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Thursday, April 27, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: बोटाद से गांधीग्राम

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18 मार्च 2017
पहले तो योजना थी कि आज पूरे दिन भावनगर में रुकूँगा और विमलेश जी जहाँ ले जायेंगे, जाऊँगा। उन्होंने मेरे लिये बड़ी-बड़ी योजनाएँ बना रखी थीं और रेलवे के कारखाने में मेरे एक लेक्चर की भी प्लानिंग थी। लेकिन जब मुझे पता चला कि आंबलियासन से विजापुर वाली मीटरगेज की लाइन चालू है और उस पर रेलबस भी चलती है, तो मेरा मन बदल गया। अगर इस बार उस लाइन पर यात्रा नहीं की तो पता नहीं कब इधर आना हो और कौन जाने तब तक वो लाइन बंद भी हो जाये। विजापुर से आदरज मोटी, कलोल से महेसाणा और अहमदाबाद से खेड़ब्रह्म वाली लाइनें पहले ही बंद हो चुकी हैं। गेज परिवर्तन का कार्य जोरों पर चल रहा है।
यही बात विमलेश जी को बतायी तो वे इसके लिये तुरंत राज़ी हो गये। तय हुआ कि आज बोटाद से अहमदाबाद तक यात्रा करूँगा और कल आंबलियासन से विजापुर। बोटाद से अहमदाबाद जाने के लिये दो बजे वाली ट्रेन पकडूँगा और यहाँ भावनगर से बोटाद के लिये साढ़े ग्यारह वाली। यानी आज साढ़े ग्यारह बजे तक हमारे पास समय रहेगा विमलेश जी के कारखाने में घूमने का। बाइक उठायी और निकल पड़े।

Monday, April 24, 2017

गुजरात मीटरगेज ट्रेन यात्रा: जूनागढ़ से देलवाड़ा

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17 मार्च 2017
रात अच्छी नींद आयी। एक चूहे ने एक बार आसपास चहलकदमी की, एक दो डरावने सपने आये: फिर भी सब ठीक रहा। इतने बड़े रेस्ट हाउस में मैं अकेला ही था। भूतों के अस्तित्व को मैं मानता हूँ। रेलवे लाइन के किनारे बने इस सुनसान रेस्ट हाउस में भूत रहते होंगे, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। धन्यवाद भूतों, मुझे शांति से सोने देने के लिए।
जूनागढ़ से ट्रेन ठीक समय पर चल दी। भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जैसे ही शहर से बाहर निकले, गिरनार पर्वत दिखायी पड़ने लगा। काफ़ी ऊँचा पर्वत है और जूनागढ़ के साथ-साथ गुजरात का भी बहुत बड़ा धार्मिक आस्था का केंद्र है। दूर से ही नमस्कार किया - भविष्य में दीप्ति के साथ आने का वादा करके।
वीसावदर में हमारी ट्रेन पहुँचने के बाद खिजडिया-जूनागढ़ पैसेंजर आ गयी। लग रहा था कि अब हमारी ट्रेन खाली हो जाएगी, लेकिन खिजडिया ट्रेन के आधे से ज्यादा यात्री इसमें चढ़ गए। सभी सीटें भर गयीं और कुछ यात्री खड़े भी रहे। मैं कल इस मार्ग पर यात्रा कर चुका था, इसलिए मेरे काम पर इस भीड़ का उतना प्रभाव नहीं पड़ा।

Thursday, April 20, 2017

गिर फोरेस्ट रेलवे: ढसा से वेरावल

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दो घंटे ढसा में खड़ी रहकर यही ट्रेन अब वेरावल के लिये चल दी। ढसा से ब्रॉड़गेज की एक लाइन भावनगर जाती है और एक महुवा। ट्रेन चली तो एक कंटेनर ट्रेन महुवा की ओर जाती दिखी। धीरे-धीरे मीटरगेज की ट्रेन सरक रही थी, थोड़ी ही दूरी पर य्यै लंबी कंटेनर ट्रेन। बड़ा शानदार दृश्य था यह। मैं इसमें इतना खो गया कि फोटो लेना भी याद नहीं रहा। हालाँकि एक-दो फोटो जाती-जाती के ले ज़रूर लिये।
अमरेली स्टेशन पर एक सूचना-पट्ट लगा हुआ था, जिस पर पीली बैकग्राउंड में काले अक्षरों में ताज़ा ही लिखा हुआ था - आरक्षण चार्ट। मैं चौंक गया। अरे, यह क्या लिख दिया इन्होने? अमरेली में आरक्षण चार्ट? गिनी चुनी दो तीन पैसेंजर ट्रेनें आती हैं - जनरल डिब्बों वाली। जिसने भी यह काम करवाया है, उसने बीस रूपये का काम कराके हज़ार का बिल बनाया होगा।
फेसबुक पेज पर एक लाइव वीडियो चला दी। यार लोग खुश हो गए। पूछने लगे कहाँ का है, कहाँ का है। उनसे अगर बता देता कि अमरेली का है तो कोई भी यह पता लगाने की ज़हमत नहीं उठाता कि अमरेली है कहाँ। उल्टा मुझसे ही पूछते।

