उतार देता हूं, और मेरे शरीर पर जो चमडा है उसे तुम उतार दो। अपनी खाल, अपना चमडा मैं खुद नहीं उतार सकता। उसने कहा कि जाओ, तुम्हें मैं जाने देता हूं। अब के बाद आओगे तो चमडे के जूते पहनकर मत आना। ये तो थी मजाक की बात। सच तो नहीं मान ली। असल में सीढियों की शुरूआत में ही लिखा था कि कृपया जूते यहां उतार दें। हम सोच में पड गये कि जूते उतारें या नहीं। एक साधु हमें देख रहा था, उसने कहा कि कोई बात नहीं। ठण्ड का मौसम है, जूते पहनकर ही जाओ। उतारो मत। 

सोलांग में बर्फ पड रही थी। यह मौसम की पहली बर्फबारी थी। अब अगले चार पांच महीनों तक पूरे हिमालय में बर्फ पडती रहेगी। हालांकि यहां इतनी बर्फ नहीं थी कि हम उसमें घुटनों तक धंस गये होंगे। हद से हद आधा इंच बर्फ ही पडी होगी। ऊंची चोटियों पर खूब ताजी बर्फ दिख रही थी। 

एक बजे तक वापस मेन रोड पर आ गये। पता चला कि डेढ वाली बस आज नहीं आयेगी। खराब मौसम होने के कारण वो बस मनाली से चली ही नहीं। अब साढे तीन वाली की उम्मीद है। अगर वो भी कैंसिल हो गई तो...? चाऊमीन खाते रहे, सोचते रहे। जैसे ही आखिरी चम्मच खाई, तभी ज्ञान प्राप्त हो गया। पैदल चलते हैं। यहां से चार किलोमीटर दूर पलचान है, मनाली-लेह राजमार्ग है। वहां से मनाली के लिये कुछ ना कुछ जरूर मिल जायेगा। पैदल चल पडे। घण्टे भर के बाद वहां भी पहुंच गये। पता चला कि रोहतांग की तरफ से, मढी की तरफ से कोई बस नहीं आयेगी। एकमात्र बस तीन बजे सोलांग जायेगी और साढे तीन बजे वही बस वापस आयेगी। 

और वो बस कैंसिल नहीं हुई। चार बजे तक हम मनाली में थे। फिर तो एक ऐसी बस पकडी, ऐसी बस पकडी कि सुबह आठ बजे तक हम भारत की राजधानी पहुंच गये। और हां, वो यात्रा भी मजेदार रही। भरत की परेशानी थी कि उसे बस के सफर में उल्टियां आती हैं। उसने ख्वाहिश की थी कि साधारण बस से नहीं जायेंगे, बल्कि सेमी डीलक्स से जायेंगे। उसमें सीटें ज्यादा आरामदायक होती हैं और आगे-पीछे भी हो जाती हैं। बस में बैठते ही गर्माहट मिली और मैं सो गया। जबकि मेरी बराबर में बैठा भरत बार बार खिडकी का शीशा खोलता और बन्द कर देता। एक ठण्डी हवा का झौंका आता। इसका मतलब था कि इस बस में भी भरत को शान्ति नहीं मिली। उसे शान्ति मिली चण्डीगढ जाकर जहां पहाड खत्म हो जाते हैं और रास्ता सीधा हो जाता है। लेकिन चण्डीगढ से पहले दस घण्टों में वो पूरी तरह निचुड चुका था। जो भी कुछ उसके पेट में था, सबकुछ बाहर निकल चुका था।


जितने कपडे दिख रहे हैं, बस उतने ही हैं। एक हल्की सी जैकेट है, एक शर्ट है बस। 

खच्चर सवारी
सोलांग घाटी
मन्दिर के रास्ते में
नीरज फोटोग्राफर
सामने मन्दिर और वहां जाती सीढियां। यहीं लिखा है कि जूते उतारो।
झरना
झरना और नजदीक से
शिवलिंग, जिस पर झरने का पानी सीधा गिरता है। अब हर तरफ बर्फ जम गई है।
कभी कभी धार्मिक जगहों पर हाथ जोड लेने में कोई बुराई नहीं है।
सुबह से बर्फबारी हो रही है। ऊंचाई पर पहाड और जंगल बर्फ से ढक गये हैं।
सोलांग घाटी की सुन्दरता
बर्फबारी
याक कैफे है ना? इसी में चाऊमीन खाई थी और ज्ञान प्राप्त हुआ था।
पैदल वापस चल पडे। रास्ते का एक फोटो।
रास्ते में कहीं पर
मेरा मूं
पलचान, यहां से सीधे सोलांग जा सकते हैं, दाहिने मुडकर रोहतांग और तीसरा मनाली।
इनके बारे में कुछ नहीं कहना।
और पहुंच गये मनाली।

