














- मेरी घुमक्कडी के सच्चे किस्से














































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आज बहुत दिन बाद घुमक्कडी से पीछा छूटा है तो सोचा कि चलो एक-आध किस्से व टिप्स सुना दिए जाएँ। मैं जब भी कहीं जाता हूँ तो वहीं के लहजे में बात करने की कोशिश करता हूँ। मैं नहीं चाहता कि वहां के लोग मुझे पर्यटक समझें। गंदे से जूते, बेतरतीब कपडे, बढ़ी हुई दाढी, शर्ट की बाजू कोहनी से ऊपर तक फोल्ड और सबसे बड़ी बात - स्थानीय लहजा। ऐसा करने के कई फायदे होते हैं। एक तो सुरक्षा मिलती है, ठगी व धोखाधडी से भी बचते हैं। रास्ता पूछना हो तो दुकानदारों से पूछता हूँ, रिक्शेवाले व टम्पूवालों से ठगे जाने का डर रहता है।
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अभी अगस्त में जब मैं भोपाल गया तो आदिमानव की कलाकारी देखने भीमबैठका भी चला गया। रातापानी अभयारण्य के घने जंगलों में स्थित है भीमबैठका की गुफाएं। गुफाओं को विस्तार से देखने के लिए गाइड की जरुरत पड़ती है। गाइड वहीं पर बैठे मिल जाते हैं। लेकिन ऐसे में हमें भी सावधानी बरतनी पड़ती है। उन सुनसान गुफाओं में स्थानीय गाइड (जिनमे एकाध नकली भी हो सकता है) क्या नहीं कर सकते? मारकर भी फेंक देंगे तो लाश ढूँढने से भी नहीं मिलेगी।
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घुमाते हुए ही गाइड ने मुझसे पूछा -"कहाँ से आये हो?"
"भोपाल से।"
"अच्छा, भोपाल में ही रहते हो?"
"हाँ।"
"कहाँ पर?"
"गांधीनगर में।"
(सोचते हुए) "गांधीनगर....ये कहाँ पर है?"
"शास्त्रीनगर के पास में।"
"अच्छा-अच्छा, ठीक है। समझ गया।"
वैसे मुझ दिल्ली में रहने वाले को ना तो तब पता था और ना ही अब पता है कि भोपाल में गांधीनगर व शास्त्रीनगर हैं भी या नहीं। फिर उसने पूछा कि आप अकेले ही आये हो?
"नहीं, हम छः जने हैं। बाकी सभी बाहर बैठे हैं। उन्होंने गुफाएं देख रखी हैं।"
अगर मैं उनसे सही-सही बता देता कि दिल्ली से आया हूँ और अकेला हूँ तो और बात होती।
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मेरी यह चोरी पकड़ी भी जाती थी। गुफाओं से मेन रोड तीन किलोमीटर दूर है और मैं पैदल जा रहा था। हलकी-हलकी फुहार पड़ रही थी। फुहार और सतपुडा की पहाडियों का मजा लेने के लिए मैं किनारे एक पत्थर पर बैठ गया। तभी सामने से एक मोटरसाईकिल गुजरी। इसमें पंचर हो गया था। मुझे याद है कि इस पर दो लडकियां भी थीं। खैर, थोडी देर बाद वे दोनों भी पैदल निकल गयी। उनके जाने के बाद मैं उठा और अपनी चाल से चलने लगा। जब मैं उनके बराबर से निकला तो एक ने टोका - "हेलो, आप मेन रोड से पैदल ही आये थे?"
"हाँ।"
"हमारी मोटरसाईकिल में पंचर हो गया है। अब हमें भी वहां तक पैदल ही घिसटना पड़ेगा। कितना दूर और हैं अभी?"
"दो किलोमीटर।"
(थोड़ी देर रूककर) "आप कहाँ से आये हो?"
"भोपाल से।"
"वहीं के रहने वाले हो?"
"हाँ।"
"कहाँ के?"
अब मैंने पलटते हुए पूछा -"क्यों, आप कहाँ की हो?"
"हम भी भोपाल की ही हैं।"
"अच्छा, मैं असल में इंदौर का रहने वाला हूँ। यहाँ मेरे कुछ दोस्त रहते हैं।"
"अच्छा, इंदौर में मेरे मामाजी हैं। आप इंदौर में कहाँ रहते हैं?"
"शास्त्रीनगर में।"
"अच्छा, ठीक है।"
जब मैंने देखा कि ये भी भोपाल की ही हैं और मेरी 'चोरी' पकड़ी जायेगी तो मैंने खुद को इंदौर का बता दिया। गांधीनगर, शास्त्रीनगर जैसी कालोनियां तो हर शहर में मिल ही जाती हैं।
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और हाँ, उन लड़कियों को अगर मैं दिल्ली भी बता देता तो भी कोई दिक्कत नहीं थी। क्या पता....













(यह है झल्ड गाँव। वापसी में हमने नैखरी से ही एक पगडण्डी पकड़ ली थी। संयोग से हम जंगल में भटके नहीं और झल्ड पहुँच गए।) | प्रतिक्रियाएँ: |












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