Monday, April 17, 2017

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: जेतलसर से ढसा

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अंधा क्या माँगे? मुझे ट्रेन में जो बर्थ सबसे ज्यादा पसंद है, वो है अपर बर्थ। आप अपने बैग से कई सामान अपने इर्द गिर्द फैला सकते हैं और चोरी होने व गिरने का डर भी नहीं। मोबाइल को कान के पास रख रकते हैं, कोने में पानी की बोतल, मोबाइल के पास बैटरी बैंक, थोड़ा नीचे कैमरा, केले या अंगूर। यह उन्मुक्तता किसी दूसरी बर्थ पर नहीं मिलती। वरीयता क्रम में इसके बाद मिड़ल बर्थ, लोअर बर्थ, साइड़ अपर और साइड़ लोअर। साइड़ लोअर भले ही पाँचवे नंबर पर हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि यह मुझे पाँचवे नंबर पर पसंद है। बल्कि यह बर्थ मुझे सबसे ज्यादा नापसंद है।
और आज जब चार्ट बना तो आर.ए.सी. क्लियर होने के बाद मुझे मिली 39 नंबर की बर्थ - साइड़ लोअर। मैं इस पर जाकर दो अन्य लोगों के बीच जगह बनाता हुआ बैठ गया और इंतज़ार करने लगा कि कोई आये और मुझसे किसी भी बर्थ के बदले बदली कर ले। ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी और आठ मुसलमानों के दल के एक सदस्य ने जैसे ही अपनी कहानी सुनानी शुरू की, मैंने तपाक से कहा - “हाँ, बदल लूँगा। कौन-सी बर्थ पर जाना है?” उन्होंने कहा - “22 नंबर पर।” सेकंड का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं लगा, गणना करने में कि 22 नंबर वाली बर्थ अपर बर्थ होती है - मेरी पसंद में पहले स्थान पर। उन्होंने मुझे चार बार उसी मीठे गुजराती लहजे में शुकिया कहा, मैंने भी अपने लहजे में दो बार धन्यवाद कह दिया।

Thursday, April 13, 2017

गुजरात मीटरगेज रेल यात्रा: अहमदाबाद से रणुंज

14 मार्च 2017
जब से मेरठ-सहारनपुर रेलवे लाइन बिजली वाली हुई है और इस पर बिजली वाले इंजन, बिजली वाली ट्रेनें चलने लगी हैं, गोल्डन टेम्पल मेल में डीजल इंजन लगना बंद हो गया है। निजामुद्दीन में इंजनों की अदला-बदली होती थी, तो यहाँ इस ट्रेन के लिए तीस मिनट का ठहराव निर्धारित था, लेकिन अब इसे घटाकर पंद्रह मिनट कर दिया गया है। पहले यह सात बजकर पैंतीस पर निजामुद्दीन से चलती थी, जबकि अब सात बीस पर ही चल देती है। सात बजे मेरी नाईट ड्यूटी समाप्त होती है, तो इन बीस मिनटों में निजामुद्दीन कैसे पहुँचा, यह बात केवल मैं और धीरज ही जानते हैं। धीरज बाइक लेकर वापस चला गया, मैं निजामुद्दीन रह गया। जब फुट ओवर ब्रिज पर तेजी से प्लेटफार्म नंबर एक की और जा रहा था, तो एक गाड़ी की सीटी बजने लगी थी और वह गाड़ी थी - गोल्डन टेम्पल मेल।

Monday, April 10, 2017

एक विचित्र रेल-यात्रा

7 मार्च 2017
आला हज़रत एक्सप्रेस को इज़्ज़तदार ट्रेन नहीं माना जाता। भुज और बरेली के बीच चलने वाली इस ट्रेन का ज्यादा समय राजस्थान में गुज़रता है। आप किसी राजस्थानी से, ख़ासकर इसके मार्ग में आने वाले राजस्थानी से पूछिए इसके बारे में। वह इसे थकी हुई और बेकार ट्रेन बताएगा। और यह बेकार इस मायने में है कि इसमें भीड़ बहुत होती है। इतनी भीड़ कि सामान्य और शयनयान डिब्बों में ज्यादा अंतर नहीं होता।
ट्रेन आधा घंटा लेट थी और जब मैं पुरानी दिल्ली के छह नंबर प्लेटफार्म पर सीढ़ियों से उतर रहा था तो ट्रेन भी धीरे-धीरे चल रही थी। पता चलना मुश्किल था कि ट्रेन आ रही है या आने के बाद चल चुकी है। लेकिन इस थकी हुई ट्रेन की थकी हुई सवारियों का दरवाजों पर खड़े होना ही कह रहा था कि ट्रेन अभी-अभी आयी है। प्लेटफार्म पर भी काफी भीड़ थी और रुकने से पहले ही उतरने वालों और चढ़ने वालों का संघर्ष शुरू हो गया। 
जब सब शांत हो गया तो मैं डिब्बे में चढ़ा - एस चार में। सैंतीस नंबर वाली शायिका मेरी थी। यह मध्य शायिका होती है और दिन में किसी काम की नहीं होती। मैं इस बात को जानता था और किसी भी बहस के लिए तैयार नहीं था। अपने कूपे में बारह लोगों को बैठे देख चुपचाप अपने लिए जगह बनायी और सिकुड़कर बैठ गया। ऊपर वाली बर्थों पर लोग सोये हुए थे। नीचे वाले बैठे-बैठे ऊँघ रहे थे।

Thursday, April 6, 2017

अंडमान यात्रा की कुछ वीडियो

अंडमान यात्रा की छोटी-छोटी वीडियो पिछले दिनों फेसबुक पेज पर प्रकाशित की गयी थीं। उन्हें ही यहाँ इकट्ठा प्रकाशित कर दिया है। यदि आपने ये वीडियो पहले देख ली हों, तो अब देखने की आवश्यकता नहीं हैं। क्यों अपना डाटा खर्च करना? नहीं देखी हों तो आप देख सकते हैं।


Monday, April 3, 2017

वंडूर बीच भ्रमण

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23 जनवरी 2017
आज हमारी अंडमान यात्रा का आख़िरी दिन था और दिन का भी आख़िरी वक़्त चल रहा था। हम सीधे पहुँचे वंडूर बीच पर। पोर्ट ब्लेयर से यहाँ तक बहुत सारी बसें भी चलती हैं। एक जगह लिखा था - महात्मा गाँधी मरीन नेशनल पार्क में स्वागत है। आप इधर के नक्शे को देखेंगे तो पायेंगे कि यहाँ छोटे-छोटे कई द्वीप हैं। ये सभी द्वीप निर्जन हैं और सामुद्रिक पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है जॉली ब्वाय द्वीप। जॉली ब्वाय की बोट यहीं वंडूर से चलती है। हमारे पास समय की कमी थी, इसलिये वहाँ नहीं गये।
वंडूर बीच के पास ही लोहाबैरक क्रोकोडायल सेंचुरी है। जगह-जगह चेतावनी भी लिखी थी कि यहाँ तक मगरमच्छ आ जाते हैं, इसलिये सावधान रहें।
भीड़ बिल्कुल नहीं थी। जितने पर्यटक थे, लगभग उतने ही कुत्ते भी थे। एक बहुत बड़ा ठूँठ पड़ा था, जो यात्रियों के लिये फोटो-पॉइंट था। हमारे लिये भी।