Friday 10 February 2012

पराशर झील ट्रेकिंग- झील से कुल्लू तक

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7 दिसम्बर, 2011 की दोपहर करीब बारह बजे हम पराशर झील से वापस चल पडे। हमें बताया गया कि यहां से छह किलोमीटर नीचे उतरकर बागी नामक गांव है जहां से मण्डी जाने वाली बस मिल जायेगी और यह भी पता चला कि बस का टाइम ढाई बजे है। उसके बाद साढे चार बजे अगली बस मिलेगी। अभी बारह सवा बारह का टाइम था और हम अगले दो घण्टे में छह किलोमीटर का फासला तय करके बागी पहुंच सकते थे। लेकिन आज की सबसे बडी दिक्कत थी भरत जो चल नहीं पा रहा था। 

पराशर झील एक ऐसी जगह पर स्थित है जहां से लौटकर वापस आने के लिये कम से कम चार रास्ते हैं और चारों नीचे ही उतरते हैं। एक तो वही है जिससे हम आये थे यानी पण्डोह की तरफ, दूसरा तुंगा माता से होकर ज्वालापुर की तरफ, तीसरा कच्चा रास्ता बागी-कटौला की तरफ और चौथा यानी पक्की सडक बागी-कटौला की तरफ। सडक से बागी 18 किलोमीटर दूर है जबकि पैदल रास्ते से सीधे नीचे उतरते जाओ तो छह किलोमीटर में ही मामला सुलट जाता है। 

शुरू में तो कुछ दूर तक खाली ढलानदार मैदान से होकर उतरना होता है, फिर जंगल शुरू हो जाता है। जंगल भी इतना शानदार कि डर भी डर जाये। अमित अपनी अच्छी सेहत के कारण जल्दी जल्दी नीचे उतर रहा था जबकि भरत को बहुत परेशानी झेलनी पड रही थी। भरत के कारण मुझे भी धीरे धीरे उससे पीछे पीछे ही नीचे उतरना पड रहा था। अगर कहीं रास्ता दो फाड हो जाता और कुछ दूर मिलता हुआ भी दिखता तो भरत पूछता कि किस रास्ते से उतरूं। 

अगर कभी इस रास्ते से बागी से पराशर जाना पडे तो यह दुनिया की बेहतरीन चढाईयों में गिनी जायेगी। मैंने आज तक कठिनतम चढाई जो चढी है वो है श्रीखण्ड यात्रा में डण्डाधार की चढाई जो करीब सात-आठ किलोमीटर की है। यह चढाई भी डण्डाधार के टक्कर की है। लेकिन आज हम यहां से ऊपर नहीं चढ रहे थे, बल्कि नीचे उतर रहे थे। ऐसे ढलान पर नीचे उतरना भी आसान नहीं होता, इसी कारण भरत जल्दी जल्दी बार-बार फिसल भी जाता था। वहां उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं था, उसे जो भी रास्ता काटना था, खुद ही काटना था। कभी कभी तो वो दर्द के कारण चिल्ला भी पडता था। 

चार किलोमीटर नीचे उतरने के बाद एक कच्ची सडक आती है। अब हमारा सफर सडक सडक हो जाता है यानी नीचे उतरना उतना मुश्किल नहीं रह जाता। थोडी ही देर में हम ढाई बजने से कुछ पहले बागी में थे। यहां से बस चलने को तैयार थी। यह बस कटौला होते हुए मण्डी जाती है। बागी से कटौला आठ किलोमीटर दूर है। कटौला से एक सडक कुल्लू जाती है जबकि एक मण्डी। काफी बडा गांव या कहिये कि कस्बा है कटौला। यहां हर समय मण्डी की बस खडी मिलती है। 

अमित को आज ही दिल्ली के लिये लौट पडना था। जबकि मुझे और भरत को कुल्लू जाना था। दोनों पार्टियों ने अपनी अपनी बस पकडी और अपने-अपने गंतव्य के लिये चल पडे। चलने से पहले मैंने अपना रेनकोट अमित को दे दिया क्योंकि मौसम साफ था और साफ मौसम के रहते रेनकोट की जरुरत नहीं पडती। हालांकि अगले दिन मौसम बिगड गया और हमें रेनकोट की कमी बहुत भारी पडी। 

कुल्लू के बस अड्डे के चारों तरफ कई होटल हैं। अब जब ट्रेकिंग खत्म हो गई यानी मेरा काम खत्म हो गया तो भरत घुमक्कड से पर्यटक बन गया। वैसे भी मैंने भरत से एक बात तय कर रखी थी कि यात्रा के तीन दिनों में पहले दो दिन मेरी चलेगी और आखिरी दिन भरत की। यानी पहले दो दिन मैं जहां ले चलूंगा, जैसे ले चलूंगा; भरत को मानना पडेगा और आखिरी दिन भरत जैसा कहेगा मुझे मानना पडेगा। इसलिये आखिरी दिन खत्म होने से पहले कुल्लू पहुंचते ही मैंने सारी लीडरशिप भरत को सौंप दी। रात को कहां रुकना है, कहां खाना-पीना है, सारी जिम्मेदारी भरत की थी। 