Thursday, March 30, 2017

अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क

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23 जनवरी, 2017
तो हम बंबू-फ्लैट पहुँच गये। बढ़िया रोचक नाम है - बंबू-फ्लैट। यहाँ से चाथम बहुत नज़दीक है और नियमित बोट चलती हैं। हम बोट में रखकर भी बाइक को इधर ला सकते थे, लेकिन अंडमान की सड़कों को भी नापना चाहते थे। बंबू-फ्लैट से थोड़ा आगे एक तिराहा है, जहाँ से एक रास्ता नोर्थ-बे जाता है। रास्ता टूटा-फूटा था, लेकिन शायद बाइक तो चली ही जाती होगी। हम कुछ दिन पहले नोर्थ-बे जा चुके थे, तो आज वहाँ जाने की आवश्यकता नहीं थी।
25-25 रुपये की हमारी और 20 रुपये की बाइक की पर्ची कटी। आख़िरी दो-तीन किलोमीटर तक चढ़ाई बड़ी जोरदार है, लेकिन सड़क अच्छी बनी है। रास्ता - ऑफ़ कोर्स - घने जंगल से होकर गुज़रता है। फिर एक जगह पार्किंग है और बाइक यहीं खड़ी करके हम आगे चल दिये।

Monday, March 27, 2017

अंडमान में बाइक यात्रा: चाथम आरा मशीन

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23 जनवरी, 2017
आज जो सबसे पहला काम किया, वो था किराये पर बाइक लेना। अबरडीन बाज़ार में एक दुकान से बाइक मिल गयी - 500 रुपये प्रतिदिन किराया और 2000 रुपये सुरक्षा-राशि, जो बाइक लौटाने पर वापस कर दी जायेगी।
हमारे मोबाइल में नेट नहीं चल रहा था, इसलिये गूगल मैप लोड़ नहीं हो पाया। मेरी इच्छा बाइक से माउंट हैरियट जाने की थी। हैरियट के लिये पहले अंडमान ट्रंक रोड़ पर चलना होता है, वही सड़क जो डिगलीपुर जाती है। फिर कहीं से दाहिने मुड़कर बड़ी लंबी दूरी तय करके हैरियट जाना होता है। लेकिन नक्शे के अभाव में हम पहुँच गये चाथम। अब जब चाथम पहुँच ही गये तो यहाँ की आरा मिल भी देख लें। मैं एक मैकेनिकल इंजीनियर हूँ। इस तरह की पता नहीं कितनी मिलों की विजिट कर रखी है, इसलिये यह मेरे लिये एक उत्पादन इकाई से ज्यादा कुछ नहीं थी, लेकिन आजकल यह एक पर्यटक स्थल है।
एक बुढ़िया पुल से पहले चौराहे पर स्टूल पर डिब्बा रखकर इडली बेच रही थी। हमें चाहिये सस्ता भोजन और यहाँ से सस्ता कहीं नहीं मिल सकता था। दो प्लेट इडली ले ली। लेकिन दोनों प्लेटों में कम से कम दस बाल निकले। हमने बाल छोड़ दिये और इडली खा ली। और करते भी क्या? इडली थोड़े ही छोड़ते?

Thursday, March 23, 2017

हैवलॉक द्वीप - गोविंदनगर बीच और वापस पॉर्ट ब्लेयर

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22 जनवरी, 2017
‘पानो इको रिसॉर्ट’ में हम ठहरे थे। यह गोविंदनगर बीच के बिल्कुल बगल में है। अच्छा बना हुआ है।
हैवलॉक से हमें आज शाम को निकलना था, लेकिन बोट की बुकिंग न मिल पाने के कारण सुबह वाली बोट में ही बुकिंग करनी पड़ी थी। इस तरह हैवलॉक जैसे खूबसूरत स्थान को देखने के लिये हमारे पास चौबीस घंटे भी नहीं थे। कल राधानगर बीच देख लिया, आज बगल में मौज़ूद गोविंदनगर को देख लेते हैं।
हम नहाने की तैयारी के साथ गये थे, लेकिन जब कोरल चट्टानें देखीं तो नहाने का इरादा त्याग दिया। पानी एकदम शांत था। बड़ी दूर तक पानी में गहराई भी नहीं थी। इक्का-दुक्का पर्यटक ही थे। उनमें भी कई स्कूबा डाइविंग के लिये जाने वाले थे। हमें इस तरह की ‘एक्टिविटी’ रास नहीं आतीं। परसों स्नॉरकलिंग कर ली, बहुत हो गया।

Monday, March 20, 2017

राधानगर बीच @ हैवलॉक द्वीप

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21 जनवरी 2017
वही जहाज जिससे हम कल नील द्वीप आये थे, हमें आज हैवलॉक ले जायेगा। आज सुबह साढ़े सात बजे यह पॉर्ट ब्लेयर से चलेगा और साढ़े नौ बजे नील आ जायेगा। आधे घंटे बाद हैवलॉक के लिये प्रस्थान कर जायेगा।
यहाँ सुबह जल्दी हो जाती है, लेकिन अपनी आदत वही आठ-नौ बजे सोकर उठने की है। होटल का चेक-आउट समय साढ़े सात बजे था। मुझसे पहले दीप्ति उठ गयी। चमत्कार! कहने लगी कि उठ, समुद्र तट पर चलकर नहाते हैं। मैंने मना कर दिया। वह आराम से बिना गुस्सा किये चली गयी। महा चमत्कार!!
जल्दी ही वापस लौट आयी - बिना नहाये। बताया कि यह कोरल तट है। नहाना बहुत मुश्किल है। कोरल तटों पर चोट बड़ी आसानी से लगती है और लगती भी ऐसी है कि खून निकल आता है।

Thursday, March 16, 2017

नील द्वीप: भरतपुर बीच और लक्ष्मणपुर बीच

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20 जनवरी 2017
नैचुरल ब्रिज से पैदल मुख्य बाज़ार तक आने में थक गये। गर्मी भी थी और उमस भी। बाज़ार से भरतपुर बीच आधा किलोमीटर दूर है। पहुँच गये। लेटने की जगह मिल गयी और मैं सो गया।
नील द्वीप पर भरतपुर, सीतापुर, लक्ष्मणपुर और रामनगर सब बीच हैं।
मुझे समुद्र तटों का कोई अनुभव नहीं है। न ही यह पता कि फलाँ बीच ख़ूबसूरत है और फलाँ नहीं है। सभी तट एक-जैसे लगते हैं। मुझे न किसी बीच की विशेषता पता है और न ही वहाँ की ख़ूबियाँ। यही बात आपको इन यात्रा-वृत्तांतों में भी दिख रही होगी। अंडमान यात्रा को मैं पूरे अधिकार से नहीं लिख पा रहा हूँ। दिल पहाड़ों और ट्रेनों में ही बसता है ना।
दो घंटे सो लेने के बाद बड़ा अच्छा लगने लगा। यहाँ भीड़ नहीं थी, लेकिन चहल-पहल थी। कुछ दुकानें थीं, जहाँ केवल एजेंट लोग बैठे थे - समुद्री गतिविधियाँ कराने के लिये। बीच तो रेतीला और साफ़-सुथरा था, लेकिन आगे समुद्र में कोरल थे। इसलिये स्कूबा डाइविंग का अच्छा काम हो रहा था। हाई स्पीड़ वाटर स्कूटर वाला लड़कियों को सैर करा रहा था और तब तक समुद्र में कलाबाजियाँ कराता रहता, जब तक कि लड़की की चीख न निकल जाये।

Monday, March 13, 2017

नील द्वीप में प्राकृतिक पुल के नज़ारे

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20 जनवरी 2017
फोनिक्स-बे जेट्टी - हाँ यही नाम है इस जेट्टी का गूगल मैप में। नील और हैवलॉक जाने वाली बोट यहीं से चलती हैं। हमारी आज की नील द्वीप जाने की बुकिंग थी। सुबह सात बजे जहाज को चलना था, हम साढ़े छह बजे ही पहुँच गये। सुरक्षा-जाँच और चेक-इन के बाद वातानुकूलित जहाज में अपनी-अपनी सीटों पर जा बैठे।
दो घंटे की यह यात्रा थी। समुद्र अशांत था - शायद यह शांत ही कभी-कभार होता होगा। बड़ी-बड़ी लहरें आ रही थीं। भारी-भरकम जहाज को भी अच्छी तरह हिला देतीं। जी.पी.एस. चलाकर जहाज की गति नापी। यह बीस किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रहा था। वैसे समुद्री दूरियों को ‘नॉटिकल मील’ में नापते हैं, लेकिन मुझे किलोमीटर ही समझ आता है।
इससे पहले कि हमें समुद्री बीमारी होती और उल्टी आती, हमने मोबाइलों में अपने-अपने पसंदीदा गेम खेलने शुरू कर दिये। मैंने अपने गेम में न जाने कितनी लंबी रेलवे लाइन बिछाकर इस पर ट्रेनें चलायीं और दीप्ति ने ‘सबवे सर्फ़र’ में न जाने कितनी ट्रेनों में टक्कर मारी। इस जहाज पर डेक पर जाने की मनाही थी।

Thursday, March 9, 2017

नॉर्थ-बे बीच: कोरल देखने का उपयुक्त स्थान

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डेढ़ घंटा रॉस द्वीप पर घूमने के बाद हम वापस जेट्टी पहुँच गये। समय की पाबंदी का उदाहरण देखिये - हमारी बोट नंदिनी जेट्टी पर लगायी जा रही थी। अब यह हमें नॉर्थ-बे ले जायेगी।
इसे नॉर्थ-बे आइलैंड़ भी कहा जाता है, लेकिन मैं इसे ‘आइलैंड़’ नहीं कहूँगा। वैसे तो पूरा अंडमान-निकोबार ही द्वीप-समूहों से बना है। पोर्ट ब्लेयर भी एक द्वीप ही है - बहुत बड़ा द्वीप - इसका नाम है दक्षिणी अंडमान। तो यह जो नॉर्थ-बे है ना, यह पोर्ट ब्लेयर वाले मुख्य द्वीप का ही हिस्सा है। यह रॉस आइलैंड़ की तरह अलग से कोई द्वीप नहीं है। इसलिये इसे नॉर्थ-बे द्वीप कहना गलत है। यह दक्षिणी अंडमान द्वीप का एक हिस्सा है और समुद्री-तट होने के कारण इसे ‘नॉर्थ-बे बीच’ कहना ज्यादा उपयुक्त है, ‘नॉर्थ-बे आइलैंड़’ नहीं।
समुद्र में बड़ी उथल-पुथल थी। लहरें नाव को ऊपर उठा देतीं और फिर धड़ाम से नीचे पटक देतीं। इससे इतना पानी छलकता कि नाव के भीतर भी आ जाता।

Monday, March 6, 2017

रॉस द्वीप - ऐसे खंड़हर जहाँ पेड़ों का कब्ज़ा है

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19 जनवरी, 2017
कल जब हम सेलूलर जेल से लौट रहे थे, तो ‘अंडमान वाटर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ दिखायी दिया। यही अबरडीन जेट्टी भी है। जेट्टी मतलब ‘बोट-अड्डा’। यहाँ से रॉस द्वीप और नॉर्थ-बे के लिये बोट चलती हैं। चूँकि ये दोनों स्थान पास ही हैं और यहाँ से दिखायी भी देते हैं, इसलिये किसी भी तरह की एड़वांस बुकिंग की आवश्यकता नहीं।
सरकारी बोट भी चलती होगी, जो प्राइवेट से सस्ती होती होगी। लेकिन हमने प्राइवेट बोट चुनी। दोनों स्थानों पर आने-जाने का इनका किराया 550 रुपये प्रति व्यक्ति था। प्रत्येक बोट का अपना एक नाम होता है। हमें जो बोट मिली, उसका नाम था नंदिनी। यही बोट हमें पहले रॉस द्वीप ले जायेगी, फिर नॉर्थ-बे ले जायेगी और आख़िर में वापस अबरडीन जेट्टी भी लायेगी। रॉस द्वीप पर डेढ़ घंटा रुकना था और नॉर्थ-बे पर ढाई घंटे।