हम एक होटल में पहुंचे, किराया साढे तीन सौ रुपये। दूसरे में भी साढे तीन सौ रुपये। भरत भले ही कुछ भी हो, लेकिन अव्वल दर्जे का कंजूस भी है। इतने किराये की उसे उम्मीद नहीं थी। कहने लगा कि यार, बडे महंगे कमरे हैं। मैंने कहा कि भाई, तेरी मर्जी जहां रुकना हो, रुक ले। दो तीन जगह और ढूंढा, कहीं चार सौ कहीं पांच सौ। भरत ने हाथ जोड लिये कि मेरे बस की नहीं है इतने महंगों में रुकना। तू ही कहीं ढूंढ। और जब मैंने ढूंढना शुरू किया तो दो सौ का कमरा मिल गया- डबल बेड, टीवी, गरम पानी। नाम वाम अब भूल गया हूं- बस अड्डे के चारों तरफ होटल और रेस्ट हाउस बिखरे पडे हैं। ढूंढने वाली आंखें चाहिये, सब मिल जाते हैं। 

अब मैंने पूछा कि बता भाई, कल मणिकर्ण या मनाली। अगर किसी ने इन दोनों जगहों में से कुछ भी ना देखी हों, तो वो मनाली का नाम लेगा। भरत ने भी मनाली ही कहा। मैं एक बार मणिकर्ण जा चुका था, मनाली अब तक कभी नहीं गया। इसलिये तुरन्त उसकी बात मान ली। फिर तो खाया-पीया और पडकर सो गये। सुबह मनाली जाना है।

पराशर किनारे कुछ रिहाइश

यह एक महाराज है जिसे ऐसे रास्तों पर चलने में उतना ही मजा आता है जितना कि मच्छर को खून चूसने में।

भरत नागर

और यह फोटो भी ऐतिहासिक बन गया। हम तीनों का एक साथ फोटो। एक पत्थर पर पत्थरों की सहायता से कैमरा रखा, शटर टाइम दस सेकण्ड लगाया और भागकर बीच में जा बैठा।



अपना फोटो खुद ही खींच लेते हैं।


बायें तरोताजा सा दिखता अमित और दाहिने वाला चुसा आम सा भरत।


चेहरा ऐसी चीज है जो सबकुछ बता देता है। इन दोनों के चेहरों पर साफ साफ पढा जा सकता है कि किसकी कैसी हालत थी। 

यह बरफबारी तो नहीं है लेकिन बरफ से कम भी नहीं है- पाला जमा पडा है। अमित और भरत खुश कि हमने बरफ देख ली।

भारतीय आविष्कार



यह क्या है?... मेरा मूं है।

एक फोटो जंगल का। अकेले-दुकेले जाना, मजा आयेगा।

भरत के लिये- चल थकेला, चल थकेला, चल थकेला। तेरा मेला आगे निकला, राही चल थकेला।

इस फोटो में भरत को मत देखना। इसमें देखना कि करीब चार किलोमीटर का यह खतरनाक रास्ता ऐसी ही ढलान वाला है।

बागी के पास एक घर

अब हमें सडक मिल गई है।

बागी गांव

रास्ते में कहीं का है। यह फोटो पता नहीं मैंने क्यों लगाया है, कुछ खास तो दिख नहीं रहा इसमें।

बागी से कुल्लू के रास्ते में खींचा गया फोटो।

अब चले हम कुल्लू। जो जाये कुल्लू, हो जाये उल्लू। ऐसा हमने सुना है- वैसे हम तो उल्लू नहीं हुए।

अगले भाग में सोलांग घाटी में घुमाया जायेगा। यहां क्लिक करें

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Sunday 22 January 2012

पराशर झील

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7 दिसम्बर 2011 की सुबह हम तीनों फुरसत से सोकर उठे। दस बज गये, सूरज सिर पर चढ गया, तब जाकर हम रेस्ट हाउस से बाहर निकले। अच्छा हां, एक बात और है कि यहां तक आने के लिये सडक भी बनी है। मण्डी से कटौला और फिर बागी। बागी से यहां तक 18 किलोमीटर की सडक बनी है। यह सडक रेस्ट हाउस के पास तक आती है। यहां से झील करीब आधा किलोमीटर दूर है, जहां तक जाने के लिये हरेक को पैदल चलना ही पडेगा। 