Thursday, March 2, 2017

अंडमान यात्रा: सेलूलर जेल के फोटो

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18 जनवरी, 2017
तो ऐसा हुआ कि हम पोर्ट ब्लेयर उतर गये - हवाई जहाज से। मरीन रोड़ पर एक होटल में एक कमरा बुक था ही। 100 रुपये में एक ऑटो वाला तैयार हो गया चलने को। वैसे यहाँ बसें भी खूब चलती हैं, जो दस-दस रुपये में आपको एयरपोर्ट से अबरडीन बाज़ार या मरीन रोड़ पहुँचा देती हैं। मुख्य लोकल बस अड्डा इन दोनों स्थानों के बीच में है।
तो हमें इस बात का उस समय पता नहीं था। प्रत्येक अंडमानी की तरह यह ऑटोवाला भी बहुत अच्छा था। चलते-चलते ही हमारा कार्यक्रम पूछा और आज ही नील व हैवलॉक आने-जाने के टिकट बुक करा लेने की सलाह दे दी। प्राइवेट जहाज वालों के ऑफिस में ले गया और थोड़ी ही देर में हमारे पोर्ट ब्लेयर से नील, नील से हैवलॉक और हैवलॉक से पोर्ट ब्लेयर के जहाजों में बुकिंग हो गयी। वैसे हमारे पास सरकारी जहाज से आने-जाने का भी विकल्प था, लेकिन सुना है कि सरकारी और प्राइवेट के किराये में ज्यादा अंतर नहीं होता, तो हमने प्राइवेट में ही बुकिंग कर ली। टिकटों की मारामारी का आलम यह था कि पाँच दिन पहले भी हैवलॉक से पोर्ट ब्लेयर आने के लिये हमें अपने इच्छित समय वाले जहाज में खाली सीट नहीं मिली।

Monday, February 27, 2017

अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर

संक्षेप में इस यात्रा को लिखेंगे। काम का बहुत दबाव है और समय की भारी कमी।
प्रत्येक सरकारी कर्मचारी को देश घूमने के लिये सरकार खर्चा देती है। इसे एल.टी.सी. कहते हैं। इसे लेने के इतने सारे नियम होते हैं कि किसी के लिये सभी नियम याद रख पाना संभव नहीं होता। फिर कुछ नियम ऐसे भी हैं जो समय-समय पर बदलते रहते हैं या आगे कुछ समय के लिये विस्तारित होते रहते हैं। मैं एल.टी.सी. के नियम ज्यादा नहीं जानता। वैसे भी चार साल में एक बार या दो बार इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। अपना चार साल में पचास बार बाहर जाने का काम है। एक बार खर्चा सरकार दे देगी, तो उनचास बार अपनी जेब से ही सब खर्चा करना होता है। तो सरकार द्वारा दी जाने वाली इस सुविधा को मैं अक्सर भूल जाता हूँ।
एल.टी.सी. का एक मास्टर सर्कुलर है अपने यहाँ। मैंने इसे ही पढ़ लिया और इसी के अनुसार टिकट बुकिंग कर ली। यह सर्कुलर कहता है कि अंडमान जाने के लिये आपको दिल्ली से पहले कोलकाता ट्रेन से जाना पड़ेगा और उसके बाद हवाई जहाज से। बाद में ... वापस लौटकर पता चला कि एक अस्थायी नियम भी चल रहा है जिसके अनुसार हम दिल्ली से सीधे पोर्ट ब्लेयर की फ्लाइट भी ले सकते हैं। लेकिन पहले मुझे इस नियम का पता नहीं था, इसलिये कोलकाता तक ट्रेन में बर्थ बुक कर ली और उसके बाद फ्लाइट।



पहले तो सियालदाह दूरंतो में बर्थ बुक की, लेकिन जब वह अठारह-बीस घंटे तक लेट चलने लगी, तो जी घबरा गया। फिर कालका-हावड़ा मेल में बुकिंग कर ली। हावड़ा मेल में मार्जिन ज्यादा था, इसलिये लेट होने की सूरत में फ्लाइट छूटने की संभावना कम थी।
तो 16 जनवरी 2017 की सुबह सात बजे हम पुरानी दिल्ली स्टेशन पर हावड़ा मेल में बैठ गये। सेकंड़ ए.सी. में। अच्छी लगी सेकंड़ ए.सी. श्रेणी। पहली बार सफ़र किया। भीड़भाड़ नहीं। सहयात्री एक बंगाली परिवार था। भला परिवार था। मैंने उन्हें मोबाइल चार्ज करने को अपना बैटरी बैंक दे दिया और मुझे लैपटॉप चार्ज करने के लिये अपने कूपे का चार्जिंग पॉइंट मिल गया। चौबीस घंटे से भी ज्यादा लैपटॉप चार्जिंग पर लगा रहा, लेकिन बंगालियों ने कुछ नहीं कहा।
इलाहाबाद डिवीजन के बारे में कुछ नहीं कहूँगा। इस अकेली डिवीजन ने पूरी भारतीय रेल को बदनाम कर रखा है। मुझे नहीं पता कि केवल इस डिवीजन में ऐसी कौन-सी समस्या है कि दिल्ली से चलने के बाद मुगलसराय तक ट्रेन आठ-दस घंटे लेट होनी ही होनी है।
दूसरे मार्गों की ट्रेनें जैसे श्रीधाम एक्सप्रेस या गोंड़वाना एक्सप्रेस अगर लेट चल रही है, तो उसके कुछ वाज़िब कारण होते हैं, लेकिन इस मार्ग की ट्रेनें अगर लेट हैं तो इस डिवीजन की ख़राब कार्य-प्रणाली के अलावा कोई और कारण नहीं होता।
दिल्ली से सही समय पर चलकर ट्रेन छह घंटे लेट मुगलसराय पहुँची। मुगलसराय में सभी ट्रेनों को इलाहाबाद डिवीजन से छुटकारा मिल जाता है। फिर हावड़ा तक यह छह घंटे ही लेट रही। सुबह आठ बजे हावड़ा पहुँचने थे, दोपहर दो बजे पहुँचे। कल सुबह की फ्लाइट है।
सीधे पहुँचे किसन बाहेती जी की दुकान पर - चाँदनी चौक। कोलकाता में भी चाँदनी चौक है। और हू-ब-हू दिल्ली के चाँदनी चौक जैसा। लेकिन हम उनके लिये ऐसे मनहूस साबित हुए कि हमारे पहुँचते ही उनके बड़े ससुर का निधन हो गया। हमारे लिये आवश्यक निर्देश देकर वे अपनी ससुराल चले गये।
पता नहीं कोलकाता वालों के लिये मेट्रो कितनी ज़रूरी है, लेकिन हमें केवल दीप्ति के लिये इसमें यात्रा करनी थी। टोकन लो और कोई चेकिंग नहीं - सीधे मेट्रो में जा चढ़ो। जमीन के अंदर गैर-वातानुकूलित मेट्रो। किसन जी के अनुसार - “आपका नसीब अच्छा है, तो ए.सी. वाली मेट्रो भी मिल सकती है।” लेकिन हमारा नसीब अच्छा नहीं था।
कमाल की बात है कि कोलकाता की दूसरी मेट्रो लाइनों को भी भारतीय रेल ही बना रही है। भारतीय रेल ने दिल्ली मेट्रो को भी स्वयं संचालित करने की पूरी तैयारी कर रखी थी, लेकिन श्रीधरन साहब ने ऐसा नहीं होने दिया। भारतीय रेल को लग रहा था कि दिल्ली मेट्रो उसके बिना असफल हो जायेगी और तब यहाँ अपनी ई.एम.यू. चलायेंगे। इसके लिये दिल्ली में शाहदरा स्टेशन पर भारतीय रेल और मेट्रो को जोड़ती हुई एक लिंक लाइन भी है।
तो किसन जी के सुझाव के अनुसार हम पहुँचे विक्टोरिया मेमोरियल। पाँच बजे के बाद यहाँ प्रवेश नहीं मिलता और हम इसमें प्रवेश करने वाले आख़िरी यात्री थे। टिकट क्लर्क ने खटाक से खिड़की बंद की और हमारे पीछे खड़े कई यात्रियों को निराशा हाथ लगी। लेकिन हम भी इसके अंदर नहीं जा सके। केवल गार्डन में ही घूमे। जब तक गार्डन और बाहरी साज-सज्जा की चकाचौंध से आँखें हटतीं, मेमोरियल को खाली करने का हुक्म आ गया।
कुछ देर मैदान में बैठे। यह बहुत बड़ा मैदान है। इसके बराबर में ‘मैदान’ मेट्रो स्टेशन भी है। हम उत्तर भारतीयों को खाली ‘मैदान’ शब्द की आदत नहीं होती। कुछ न कुछ जुड़ना चाहिये; जैसे रामलीला मैदान, गाँधी मैदान। मैदान के उस तरफ़ कहीं हुगली नदी बहती है। लेकिन मेरी चप्पलों ने अब तक पैरों को काफ़ी नुकसान पहुँचा दिया था, इस कारण हुगली घाट की तरफ़ नहीं जा सके। ये वहीं चप्पलें थीं जो कुछ समय पहले मैंने इंदौर से सुमित डाक्टर से ली थीं। अंडमान में काफ़ी पैदल घूमना है, इसलिये दूसरी चप्पलें लेनी पड़ेंगी। आज ही यह काम भी कर लिया। और सुमित वाली इन ‘अत्याचारी’ चप्पलों को टॉयलेट चप्पल बना दिया।
एसप्लानेड़ पहुँचे। पता नहीं बंगाली लोग इसकी सही वर्तनी कैसे करते होंगे? मैं तो अभी तक इसे इसप्लानाड़े बोलता हूँ। यहाँ एक बस अड्ड़ा है। ज्यादा बड़ा तो मुझे नहीं लगा, लेकिन हो सकता है कि बहुत बड़ा हो और मुझे न दिखा हो। अंधेरा हो गया था। यहाँ से हमें एयरपोर्ट जाने वाली बस पकड़नी थी और रास्ते में जोड़ा मंदिर उतरकर किसन जी के घर जाना था।
यहीं बस-अड्ड़े पर भूटान की एक बस खड़ी थी। यह भूटान नंबर की सरकारी बस थी और इस पर थिंपू या किसी और शहर की बजाय ‘भूटान’ लिखा था। यह बस थिंपू ही जाती होगी। हमारी दिल्ली से भी पाकिस्तान और नेपाल के लिये सरकारी बसें चलती हैं, लेकिन वे किसी बस-अड्ड़े से न चलकर अलग-अलग स्थानों से चलती हैं। इस तरह कश्मीरी गेट का बस-अड्ड़ा अंतर्राज्यीय ही रह गया, इधर कोलकाता में एसप्लानेड़ का बस-अड्ड़ा अंतर्राष्ट्रीय बस अड्ड़ा हो गया।
कोलकाता में ट्रैफ़िक के क्या कहने! डेढ़ घंटे में नौ किलोमीटर दूरी तय की।
आठ बजे तक किसन जी के यहाँ पहुँच गये। नहाये-धोये और खाना खाया। आधी रात के समय किसन जी वापस लौटे।
अगले दिन यानी 18 जनवरी को टैक्सी से एयरपोर्ट पहुँच गये। काफ़ी सारा सामान किसन जी के यहाँ छोड़ दिया। दीप्ति का यह पहला मौका था हवाई जहाज में बैठने का। पहले आईड़ी चेक, फिर चेक-इन और फिर सिक्योरिटी चेक - पंद्रह मिनट भी नहीं लगे और हम हवाई जहाज में बैठने के अधिकारी हो चुके थे।
कोलकाता से पोर्ट ब्लेयर पहुँचने में दो घंटे लगते हैं। दीप्ति ने खिड़की वाली सीट ले ली। मैंने पूछा - “कितनी देर तक जगी रहेगी?”
“ना, मैं सोऊँगी ही नहीं।”
“आच्छ्या जी, अगर आधा घंटा भी जाग ली, तो बड़ी बात होगी।”
“नहीं, असंभव। मैं बहुत रोमांचित हूँ। खिड़की से नज़र हटाऊँगी ही नहीं।”
“देख लेंगे।”
“देख लेना।”
विमान रन-वे की तरफ़ जब ‘टैक्सी’ हो रहा था, तो दीप्ति ने कहा - “मुझे डर-सा लग रहा है। जब विमान उड़ेगा, तो मेरी चीख भी निकल सकती है।”
“आँख बंद कर लेना। अगर चीख निकल पड़ी तो कहीं ऐसा न हो कि ये लोग दोबारा लैंड़िंग कराकर तुझे अस्पताल भेज दें।”
खैर, विमान ने गति पकड़ी, जमीन छोड़ी और आसमान में उड़ गया। लोग, घर, खेत सब छोटे होते चले गये। फिर समुद्र आ गया, फिर बादल आ गये और नीचे दिखना बंद। नीचे अगर कुछ दिख भी जाता तो सिवाय नीले पानी के अलावा कुछ नहीं। बीस मिनट में ही दीप्ति बोल पड़ी - “धत्त तेरे की। यह होती है विमान यात्रा? इतनी बोरिंग। अब डेढ़ घंटा कैसे कटेगा?”
और वह सो गयी।
आसमान में हवाएँ बड़ी तेज चल रही थीं। इतनी तेज कि विमान ट्रेन की तरह झटके लेने लगा। एयर-होस्टेसों ने चाय-स्नैक्स बेचना बंद कर दिया और यात्रियों को सीट-बैल्ट बाँधने का आदेश दे दिया और स्वयं भी सीट बैल्ट लगाकर बैठ गयीं। उड़ने से पहले इन्होंने सुरक्षा-उपाय भी बताये थे कि यदि विमान को समुद्र पर उतारना पड़ गया तो सभी सीटों के नीचे लाइफ-जैकेट हैं। इन्हें पहनकर आपातकालीन द्वारों से बाहर आना है। मैं भी विमान-यात्रा का इतना बड़ा अनुभवी नहीं हूँ। मुझे भी डर-सा लगने लगा। मलेशिया के उस विमान की याद आने लगी, जो पिछले साल समुद्र में डूब गया था और न कोई जिंदा बचा और न ही कोई उसका सुराग मिला। उसमें भी तो प्रत्येक सीट के नीचे लाइफ-जैकेट रही होंगी।
विमान बादलों के भीतर से होता हुआ जब कुछ नीचे आया तो अंडमान के द्वीप दिखने लगे। फिर और नीचे आया, और नीचे आया और लैंड़िंग के लिये रनवे पर दौड़ लगा दी।
अंडमान की धरती पर कदम रखा तो बूँदाबाँदी हो रही थी। गर्मी तो ज्यादा नहीं थी, लेकिन उमस चरम पर थी।