एक छोटी सी झील है पराशर। ऊंचाई लगभग 2550 मीटर। सर्दियों में बर्फ भी पडती है। झील की एक खास बात है कि इसमें एक टहला रहता है। यह टहला क्या बला है? बताता हूं। एक छोटा सा द्वीप है। इस द्वीप की भी खास बात है कि यह झील में टहलता रहता है, इसीलिये इसे टहला कहते हैं। आज यहां है तो दो महीने बाद आना, किसी दूसरे कोने में मिलेगा। झील के आसपास कोई पेड नहीं है, चारों तरफ बस हरी-हरी घास ही है जो दिसम्बर में पीली पड जाती है। 

झील के किनारे ऋषि पराशर का एक मन्दिर है जो पगोडा शैली में बना है। यह मन्दिर मण्डी रियासत के राजा बाणसेन ने 14वीं शताब्दी में बनवाया था। इस पर सुन्दर नक्काशी बनी हुई है। इसके बारे में ज्यादा जानने के लिये यहां क्लिक करें। 

यहां से करीब दस किलोमीटर दूर तुंगा माता का मन्दिर है। हमारी प्रारम्भिक योजना तुंगा माता तक जाने की थी। वहां से दूसरी तरफ मण्डी-कुल्लू मुख्य राजमार्ग पर ज्वालापुर तक नीचे उतरना था लेकिन...। यह ‘लेकिन’ शब्द बडा दुष्ट है। मेरा बस चले तो शब्दकोश से इसे हटा दूं। यह शब्द सारी बात का अर्थ उल्टा कर देता है। इसे सुनते ही सुनने वाला बिना पूरी बात समझे ही मान जाता है कि काम नहीं हुआ। ... लेकिन देवरी से पराशर तक की दस किलोमीटर की सीधी कठिन चढाई में भरत इतना खराब हो गया कि उसने सीधे मना कर दिया। कहने लगा कि अब पैदल नीचे जाना बस की बात नहीं है। अगर किसी की गाडी आती है तो उनसे लिफ्ट मांग लूंगा। और मजे की बात यह रही कि आज यहां पांच चार यात्री ही थे और सभी पैदल आये थे। दो विदेशी भी थे। 

पूछताछ करने पर पता चला कि बागी यहां से 8 किलोमीटर की पदयात्रा पर है। बागी तक मण्डी से बसें आती हैं। और बागी से ही पराशर तक 18 किलोमीटर लम्बी सडक भी है। अब इतना तो तय हो गया कि हमें 8 किलोमीटर दूर बागी तक नीचे पैदल ही उतरना है। मजबूरी का नाम... भरत। और उसे पैदल चलना पडा। 

एक बार तो मैंने भी सोचा कि इसे जाने दे। अमित और मैं तुंगा माता चलेंगे, लेकिन इंसानियत भी कुछ चीज है हमारे अन्दर कि हमने भरत को नहीं छोडा और तुंगा माता को रद्द करते हुए बागी की तरफ चल दिये।

पीडब्ल्यूडी का रेस्ट हाउस। इसके पास ही जंगल विभाग का रेस्ट हाउस भी है।

पराशर झील से दिखती बर्फीली पहाडियां। यहां से रोहतांग दर्रा भी दिखता है

अमित और नीरज

रेस्ट हाउस के सामने खडा भरत। पूरी यात्रा में इसके चेहरे पर मुस्कान नहीं आई।

पराशर झील, टहला और मन्दिर

टहले की आकृति वृत्ताकार है।

यह है मन्दिर परिसर। इन्हीं में धर्मशाला भी है।

टहला झील में टहलता रहता है।

पराशर झील और मन्दिर। मन्दिर के परली तरफ कुछ दुकानें हैं, वहीं पर ढाबा भी है।

कहते हैं यहां पहले कभी एक पेड था। विशालकाय। उसी पेड को बिना काटे, बिना उखाडे काट-छांट करके यह मन्दिर बनाया गया है।

अमित मेरे साथ तीन साल से रह रहा है, लेकिन आज पहली बार हम दोनों कहीं घूमने निकले हैं एक साथ।

वादियां मेरा दामन...

उधर कहीं जंगल पार करके तुंगा माता का मन्दिर है।

बिल्कुल केन्द्र में दिखता निर्माण विभाग का रेस्ट हाउस, ऊपर बायें कोने में जंगल विभाग का।

भरत नागर, पता नहीं अब मेरे साथ कभी हिमालय भ्रमण पर जायेगा या नहीं।

राजमे चावल का ‘प्रसाद’ ग्रहण करते हुए। 2550 मीटर की ऊंचाई, दिसम्बर का महीना और धूप; विलासिता के लिये और क्या चाहिये?

अलविदा पराशर। फिर मिलेंगे।
अगले भाग में भी जारी