विक्टोरिया मेमोरियल





कोलकाता भूटान बस
किसन जी के यहाँ रात्रि-भोज

कोलकाता हवाई अड्ड़ा

बादल और समुद्र

जॉली ब्वाय आईलैंड़

जॉली ब्वाय आईलैंड़

मरीन नेशनल पार्क के द्वीप

मरीन नेशनल पार्क के द्वीप





यह पोस्ट लिखने, फोटो एडिट करने और प्रकाशित करने में लगा कुल समय: 2 घंटे 5 मिनट






1. अंडमान यात्रा - दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर
2. अंडमान यात्रा: सेलूलर जेल के फोटो
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8. हैवलॉक द्वीप - गोविंदनगर बीच और वापस पॉर्ट ब्लेयर
9. अंडमान में बाइक यात्रा: चाथम आरा मशीन
10. अंडमान में बाइक यात्रा: माउंट हैरियट नेशनल पार्क
11. वंडूर बीच भ्रमण
12. अंडमान यात्रा की कुछ वीडियो

Thursday, February 23, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग दो

उमेश पांडेय जी की चोपता-तुंगनाथ यात्रा का पहला भाग पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें

तीसरा दिन:
अपने अलार्म के कारण हम सुबह 5 बजे उठ गए। ठंड़ बहुत थी इसलिए ढाबे वाले से गरम पानी लेकर नहाया। फटाफट तैयार हो कर कमरे से बाहर निकले और ॐ नमः शिवाय बोल कर मंदिर की ओर प्रस्थान किया। यात्रा शुरुआत में तो ज्यादा मुश्किल नहीं थी, पर मेरे लिए थी। इसका कारण था मेरा 90 किलो का भारी शरीर। देबाशीष वैसे तो कोई नशा नहीं करते, पर उन्होंने सिगरेट जलायी। समझ नहीं आ रहा था कि ये सिगरेट पीने के लिए जलायी थी या सिर्फ फोटो के लिए। यात्रा की शुरुआत में घना जंगल है। सुबह 5:30 बजे निकलने के कारण अँधेरा भी था। इसलिए मन में भय था कि किसी भालू जी के दर्शन हो गए तो? पर ऐसा नहीं हुआ।
थोड़ी देर में ही उजाला हो गया। 1 किलोमीटर जाने पर एक चाय की दुकान मिली जिसे एक वृद्ध महिला चला रही थी। वहाँ नाश्ता किया। वहीं एक लाल शरबत की बोतल देखी । पूछने पर पता चला कि यह बुरांश का शरबत है। बुरांश उत्तराखंड़ में पाया जाने वाला फूल है । इसे राजकीय पुष्प का दर्जा भी प्राप्त है। अगर आप मार्च - अप्रैल के महीने में उत्तराखंड़ आये तो बुरांश के लाल फूल बिखरे हुए मिलेंगे।

Monday, February 20, 2017

उमेश पांडेय की चोपता तुंगनाथ यात्रा - भाग एक

मित्र उमेश पांडेय अपनी चोपता तुंगनाथ की यात्रा हम सबके साथ साझा कर रहे हैं। कुछ मामूली करेक्शन के बाद मैंने उनकी संपूर्ण पोस्ट को ज्यों का त्यों प्रकाशित किया है। यह उनका पहला लेख है और अच्छा लिखा है। आप भी आनंद लीजिये।
मानव शुरू से ही घुमक्कड़ प्रजाति का प्राणी रहा है। आदि काल से ही मानव ने नए-नए स्थानों की खोज की है। इन्हीं खोजों के दौरान कई नगरों का निर्माण भी हुआ। उनमे से अधिकांश ने अपने रहने का ठिकाना बना लिया और कुछ आज भी खानाबदोशों की तरह घूम रहे हैं।
मेरी घूमने-फिरने में रुचि हमेशा से ही रही है। हमेशा प्रयास रहता है कि जैसे ही समय मिले किसी स्थान की यात्रा पर निकल जाया जाये। लेकिन कभी छुट्टी तो कभी पैसों की तंगी के कारण कम ही जा पाता हूँ। मई 2016 में चम्बा और टिहरी बांध की यात्रा की थी। उसके बारे में कभी बाद में लिखूँगा।
पिछले एक वर्ष से नीरज जी का ब्लॉग ‘मुसाफिर हूँ यारों’ फॉलो कर रहा हूँ। बहुत अच्छा लिखते हैं। ब्लॉग पर ही इनके यात्रा संस्मरण ‘लद्दाख की पैदल यात्राएँ’ जो कि एक किताब है, के बारे में पता चला और ऑर्डर कर दी। यात्रा के विचार से तो मन घूम ही रहा था, किताब पढ़ते ही घुमक्कड़ी का भूत जाग उठा। 18 सितंबर का दिन था, जब तुंगनाथ यात्रा योजना बना ली और यात्रा का दिन निर्धारित किया 29 सितंबर से 2 अक्टूबर 2016। इन चार दिनों में 2 साप्ताहिक अवकाश, 1 कैजुअल लीव और बाकी का एक दिन हाफ डे।

Thursday, February 16, 2017

बरसूड़ी - एक गढ़वाली गाँव

9 जनवरी, दिन सोमवार, रात नौ बजे के आसपास अचानक पता चला कि बीनू कुकरेती के साथ ललित शर्मा, अजय और धर्मवीर माथुर उसके गाँव बरसूड़ी जा रहे हैं। उस समय मैं नाइट ड्यूटी जाने की तैयारी कर रहा था और नहाने ही वाला था। हालाँकि मुझे बीनू और ललित जी की इस यात्रा का पहले से पता था, लेकिन अब एकदम मेरा भी जाने का मन बन गया। आज नाइट करूँगा, तो कल मंगलवार पूरे दिन फ्री रहूँगा और परसों बुधवार मेरा साप्ताहिक अवकाश रहता है। एक भी छुट्टी नहीं लेनी पड़ेगी।
उधर शिमला समेत पूरे पश्चिमी हिमालय में भारी बर्फ़बारी हो रही थी। ऐसे में हमारा भी शिमला जाने का मन बनने लगा था। लेकिन कुछ ही दिन बाद होने वाली अंडमान यात्रा के मद्देनज़र शिमला जाना रद्द कर दिया। अब जब अचानक दीप्ति से बरसूड़ी चलने के बारे में बताया तो वह खुश हो गयी।
उधर बीनू, ललित जी और माथुर साहब कश्मीरी गेट से कोटद्वार वाली बस में बैठ चुके थे। मोहननगर से अजय भी इसी बस को पकड़ेगा। जब मैंने अजय को फोन किया तो वह निकलने ही वाला था। सुबह कार से चलने के मेरे आग्रह को उसने तुरंत मान लिया और इसकी सूचना बाकियों को भी दे दी।

Monday, February 13, 2017

बाइक यात्रा: रामदेवरा - बीकानेर - राजगढ़ - दिल्ली

इस यात्रा-वृत्तांत को आरंभ से पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
21 दिसंबर 2016
हमारी आज की योजना थी कि पहले फलोदी के पास खींचण गाँव जायेंगे और वहाँ प्रवासी पक्षियों को देखेंगे। खींचण के निवासी इन पक्षियों को मेहमान की तरह मानते हैं और उसी तरह इनकी देखभाल करते हैं। उसके बाद रात होने तक बीकानेर पहुँचेंगे और कुलवंत जी के यहाँ रुकेंगे। कल देशनोक में करणी माता का मंदिर देखेंगे, जिसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। परसों यानी 23 तारीख़ को दिल्ली पहुँचकर ड्यूटी जॉइन कर लूँगा।
लेकिन इस कार्यक्रम में परिवर्तन करना पड़ा। कारण था कि 24 और 25 दिसंबर को झाँसी के पास ओरछा में एक घुमक्कड़ सम्मेलन होना था। इनमें बहुत सारे मेरे मित्र थे और इनमें भी कई तो सपरिवार आने वाले थे। मेरा दिल्ली से झाँसी जाने का आरक्षण नहीं था, लेकिन झाँसी से दिल्ली वापस आने का आरक्षण था और झाँसी में रेलवे विश्राम गृह में एक कमरा भी बुक था। हालाँकि आयोजकों ने ओरछा में भी कमरों की व्यवस्था कर रखी थी, लेकिन ये हमारे बजट से बाहर थे। तो इस तरह मैं 23 की दोपहर तक दिल्ली पहुँचता, लगातार 16 घंटों की ड्यूटी करता और ओरछा के लिये निकल जाता। एक लंबी बाइक यात्रा के तुरंत बाद इतनी लंबी ड्यूटी करना, वो भी रात में, बेहद मुश्किल कार्य है। यही सब सोचकर तय किया कि एक दिन पहले ही दिल्ली पहुँचना ठीक रहेगा। खींचण जाना रद्द कर दिया।

Saturday, February 11, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-6

आज की वीड़ियो... वही अपनी थार में बाइक राइड़िंग की... अच्छा लगता है ऐसी सड़कों पर बाइक चलाना...


Friday, February 10, 2017

थार बाइक यात्रा: वीडियो-5

थार मरुस्थल में खुद को धूप से बचाने का भेड़ों का यह व्यवहार हमें पसंद आया: